क्‍या अखिलेश यादव के दूसरे ‘घर’ में भगवा फहरा पाएंगे निरहुआ?

आज़मगढ़ का चुनाव कभी इतना दिलचस्प नहीं था जितना अब है. अखिलेश यादव पहली बार इस लोकसभा क्षेत्र से किस्मत आज़मा रहे हैं तो उनसे ही लोकभारती सम्मान लेनेवाले निरहुआ बीजेपी की तरफ से ताल ठोकते हुए दावा कर रहे हैं कि मुझे हरानेवाला पैदा ही नहीं हुआ.

यूपी की आज़मगढ़ उन सीटों में से एक है जिसे समाजवादी पार्टी 2014 की मोदी लहर में भी बचा पाने में कामयाब रही थी. समाजवादी पार्टी का झंडा उठाए मुलायम सिंह यादव तब यहां से प्रत्याशी थे और उन्होंने बीजेपी के रमाकांत यादव को आराम से हरा दिया था.

मोदी की हवा में भी चुनाव ना जीत पाने वाले रमाकांत यादव पुराने कद्दावर नेता रहे हैं. 1996, 1999 में मुलायम की ही पार्टी से, 2004 में बहनजी के आशीर्वाद से और 2009 में बीजेपी के निशान पर उन्होंने यहीं से जीत दर्ज की थी. इस बार वो कांग्रेस को भदोही में जितवाने का प्रयास कर रहे हैं. मुलायम मैनपुरी से चुनाव लड़ने चले गए हैं. बीएसपी ने ये सीट समाजवादी पार्टी के खाते में डाल दी है. ऐसे में पुरानी सियासी तस्वीर एकदम बदल चुकी है. आज़मगढ़ का अखाड़ा इस बार नए पहलवानों का दमखम देख रहा है.

टीपू भैया बनाम निरहुआ हिंदुस्तानी
समाजवादी पार्टी से खुद अखिलेश यादव आज़मगढ़ में उम्मीदवार बने हैं तो बीजेपी ने भोजपुरी फिल्मों के चमकीले चेहरे दिनेशलाल यादव निरहुआ को प्रत्याशी बनाया है. कांग्रस ने गठबंधन में ना होने के बावजूद उम्मीदवार खड़ा नहीं किया है.

निरहुआ का उदय 2005 में तब हुआ था जब उन्होंने बैक टू बैक पांच बड़ी फिल्में देकर अपनी पहचान स्थापित की. उन्हें बिग बॉस शो में भी देखा गया. 2008 में आई फिल्म निरहुआ रिक्शावाला ने कमाई के कई कीर्तिमान ध्वस्त किए तो दिनेशलाल यादव भी शोहरत के शीर्ष पर जा चढ़े. यहीं से उनके नाम के पीछे जुड़ गया- निरहुआ. अपनी पहचान को उन्होंने जमकर कैश किया और दो फिल्में निरहुआ हिंदुस्तानी के नाम से भी बनाईं.

nirhua, क्‍या अखिलेश यादव के दूसरे ‘घर’ में भगवा फहरा पाएंगे निरहुआ?

दूसरी तरफ अखिलेश यादव आज़मगढ़ को इटावा के बाद अपना दूसरा घर बताते हैं. वो अपना और आज़मगढ़ का प्यार का रिश्ता बताते हैं.

निरहुआ ने अपने प्रचार के दौरान अखिलेश यादव पर बाहरी होने के आरोप लगाए हैं. टीवी9 भारतवर्ष से बातचीत में तो उन्होंने कहा कि जब अखिलेश के पास वोट मांगने तक का समय नहीं है तो जनता को समझ आ गया है कि वो जीतने के बाद कितना दिखाई देंगे. निरहुआ का ये आरोप भी था कि दलित और मुस्लिम बस्ती में बीजेपी का झंडा लगने के बाद अखिलेश यादव के लोग बंदूक दिखाकर झंडा उतारने को कह रहे हैं.

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मतदान के दिन तो निरहुआ का आत्मविश्वास आसमान से भी ऊंचा दिखा. उन्होंने कैमरे पर कहा कि उन्हें हरानेवाला पैदा नहीं हुआ.

निरहुआ को भरोसा है कि नेताओं का गठबंधन होने से वोटर्स का मिलाजुला वोट अखिलेश को नहीं मिलेगा. वैसे ये भी दिलचस्प है कि अखिलेश सरकार ने ही निरहुआ को यशभारती सम्मान दिया था.

आज़मगढ़ किसे बनाएगा सांसद
आज़मगढ़ संसदीय क्षेत्र में यादव, मुस्लिम और दलित मतदाता 49 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं. इनमें भी यादव वोटर सबसे बड़ी तादाद में है. यही समीकरण देखते हुए शायद बीजेपी ने निरहुआ का जाति फैक्टर ध्यान में रखा. स्थानीय सियासी जानकारों के अनुसार आज़मगढ़ लोकसभा क्षेत्र में करीब 19 लाख मतदाताओं में से साढ़े तीन लाख से ज़्यादा यादव, तीन लाख से ज्यादा मुसलमान और करीब तीन लाख दलित हैं.

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आजमगढ़ लोकसभा क्षेत्र के तहत पांच विधानसभा सीटें आती हैं जिनमें से आजमगढ़ सदर, गोपालपुर और मेहनगर पर समाजवादी पार्टी का कब्जा है तो सगड़ी और मुबारकपुर बहुजन समाज पार्टी के पास हैं. पत्रकार जयशंकर गुप्ता कहते हैं कि बीजेपी मानती है कि वो इस सीट को जीत नहीं सकती. ये सपा का गढ़ रहा है. सपा प्रत्याशी ही जीतते रहे हैं.

उधर बीजेपी उम्मीद जता रही है कि योगी आदित्यनाथ और पीएम मोदी के प्रचार और निरहुआ का स्टारडम सपा के इस किले को भेद देगा. 12 मई का मतदान ही हर अनुमान का जवाब देगा.