16 साल वनवास के बाद चुनाव लड़ने लौटे दिग्विजय सिंह तो गले की फांस बन गईं साध्वी प्रज्ञा

दिग्विजय सिंह 16 साल से इंतजार कर रहे थे कि कब चुनाव लड़ने का मौका मिले. अब नंबर आया तो भोपाल से उनके खिलाफ बीजेपी ने साध्वी प्रज्ञा को टिकट दिया है. हिंदुत्व के कथित विलेन कहे जाने वाले दिग्विजय सिंह की लड़ाई हिंदुत्व की छवि रखने वाली प्रज्ञा ठाकुर से आसान नहीं होगी.

‘मैं देश के दुश्मनों को खुली चुनौती देती हूं और देश के दुश्मनों के खिलाफ संघर्ष करने को हमेशा तैयार हूं. मेरे जैसे राष्ट्रभक्त देश के दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार हैं.’

ये बयान प्रज्ञा ठाकुर का है. पिछले महीने जब कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह को भोपाल से लोकसभा चुनाव का टिकट दिया तो प्रज्ञा ठाकुर के जख्म हरे हो गए. उसी मौके पर प्रज्ञा ठाकुर का ये बयान आया था. तब से ही प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल में दिग्विजय सिंह के खिलाफ बीजेपी से टिकट देने की बात चल रही थी. पूरा गुणा भाग लगाकर बीजेपी ने प्रज्ञा ठाकुर को दिग्विजय सिंह के खिलाफ उतार दिया है.

Loksabha Election, 16 साल वनवास के बाद चुनाव लड़ने लौटे दिग्विजय सिंह तो गले की फांस बन गईं साध्वी प्रज्ञा

कौन से जख्म

2008 में हुए मालेगांव ब्लास्ट में प्रज्ञा ठाकुर आरोपी थी. उनको पिछले साल NIA ने सबूतों के अभाव में बरी किया था. 9 साल जेल में रहीं. जेल से बाहर निकलते ही वो हिंदुत्व का एक ब्रांड बन गईं. दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह हिंदुत्व के विलेन कहे जाते हैं. बीजेपी उन पर ‘हिंदू आतंकवाद’ शब्द को बल देने का और बाटला हाउस एनकाउंटर को फर्जी बताने का आरोप लगाती है. इस एनकाउंटर में इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी मारे गए थे. दिग्विजय सिंह आजमगढ़ में उन आतंकियों के घर गए थे. उनके परिवारों से मुलाकात की थी. प्रज्ञा ठाकुर ये आरोप लगाती रही हैं कि मालेगांव ब्लास्ट के बाद हिंदू आतंकवाद नाम का टर्म ईजाद किया गया और उन्हें झूठे केस में फंसा दिया गया. उन्हें 23 दिन तक लगातार यातना दी गई.

एमपी के ही भिंड जिले के कछवाहा गांव में पैदा होने वाली प्रज्ञा ठाकुर हिस्ट्री से पोस्ट ग्रेजुएट हैं. कॉलेज के जमाने में ABVP से जुड़ी रहीं. 2007 में RSS प्रचारक सुनील जोशी की हत्या में भी आरोपी थीं लेकिन कोर्ट ने उनको सब आरोपों से बरी कर दिया था. जेल में रहने के दौरान ही उनको हिंदुत्व के एक चेहरे के रूप में देखा जा रहा था. रिहा होने के बाद वो छवि और मजबूत हो गई.

दिग्विजय सिंह का 16 साल का वनवास

दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश की राजनीति में कभी केंद्र बिंदु रहे हैं. 1993 से 2003 तक लगातार 10 साल मुख्यमंत्री रहे. शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री के रूप में लोकप्रिय करने में उन 10 सालों ने का बड़ा हाथ है. एमपी के लोग अब भी कहते हैं कि वो 10 साल बरबादी के थे. 2003 में इतनी करारी हार हुई कि दिग्विजय सिंह ने अगले 10 साल के लिए राजनीति से अपनी छुट्टी कर ली. ऐलान किया कि एक दशक तक न तो चुनाव लड़ेंगे और न प्रदेश की राजनीति में दखल देंगे. 2014 में 10 साल खत्म हुए लेकिन कांग्रेस ने उनको टिकट ही नहीं दिया. चुनाव लड़ने का सपना मन में रह गया. लेकिन कांग्रेस ने उनके लिए कुछ और सोच रखा था. सीधे राज्यसभा भेज दिया.

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अब 16 साल बाद चुनाव लड़ने का नंबर आया तो सामना प्रज्ञा ठाकुर से है. इसको बीजेपी की स्ट्रैटजी कहा जा सकता है. प्रज्ञा ठाकुर की हिंदुत्व की छवि को भुनाने का सटीक तरीका निकाला है. हिंदुत्व के कथित विलेन के खिलाफ उन्हें उतारकर. अब दिग्विजय सिंह के लिए लड़ाई आसान नहीं होगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता.