शादी करना चाहता है शामली का यह लेसबियन कपल, UP पुलिस से लगाई सुरक्षा की गुहार

लड़कियों की दलील है कि वो अपने फ़ैसले लेने के लिए आज़ाद है. वहीं परिजन इसे शर्मनाक मान रहे हैं.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने भले ही समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है लेकिन समाज फ़िलहाल इस बात को हज़म नहीं कर पा रहा है. यही वजह है कि उत्तरप्रदेश के शामली में एक समलैंगिक जोड़ा अपने ही परिवार से बचने के लिए पुलिस थाने में गुहार लगा रहा है.

पुलिस के मुताबिक़ एक समलैंगिक जोड़े ने थाने में आकर अपनी सुरक्षा की गुहार लगाते हुए बताया कि वे दोनों विवाह में बंधना चाहते हैं लेकिन उनके परिवार इसका विरोध कर रहे हैं और कथित रूप से गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दे रहे हैं.

दोनों की उम्र 20 साल के क़रीब है, बचपन में दोनों साथ पढ़ती थी बाद में दोनों को गाज़ियाबाद की एक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई. इस दौरान दोनों साथ लिव-इन रिलेशन में रहने लगीं. उन्होंने बताया कि वे दोनों साथ रहना चाहते हैं लेकिन परिजन उनके विवाह के फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं. इसलिए उन्होंने पुलिस से सुरक्षा की गुहार लगवाते हुए विवाह संपन्न करवाने की मांग की है.

लड़कियों की दलील है कि वो अपने फ़ैसले लेने के लिए आज़ाद है. वहीं परिजन इसे शर्मनाक मान रहे हैं.

हालांकि पुलिस ने शिकायत मिलने के बाद परिवार वालों से मिलकर जोड़े को परेशान नहीं करने की हिदायत दी है. एएसपी श्रीवास्तव ने कहा कि पुलिस ने युवतियों को सुरक्षा का भरोसा दिया और उन्हें बाद में घर भेज दिया. उन्होंने कहा कि दोनों युवतियां गाजियाबाद में एक कॉलेज में पढ़ने के दौरान एकदूसरे से मिली थीं.

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सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को लेकर क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2018 में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है. सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, एएम खानविल्कर, डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की संवैधानिक पीठ ने इस मसले पर सुनवाई की.

कोर्ट के अनुसार आपसी सहमति से दो वयस्कों के बीच बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अब अपराध नहीं माना जाएगा.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने फ़ैसला पढ़ते हुए कहा कि जो भी जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘समलैंगिक लोगों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है. संवैधानिक पीठ ने माना कि समलैंगिकता अपराध नहीं है और इसे लेकर लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी. आत्म अभिव्यक्ति से इनकार करना मौत को आमंत्रित करना है. व्यक्तित्व को बदला नहीं जा सकता. यह खुद को परिभाषित करता है, यह व्यक्तित्व का गौरवशाली रूप है. शेक्सपियर ने कहा था कि नाम में क्या है. वास्तव में इसका मतलब था कि जो मायने रखता है वो महत्वपूर्ण गुण और मौलिक विशेषताएं हैं न कि किसी व्यक्ति को क्या कहा जाता है. नाम व्यक्ति की पहचान का एक सुविधाजनक तरीका हो सकता है लेकिन उसके गुण ही उसकी पहचान है.’

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जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा, ‘आज का फ़ैसला इस समुदाय को उनका हक देने के लिए एक छोटा सा कदम है. एलजीबीटी समुदाय के निजी जीवन में झांकने का अधिकार किसी को नहीं है.’

जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा कि ‘इस समुदाय के साथ पहले जो भेदभाव हुए हैं उसके लिए किसी को माफ़ नहीं किया जाएगा.’

जस्टिस नरीमन ने कहा ‘ये कोई मानसिक बीमारी नहीं है. केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को ठीक से समझाए ताकि एलजीबीटी समुदाय को कलंकित न समझा जाए.’

बता दें कि धारा 377 को पहली बार कोर्ट में 1994 में चुनौती दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट को धारा-377 के ख़िलाफ़ 30 से ज़्यादा याचिकाएं मिली थी. याचिका दायर करने वालों में सबसे पुराना नाम नाज़ फाउंडेशन का है, जिसने 2001 में भी धारा-377 को आपराधिक श्रेणी से हटाए जाने की मांग की थी.

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