जानिए क्यों मिर्जा गालिब ने अंग्रेज कर्नल के सामने खुद को कहा था ‘आधा मुसलमान’

मिर्जा गालिब को गए सदियां बीत चुकी हैं लेकिन जलवा अभी भी कायम है. आज यानी 27 दिसंबर को गालिब की यौमे पैदाइश होती है. इस मौके पर हम लाए हैं उनसे जुड़े कुछ किस्से जो पीढ़ी दर पीढ़ी सुने जाएंगे, पढ़े जाएंगेः
Mirza Ghalib birth anniversary special, जानिए क्यों मिर्जा गालिब ने अंग्रेज कर्नल के सामने खुद को कहा था ‘आधा मुसलमान’

मिर्जा गालिब अपनी शायरी, शराब और शख्सियत की वजह से मशहूर हुए. उनके शेर लोगों को कनफ्यूज करते हैं कि वे किसी ईश्वर पर विश्वास करते भी थे या नहीं, लेकिन इस विषय पर कोई शक नहीं कि अपनी बेबाकी से सामने वाले को चुप करा सकते थे. उन्हें गए सदियां बीत चुकी हैं लेकिन जलवा अभी भी कायम है. आज यानी 27 दिसंबर को गालिब की यौमे पैदाइश होती है. इस मौके पर हम लाए हैं उनसे जुड़े कुछ किस्से जो पीढ़ी दर पीढ़ी सुने जाएंगे, पढ़े जाएंगेः

आम का खास किस्सा

गालिब आम के बड़े शौकीन थे. उनके जितने शेर मशहूर हैं उतने ही आम के किस्से. ऐसा ही किस्सा है कि एक बार वो मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फर और उनके कुछ साथियों के साथ बाग-ए-हयात बख्श और किला-ए-मुबारक (लाल किला) में टहल रहे थे. वहां अलग-अलग किस्म के आम के पेड़ थे, जो कि सिर्फ़ बादशाह, शहज़ादों और हरम की औरतों के लिए थे.

चलते-चलते ग़ालिब हरेक आम को बड़े ध्यान से देख रहे थे.

बादशाह ने पूछा, ‘आप हर आम को इतने ध्यान से क्यों देख रहे हैं?’

शायर ने बड़ी गंभीरते से कहा, ‘मेरे मालिक और मेरे रहनुमा, एक बार किसी शायर ने कहा था कि हर आम पर, उसे खाने वाले का नाम लिखा होता है. मैं अपने दादा, पिता और अपना नाम तलाश रहा हूं.’बादशाह मुस्कुराए और उन्होंने शाम तक मिर्ज़ा ग़ालिब के घर एक बास्केट भर आम भिजवा दिए.

इसी तरह एक बार वो अपने बेहद करीबी दोस्त हकीम रज़ी उद्दीन ख़ान के साथ अपने घर के बरामदे में बैठे थे. उनके इस दोस्त को आम बिलकुल नहीं पसंद थे. तभी वहां से एक गधा-गाड़ी गुज़री. गधे ने रास्ते में पड़े आम के छिलके को सूंगा और अपना मुंह हटा लिया, फिर चलता बना.

हकीम साहब मिर्ज़ा ग़ालिब की तरफ़ मुड़े और तुरंत कहा, ‘देखो, यहां तक कि एक गधा भी आम नहीं खाता!’

ग़ालिब ने जवाब दिया, ‘इसमें कोई शक नहीं कि गधे आम नहीं खाते!’

हमने दाबे तुमने दाबे

गालिब के खास शिष्य और दोस्त अक्सर शाम के वक़्त उनके पास जाते थे. ऐसे ही एक दिन मीर मेहदी मजरूह बैठे थे और मिर्ज़ा पलंग पर लेटे कराह रहे थे. मीर मेहदी पांव दबाने लगे. मिर्ज़ा गालिब ने कहा ‘भई तू सय्यद ज़ादा है, मुझे क्यूं गुनहगार करता है?’ मेहदी नहीं माने और कहा ‘आपको ऐसा ही ख्याल है तो पैर दाबने की उजरत(पारिश्रमिक) दे दीजिएगा.’ जब वो पैर दबा चुके तो मेहनताना मांगा. मिर्ज़ा ने कहा ‘भैया कैसी उजरत? तुमने हमारे पांव दाबे, हमने तुम्हारे पैसे दाबे. हमने भी दाबे तुमने भी दाबे.’

आधा मुसलमान

मिर्ज़ा गालिब की चिट्ठियों में उस दौर के 1857 के गदर का जिक्र है. जब अंग्रेज दिल्ली में चुन-चुनकर मुसलमानों को गोली मार रहे थे या फांसी दे रहे थे. यमुना में लाशें बरामद होती थीं. उसी दौर में धर पकड़ के बीच मिर्जा गालिब को भी ले जाकर कर्नल ब्राउन के सामने पेश किया गया. सिर पर उनकी पहचान टोपी थी जिसकी वजह से उनके बारे में कर्नल ब्राउन ने अंदाजा लगाने की कोशिश की.

कर्नल ने कहा- वेल, मिर्ज़ा साहिब तुम मुसलमान है?

मिर्जा ने कहा – आधा मुसलमान हूं.

कर्नल ब्राउन ने हैरानी जताते हुए कहा- आधा मुसलमान? क्या मतलब?

मिर्ज़ा ने कहा- शराब पीता हूं, सुअर नहीं खाता.

ये सुनने के बाद कर्नल उनसे बहुत खुश हुआ और बाइज्जत उन्हें हवेली तक छुड़वाया.

दुआ करने से पहले कबूल हुई

मिर्जा गालिब आम के अलावा शराब के भी शौकीन थे. एक शाम शराब नहीं मिली तो नमाज़ पढ़ने चले गए. इतने में वहां एक चेला आया तो पता चला कि आज मिर्जा बिना शराब के हैं इसलिए यहां आए हैं. उसने शराब की बोतल का इंतजाम किया. मस्जिद के बाहर से शराब की बोतल मिर्जा गालिब को दिखाई. बोतल देखकर गालिब वुजू करके बाहर निकल आए.

बाहर निकलते हुए किसी ने पूछा- ये क्या कि बिना नमाज़ पढ़े चल दिए?

गालिब ने कहा- जिस चीज के लिए दुआ मांगनी थी वो तो ऐसे ही मिल गई.

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