ट्रंप-रूहानी में नंबर गेमः 52 के जवाब में क्यों दिलाई 290 की याद, IR655 की पूरी कहानी

साल 1988 की तारीख तीन जुलाई को ईरान कभी नहीं भूल सकता. उस दिन ईरान एयर के दुबई जा रहे एयरबस ए300 ( IR655 ) विमान को खाड़ी हवाई क्षेत्र के ऊपर मार गिराया गया था.

प्रतीकात्मक तस्वीर

ईरान और अमेरिका में लंबे समय से चली आ रही खटास एक बार फिर से दुनिया भर की निगाहों में आ गई है. इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के जनरल कमांडर कासिम सुलेमानी को इराक के बगदाद में ड्रोन स्ट्राइक के जरिए मौत के घाट उतारने के बाद अमेरिका और ईरान आमने-सामने हैं. दोनों देशों में तनाव बढ़ता ही जा रहा है. दोनों ही एक-दूसरे को युद्ध की धमकी दे रहे हैं.

इसके पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के 52 ठिकानों पर निशाने की बात कही थी. इन 52 ठिकानों को ईरान की ओर से साल 1979 में बंधक बनाए गए 52 अमेरिकी डिप्लोमैट्स और नागरिकों से जोड़कर देखा जा रहा था. ट्रंप ने ट्वीट किया था कि निशाने पर रखे गए ईरान के सभी 52 ठिकाने ईरानियन संस्कृति में बेहद अहम माने जाते हैं.

इसके बदले में ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने सोमवार देर शाम अमेरिका को जुलाई 1988 की घटना याद दिलाई, जब यूएस वॉरशिप ने ईरानी यात्री विमान पर हमला किया था जिसमें 290 लोगों की मौत हो गई थीं. हसन रूहानी ने ट्वीट किया, ‘जो 52 नंबर का जिक्र कर रहे हैं उन्हें 290 नंबर भी याद रखना चाहिए. #IR655 ईरानी देश को कभी धमकी न देना.’

क्या है पूरा मामला

साल 1988 की तारीख तीन जुलाई को ईरान कभी नहीं भूल सकता. उस दिन ईरान एयर के दुबई जा रहे एयरबस ए300 (IR655) विमान को खाड़ी हवाई क्षेत्र के ऊपर मार गिराया गया था. यूएस वॉरशिप (अमरीकी युद्धपोत) यूएसएस विंसेन्नेस ने ईरान के इस यात्री विमान पर दो मिसाइलें दागी थी. उसमें सवार सभी 290 यात्री और चालक दल के सदस्य मारे गए थे. इनमें 66 बच्चे भी शामिल थे.

अमेरिका ने माफी मांगने की जगह इसका ठीकरा ईरान पर ही मढ़ने की कोशिश की. अमेरिका की ओर से कहा गया कि वो वित्तीय एयरलाइन्स के लिए तय रूट के बाहर चल रहा था. वहीं दूसरे तर्क के रूप में सामने आया था कि अमेरिका ने उसे एफ-14 लड़ाकू विमान समझकर मार गिराया था. साल 1979 में ईरानी क्रांति से पहले एफ-14 लड़ाकू विमान ईरान को बेचा गया था.

फोटो ट्विवटर से

ईरान ने इस घटना को ‘आपराधिक कार्रवाई’, ‘ज़ुल्म’ और ‘नरसंहार’ करार दिया था. पहले अमेरीका लगातार जोर देता रहा कि यह गलती से हो गया था. ईरान ने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) में अमेरिका के खिलाफ केस ठोक दिया था. साल 1996 में ही जल्दी केस खत्म हो गया. कोर्ट के बाहर दोनों पक्षों ने समझौता कर लिया. अमेरिका ने खेद जताया और मरनेवालों के परिजनों को हर्जाना भी दिया था. अब फिर से दोनों देशों के बीच खटास वाले मुद्दों को याद दिलाने की कोशिशें तेज हो गई है.

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