नेहरू की वजह से भारत नहीं बन सका सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य – सच या झूठ ?

जब भी चीन संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के खिलाफ वीटो लगाता है तब एक पुराना विवाद उठ खड़ा होता है. चीन को वीटो शक्ति दिलाने में नेहरू की कितनी भूमिका रही ये हमेशा धुंधलके में रहा. आज इसी विवाद से हम धूल हटा रहे हैं.

भारत की सियासत आजकल एक दिलचस्प मोड़ पर है. भारत के राजनीतिक इतिहास की सबसे पुरानी पार्टी और भारत की सबसे इतिहास पसंद पार्टी एक दूसरे पर पिल पड़े हैं. दोनों एक-दूसरे का इतिहास खोद रहे हैं. पाप गिना रहे हैं. ‘भयंकर भूलें’ गिन रहे हैं. चूंकि कांग्रेस पुरानी है इसलिए उसके खाते में गलतियां भी  बीजेपी के मुकाबले ज़्यादा हैं. नेहरू और इंदिरा के शासन के राजनीतिक फैसलों का हिसाब राहुल गांधी से मांगने का एक सिलसिला चल निकला है.

ताज़ा हिसाब मांगा गया है नेहरू के उस सहयोग पर जिसके चलते चीन को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो का हक मिला था. जब-जब चीन का वीटो संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत पर भारी पड़ता है तब-तब कांग्रेस विरोधी नेता नेहरू को घेरने लगते हैं. इल्ज़ाम लगाते हैं कि नेहरू का साथ ना मिला होता तो चीन कभी उतना ताकतवर नहीं होता कि भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ में नीचा देखना पड़े. आइए एक फैक्ट चैक करते हैं इस इल्ज़ाम में अगर दम है तो कितना है..

 

पश्चिम की दादागीरी के सामने पड़ोसी का समर्थन

भारत उन 26 देशों में से एक रहा है जिसने 1942 की जनवरी में संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए थे. इसके बाद 25 अप्रैल 1945 को सैन फ्रांसिस्को में दो महीनो तक चले 50 देशों के संयुक्त राष्ट्र स्थापना सम्मेलन में भी भारत शामिल हुआ था. आगे चलकर इसी सम्मेलन में पारित आखिरी घोषणापत्र की औपचारिक पुष्टि करनेवालों में भारत की ब्रिटिश सरकार का नाम भी था.

उस दौर में चीन च्यांगकाई शेक और माओत्से तुंग के संघर्ष का गवाह बन रहा था. वामपंथी विचार चीन की राजनीति को फतह कर लेना चाहते थे. वहीं पूंजीवाद के प्रतिनिधि अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस चाहते थे कि वामपंथी हार जाएं. 1945 में चीन के नाम की सीट च्यांगकाई शेक की राष्ट्रवादी चीन सरकार के नाम कर दी गई, लेकिन पश्चिम के ठेकेदारों की उम्मीदें तब धराशायी हो गईं जब गृहयुद्ध में विजेता के तौर पर वामपंथी उभरे. च्यांगकाई शेक को ताइवान में शरण लेनी पड़ी और एक नई सरकार की स्थापना कर दी. उस सरकार को पश्चिमी देशों के पूंजीवादियों का समर्थन हासिल था.

उधर साल 1947 में आज़ाद हुए भारत की कमान प्रधानमंत्री के तौर पर पंडित जवाहरलाल नेहरू को मिली. वही विदेशमंत्री भी थे. उन्हें तय करना था कि नए नवेले भारत की विदेशनीति क्या हो. पड़ोसियों से संबंध भी उन्हें ही निश्चित करने थे. समाजवादी विचार वाले नेहरू ने सोवियत और चीन से सहयोग की नीति पर चलने का फैसला लिया. चीन की वामपंथी सरकार को मान्यता देना उसी सहयोग की नीति का पहला कदम था.

 

एक खत ने स्पष्ट किया जवाहरलाल नेहरू का रुझान

हाल ही में चीनी सरकार को मान्यता देने के साल भर के अंदर उन्हें मिले एक पत्र की चर्चा उभरी. ये खत नेहरू को उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित ने लिखा था. विजयलक्ष्मी तब अमेरिका में भारत की राजदूत थीं. उन्होंने लिखा, ‘अमेरिकी विदेशमंत्रालय में चल रही एक बात आपको मालूम होनी चाहिए. वो है, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता वाली सीट से चीन (ताइवान की राष्ट्रवादी सरकार) को हटाकर भारत को देना. इस सवाल पर तुम्हारा उत्तर मैंने हाल ही में रॉयटर्स में देखा है. पिछले हफ्ते मैंने डलेस (अमेरिकी विदेशनीति को आकार देनेवालों में से एक) और जेसप (फिलिप) से बातें की. दोनों ने सवाल उठाया और डलेस व्यग्र लगे कि इस दिशा मे कुछ करना चाहिए.  पिछली रात वॉशिंगटन के प्रभावशाली कॉलमिस्ट मार्किस चाइल्ड्स से मैंने सुना कि डलेस ने विदेश मंत्रालय की ओर से उनसे इस नीति के पक्ष में जनमत बनाने को कहा है. मैंने हम लोगों का उन्हें रुख बताया और सलाह दी कि वो इस मामले में धीमा चलें क्योंकि भारत में इसका गर्मजोशी से स्वागत नहीं होगा.’

इस खत का जवाब नेहरू ने 30 अगस्त 1950 को दिया है. उन्होंने लिखा कि, ‘ तुमने लिखा है कि विदेश मंत्रालय (अमेरिकी) सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता वाली सीट पर से चीन को हटाकर भारत को उस पर बैठाने की कोशिश कर रहा है. जहां तक हमारा सवाल है, हम इसका अनुमोदन नहीं करेंगे. हमारी दृष्टि से ये एक बुरी बात होगी. चीन का साफ अपमान होगा और चीन तथा हमारे बीच एक तरह से बिगाड़ पैदा करेगा. मैं समझता हूं कि भले ही अमेरिकी विदेश मंत्रालय इसे पसंद ना करे लेकिन हम इस रास्ते पर नहीं चलना चाहते. हम संयुक्त राष्ट्र में और सुरक्षा परिषद में चीन की सदस्यता पर ज़ोर देंगे.’

एशिया को विवाद का अखाड़ा बचाने के खिलाफ नेहरू

नेहरू ने खत में आगे ये भी लिखा कि अगर संयुक्त राष्ट्र संघ में जानेवाले चीन के प्रतिनिधिमंडल को रोका गया तो समस्या पैदा होगी. उन्हें चीन के विरोध में संयुक्त राष्ट्र संघ का अंत नज़र आया, साथ ही उन्होंने इसे युद्ध की ओर लुढ़कना भी कहा. उन्हें सोवियत संघ के संयुक्त राष्ट्र से मोहभंग की भी आशंका थी. ऐसा स्वाभाविक था क्योंकि आठ महीनों से सोवियत संघ सुरक्षा परिषद की बैठक में भाग नहीं ले रहा था. उसे नाराज़गी थी कि 1 अक्टूबर 1949 को चीन में वामपंथियों की सत्ता स्थापित होने के बावजूद उसे संयुक्त राष्ट्र में सदस्यता नहीं दी गई थी. वहीं उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया का संघर्ष भी 25 जून 1950 में शुरू हो गया था. उत्तर कोरिया वामपंथी देश था और चीन-सोवियत संघ को उसका समर्थन करना ही था. संयुक्त राष्ट्र की बैठक में सोवियत यूनियन भाग नहीं ले रहा था इसलिए अमेरिका का पलड़ा भारी था. उसने निंदा प्रस्ताव पास करा लिया. भारत भी युद्ध के खिलाफ था. उसने भी प्रस्ताव का समर्थन किया. अमेरिका को लगा कि भारत को भविष्य में भी अपने पाले में किया जा सकता है. अमेरिका ने छोटे से ताइवान को हटाकर भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट पर बैठाना ठीक समझा. ऊपर से भारत वामपंथी देश भी नहीं था. अमेरिका संयुक्त राष्ट्र के वीटो क्लब में भारत को शामिल करने से पहले पूरी तरह आश्वस्त होना चाहता था कि वो भी ऐसा ही चाहता हो लेकिन भारत अपने पड़ोसी की कीमत पर ये सदस्यता नहीं चाहता था. नेहरू चीन के प्रति हमदर्दी का रुख रखते थे. यही हमदर्दी तब भी दिखी जब 1955 में सोवियत पीएम बुल्गानिन ने सुझाव दिया कि भारत अगर चाहे तो सुरक्षा परिषद सदस्यों की संख्या छह करके उसमें भारत को भी शामिल किया जा सकता है. नेहरू ने तब भी यही कहा कि वामपंथी चीन को पहले जगह मिलनी चाहिए. सोवियत यूनियन और चीन के बीच भी खटास पैदा होने लगी थी. स्टालिन की मौत के बाद माओत्से तुंग और सोवियत यूनियन के नए नेता निकिता ख्रुश्चेव के बीच दूरी बन गई. इसी दूरी का नतीजा ये निकला कि सोवियत यूनियन ने भारत में रुचि बढ़ा दी.

 

आखिरकार चीन निकला धोखेबाज़ यार

साल 1962 में चीन ने भारत के भाईचारे की परवाह ना करते हुए अंतर्राष्ट्रीय सीमा का खुला उल्लंघन कर दिया. जिस टकराव से भारत बचना चाह रहा था चीन उसी में पड़ना चाहता था. चीन ने अपने किसी पड़ोसी को बिना लड़े नहीं बख्शा. तिब्बत के मामले में तो भारत ना चाहकर भी पड़ा. दलाई लामा भारत में शरण लेने चले आए थे. नेहरू ने उन्हें स्वीकार किया लेकिन चीन के खिलाफ तिब्बत में कोई सैन्य अभियान नहीं छेड़ा.  नेहरू चीन के धोखे के बाद चल बसे. चीन अपनी विस्तारवादी नीति पर चलता रहा.

1971 तक चीन की सीट पर ताइवान बना रहा. उस साल अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन के सलाहकार हेनरी किसिंजर का ऐतिहासिक चीन दौरा हुआ. तब तय हुआ कि निक्सन के दौरे से पहले ताइवान को सुरक्षा परिषद की सीट से हटाकर चीन को जगह दी जाएगी. 25 अक्टूबर 1971 को मतदान के बाद चीन को संयुक्त राष्ट्र में जगह मिली. 128 सदस्यों में से 76 ने चीन का पक्ष लिया जबकि 35 विपक्ष में थे. 17 ने मतदान में हिस्सा ही नहीं लिया.  ताइवान को सुरक्षा परिषद और संयुक्त राष्ट्र संघ दोनों से हाथ धोना पड़ा.

भारत को जब तक सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट की अहमियत का अहसास होता तब तक देर हो चुकी थी. कश्मीर मामला फंसा तो भारत असहाय नज़र आया. वो अपनी रक्षा के लिए सोवियत यूनियन के भरोसे रह गया. पाकिस्तान के पाले में अमेरिका भी दिखा और चीन भी लेकिन भारत क्या करता. अब कई दशकों से भारतीय नेतृत्व संयुक्त राष्ट्र संघ में अपना हक मांग रहा है लेकिन बदले हालात में मज़बूत दावे के बावजूद भारत के हाथ खाली हैं.

 

Related Posts