अयोध्या विवाद: बातचीत से सुलह की कोशिशें हैं पुरानी, जानिए कब-कब हुए प्रयास

अयोध्या विवाद दशकों से देश के लिए सिरदर्द रहा है. उसने व्यापक तौर पर भारत की राजनीति और सामाजिक तानेबाने को प्रभावित किया है. हिंदू और मुसलमानों ने इस विवाद के चलते अपने कई साल अदालती लड़ाई में झोंके हैं और आज तक आखिरी फैसले का इंतज़ार कर रहे हैं.

इस बीच अदालतों और समाज के ज़िम्मेदार लोगों ने कई बार प्रयास किए कि कोर्ट के बाहर मिल-बैठकर समाधान खोज लिए जाएं. कानूनी तौर पर कोई फैसला हो उससे बेहतर है कि विमर्श के रास्ते व्यवधान खत्म हो. इसी सिलसिले में सभी पक्षों को देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा है कि वो बातचीत की तरफ बढ़ें, वरना तो फिर फैसला आएगा ही.

ऐसी नहीं है कि भारत के आज़ाद होने से भी पहले का ये विवाद कभी बात करके सुलझाने की कोशिश ना हुई हो, बल्कि ऐसा तो कई बार हुआ मगर परिणाम हर बार एक सा ही निकला.

आइए आपको बताते हैं कि बातचीत के जिस सिरे पर आज फिर से अयोध्या की जम़ीन के दावेदार खड़े हैं वो पहले भी कब-कब इस मसले पर सिर जोड़कर बैठे मगर नाकामयाब रहे.

 

अंग्रेजों ने शुरू की समझौते की कोशिश

मुगलों के पराभव के बाद अंग्रेज़ों ने देश की बागडोर संभाल ली. साल 1853 में अयोध्या में हिंदू-मुसलमानों के बीच पहले झगड़े का रिकॉर्ड मिलता है. इसके बाद कई बार दोनों पक्ष एक-दूसरे से उलझे. स्थानीय लोगों से ही पता चलता है कि रोज़ के झगड़ों से तंग आकर साल 1859 में स्थानीय निवासियों ने ही मिल बैठकर तय किया कि विवादित ज़मीन के एक हिस्से में मंदिर माना जाए और दूसरे में मस्जिद.

कहा जाता है कि हिंदू-मुसलमानों के बीच समझौते ने अंग्रेजों को परेशान किया. वो चाहते थे कि झगड़ा बरकरार रहे ताकि दोनों संप्रदाय किसी भी मामले में साथ ना खड़े हों. समझौते के दो पक्षकारों की हत्या कराके उनके शव पेड़ पर टांग दिए गए. नतीजतन अयोध्या को हिंसा देखनी पड़ी. ब्रिटिश पुलिस ने तारों की एक बाड़ खड़ी की और साल 1959 में विवादित ज़मीन में हिंदू-मुसलमानों को अलग-अलग पूजा करने की व्यवस्था बहाल की गई.

 

राजीव सरकार ने भी की कोशिशें

अपने छोटे से कार्यकाल मे पीएम राजीव गांधी ने हिंदू समुदाय के बीच अपनी साख कायम करनी चाही. हिंदू महासभा के अध्यक्ष एवं वर्तमान यूपी सीएम के गुरू महंत अवैद्यनाथ और सीएम वीर बहादुर सिंह के बीच बातचीत की सहमति बनी. बैठकें चलने लगीं. स्थानीय लोगों ने हिस्सा लिया. विश्व हिंदू परिषद और बाबरी एक्शन कमेटी की भी बैठकें चल रही थीं. लग रहा था कि बातचीत से कोई समाधान निकल ही आएगा. यहां तक कि मंदिर और मस्जिद दोनों के ही निर्माण के लिए एक समिति बनाने तक पर सहमति होती दिखी. समिति में दोनों पक्षों से पांच-पांच नाम शामिल होने थे. मुस्लिमों ने पांच नाम लिखकर दे दिए लेकिन जब हिंदुओँ की बारी आई तो विश्व हिंदू परिषद ने मामले को इस नुक्ते पर लटका दिया कि समिति में सिर्फ स्थानीय हिंदू ही शामिल नहीं होंगे.

 

फिर वीपी सिंह ने किया प्रयास

राजीव गांधी के सहयोगी और बाद में विरोधी रहे पीएम वीपी सिंह ने भी अयोध्या की आग ठंडी करनी चाही. वीपी सरकार 1989 में राम मंदिर के शिलान्यास के बाद बनी थी. ज़ाहिर है, तब तक विवाद चरम पर पहुंचने से ज़रा ही दूर था. वीपी सिंह ने पुराने ट्रैक पर फंसी बातचीत को ही आगे बढ़ाना चाहा. उनकी सरकार को बीजेपी का सहयोग हासिल था जिसका रुख बातचीत को लेकर सकारात्मक नहीं था. लालकृष्ण आडवाणी ने उस दौर में वो रथयात्रा निकाली जिसे आनेवाले वक्त में सियासत को घुमाकर रख देना था. तात्कालिक नतीजा यही हुआ कि वीपी सिंह की सरकार इसी चक्कर में गिर गई.

 

चंद्रशेखर ने भी जारी रखी कोशिशें

भले ही चंद्रशेखर थोड़े वक्त के लिए प्रधानमंत्री बने लेकिन अयोध्या का समाधान उनके एजेंडे से भी दूर नहीं था. ये ठीक है कि उन्होंने वार्ता को औपचारिक तौर पर आगे नहीं बढ़ाया लेकिन शरद पवार और भैरों सिंह शेखावत के ज़रिए समझौते की कोशिशें हुईं. ये गैर सरकारी प्रयास परवान चढ़ता उससे पहले ही चंद्रशेखर की सरकार गिर गई.

 

वाजपेयी की पहल भी असफल

जिस संघ परिवार ने राम मंदिर के बूते बीजेपी को भारतीय राजनीति में खड़ा किया उसकी सरकार बनी तो अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री हुए. वाजपेयी ने अयोध्या विभाग गठित कर दिया. शत्रुघ्न सिंह को नियुक्त किया गया जिन्होंने रुकी हुई बातचीत को गति लाने के लिए खूब अयोध्या प्रवास किए लेकिन सफलता मिल ही नहीं सकी.

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