सुन लो पाकिस्तान, भारत भी अब 1971 वाला नहीं, अगर उलझे तो फिर होंगे दोफाड़ !

पाकिस्तानी सेना अक्सर भारत को गीदड़भभकी देकर अपने लोगों को खुश करती है. वो भारत को याद दिलाते हैं कि अब हम 1971 जितने कमज़ोर नहीं, लेकिन इन बयानबाज़ियों के बीच वो जो कुछ भूलता है उसे ज़रूर पढ़िए.

भारत-पाकिस्तान के बीच तल्ख होते रिश्तों की कड़वाहट रोज़ बढ़ रही है. पाकिस्तानी सेना इसमें बढ़-चढ़कर योगदान कर रही है. अब ताज़ा बयान पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर की ओर से आया है. उन्होंने कहा कि भारत ज़हन में रखे कि ये 1971 नहीं है. गफूर भारत को समझाने की कोशिश में थे कि अगर कोई हमला किया गया तो पाकिस्तान उसका माकूल जवाब देगा.

हैरत है कि जब पुलवामा-बालाकोट प्रकरण समाप्त हो चुका है तब भी पाकिस्तानी सेना लगातार बयानबाज़ी करके भारत को भड़काना क्यों चाहती है? भारत में लोकसभा चुनाव जारी है, मगर पाकिस्तान की ऐसी क्या मजबूरी है कि वो उकसावे भरे बयान दे रहा है इसे समझ पाना मुश्किल हो रहा है.
हालांकि गफूर ‘ये 1971 नहीं है’ जैसा बयान पहली बार नहीं दे रहे. ये उनकी रोज़मर्रा की प्रेस ब्रीफिंग का पसंदीदा शब्द बन गया है पर ना जाने क्यों उन्हें इस बात का अहसास नहीं या कोई उन्हें याद नहीं दिला रहा कि वक्त पाकिस्तान में ही नहीं भारत में भी बदला है. अगर पाकिस्तान वो नहीं तो भारत भी वो कहां रहा.. और तो और दुनिया ही पूरी तरह बदल चुकी है.

1971 से अब तक भारत और पाकिस्तान के बीच कितना कुछ बदला है आइए बात करते हैं.

सीधी लड़ाई छोड़ छिपकर लड़ने लगा पाकिस्तान
बांग्लादेश की आज़ादी के बाद वो साल 1974 था जब भारत ने पहला परमाणु परीक्षण किया. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य ना होने के बावजूद ऐसे परीक्षण करनेवाला भारत पहला देश था.
इसके बाद भारत में आपातकाल और अस्थिर सरकारों का दौर चला. 1988 में दोनों देशों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत एक-दूसरे की परमाणु प्रयोगशालाओं पर हमले ना करने पर सहमति बनी. इस साल तक कश्मीर में आतंकवाद पनपने लगा था. पाकिस्तान कश्मीर की अंदरूनी राजनीतिक स्थिति का लाभ लेने के लिए परोक्ष युद्ध में शामिल हो गया. वहीं सोवियत यूनियन अफगानिस्तान से हटने लगा तो हथियारबंद मुजाहिद्दीन अगली लड़ाई के लिए पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पहुंचने लगे. पाकिस्तान जानता था कि भारत से सीधी लड़ाई वो झेल नहीं पाएगा इसलिए अब उसने इन मुजाहिद्दीनों में निवेश करना शुरू किया. मौलाना मसूद अज़हर जैसे आतंकी भी उसी दौर में अफगानिस्तान के मोर्चे से हटकर कश्मीर को भारत से अलग कराने में जुटे थे.

masood azhar
भारत में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति में उभार के बाद कश्मीर गर्म भट्ठी बन गया. ISI इसी भट्ठी में रोटी सेंक रही थी. उसने अफगानिस्तान में काम  से खाली हो चुके आतंकवादियों को हथियार और पैसा देकर भारत में घुसपैठ करा दी. तब भारत सरकार ने तेजी से हिंसक तत्वों का दमन करना शुरू किया लेकिन पाकिस्तान ने उस दमन को मुसलमान और कश्मीरी से जोड़कर आग में घी डाला. बांग्लादेश का टूटकर अलग होना पाकिस्तान से बर्दाश्त नहीं हो पा रहा था. वो किसी भी तरह कश्मीर को भारत से अलग करके हिसाब बराबर करना चाहता था.

तब भारत का दोस्त था रूस, अब सारी दुनिया
भारत को सहारा देनेवाले सोवियत यूनियन नब्बे का दशक शुरू होने से पहले ही टूट गया. अब वो रूस था. भारतीय नेतृत्व समझ गया कि रूस पर निर्भर उसके विदेशी संबंधों का दौर खत्म हो चला है और अब ज़मीनी हकीकत समझते हुए दूसरे देशों से रिश्ते बनाने की ज़रूरत है. पीवी नरसिंहराव के काल में आर्थिक संकटों के बादल छाए तो उदारीकरण ने भारत से छिटके पश्चिम को आकर्षित भी किया. दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत थी. ये भविष्य में भारत और पश्चिमी दुनिया के बीच प्रगाढ़ होने जा रहे संबंधों की भूमिका का काल था. शुरू में भारतीय बाज़ार ने पश्चिम का सामान खपाया और धीरे-धीरे हथियार खरीद तक बात जा पहुंची. पाकिस्तान उतना बड़ा बाज़ार नहीं था और ना खरीदने की क्षमता ही भारत जितनी रखता था. भारत के मध्यम वर्गीय तबके की ताकत ने पाकिस्तान को इस दौड़ में हरा दिया. तकनीक सीखने की चाहत और सेवा क्षेत्र में भारतीयों के प्रवेश ने दुनिया को बता दिया कि भारत 21वीं सदी की बड़ी ताकत बनने की ओर अग्रसर है, वहीं पाकिस्तान भारत विरोध में उलझकर ही राष्ट्रीय नीतियां बना रहा था.

हथियारों की लड़ाई में भारत ने लहराया परचम
फिर मई 1998 आया. भारत ने पांच परमाणु परीक्षण करके दुनिया को बता दिया कि वो परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र है. पाकिस्तान ने भी देरी नहीं की. गुपचुप ढंग से उसका ये मिशन चल ही रहा था. मई महीने के अंत तक उसने छह परमाणु परीक्षण कर दिए. ये राजनीतिक दौर अटल बिहारी वाजपेयी और नवाज़ शरीफ का था.

दुनिया दक्षिण एशिया के इन दोनों मुल्कों के संभावित टकराव से सहमी थी और अमेरिका भी तरह-तरह के प्रतिबंधों से दबाव बढ़ा रहा था. भला तब किसने अपेक्षा की थी कि खराब होती तस्वीर अचानक ही चमकेगी. फरवरी 1999 में वाजपेयी बस में सवार होकर लाहौर जा पहुंचे और नवाज़ शरीफ ने भी गर्मजोशी से उनका स्वागत किया. भारत-पाकिस्तान अपने संबंधों के सबसे मधुर दौर को देख रहे थे. आम लोगों के बीच भी मनमुटाव कम होने लगा. मीडिया में लड़ाइयों की बात छोड़ दोस्तियों की खबरें बन रही थीं. साहित्यकारों और कलाकारों ने भी अपनी गतिविधियां बढ़ाईं… मगर मिलाप की वो टीवी फुटेज पुरानी भी नहीं पड़ी थीं कि गर्मी आते-आते कारगिल में पाकिस्तानी सेना की कारस्तानी खुल गई जिसके सूत्रधार जनरल परवेज़ मुशर्रफ थे.

’71 के बाद भारत को कमज़ोर समझना पाकिस्तानी भूल निकली
जनरल परवेज़ मुशर्रफ को लगा कि तीन दशक बीतने के बाद पाकिस्तानी सेना सामरिक और रणनीतिक तौर पर इतनी परिपक्व हो गई है कि कश्मीर को भारत से काटा जा सकता है. जम्मू-कश्मीर अंदरुनी उठापटक से जूझ भी रहा था. हथियारबंद लड़ाके हिंसा फैलाने में लगे थे और खुद भारत केंद्रीय स्तर पर राजनीतिक खींचातान में उलझकर बस संभला ही था. मुशर्रफ ने इस मौके को मुफीद समझा और कबायलियों के वेश में पाकिस्तानी सेना को सीमा पार कराके भारतीय चोटियों पर कब्ज़ा करा दिया.

भारतीय सेना ने घुसपैठियों के खिलाफ जोरदार ऑपरेशन चलाकर अपनी ही ज़मीन पर कब्ज़ा वापस ले लिया. पाकिस्तान इस झटके से हिल गया. नेतृत्व अपनी सेना से उलझा, नतीजतन सत्ता परिवर्तन हो गया. कारगिल के सूत्रधार ने देश की बागडोर संभालकर जनता के चुने नेता को अपदस्थ कर दिया. लगा कि सेना की अगुवाई में पाकिस्तान ज़ोरदार टकराव मोल लेगा मगर मुशर्रफ 2001 में आगरा आए और बातचीत की टेबल पर उन्हें भी बैठना पड़ा. वो समझ गए कि सेना चलाने और मुल्क चलाने में फर्क है. उन्हें समझ ये भी आ गया कि अपने पूर्ववर्तियों की तरह उन्हें भी भारत के हाथों जंग के मैदान में सिर्फ मात ही मिलेगी.

9/11 ने पाकिस्तान का नकाब भी उतारा
जिस साल मुशर्रफ आगरा आए, उसी साल सितंबर में  न्यूयॉर्क ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर ऐसा दिल दहलाने वाला आतंकी हमला झेला कि पूरे पश्चिम का आतंक के प्रति नज़रिया ही बदल गया. जिस दर्द को भारत बार-बार पश्चिम से साझा करता था और कोई सुनता नहीं था, अचानक ही सभी उसकी टीस महसूस करने लगे. अगले ही महीने जम्मू-कश्मीर की विधानसभा और उसके दो महीने बाद संसद पर भी जैश के आतंकी हमले हुए.
पाकिस्तान से भारत के बनते संबंध फिर खराब हो गए. भारतीय सेना सीमाओं पर कूच करने लगी. एक बार फिर पश्चिमी ताकतों ने भारत-पाकिस्तान के टकराव को रोका.

2004 में वाजपेयी अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष में थे. मुशर्रफ से उनकी बातचीत ने रफ्तार पकड़ ली. लगा कि कश्मीर समेत कई मुद्दों का हल आखिरकार हो जाएगा. मुशर्रफ ने पाकिस्तान में आतंकवदी संगठनों की मुश्कें कस के संदेश भी दिया कि वो गंभीर हैं. फिर भारत में लोकसभा चुनाव हुए. इस बार कसौटी पर वाजपेयी खरे नहीं उतरे और सरकार से बाहर हो गए.

2007 में भारत-पाकिस्तान के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस में धमाका हुआ और शांति प्रयासों को धक्का लगा. तत्कालीन सरकारों ने धैर्य से काम लिया और कश्मीर में धीरे-धीरे आ रही शांति को बनाए रखने के लिए घाटी से व्यापार करने के लिए रास्ते खोल दिए.

आतंकवादियों को ये सब रास नहीं आ रहा था. 2008 में आखिरकार आतंकी कामयाब हुए. मुंबई में हमला किया गया और आहत भारत ने पाकिस्तान में शरण लिए आतंकवादियों को सौंपने के लिए सख्ती से कहा. एक अच्छा खासा माहौल बिगड़ गया.

दौर बदला लेकिन पाकिस्तान नहीं सुधरा
2014 में यूपीए का शासन समाप्त हुआ. फिर से एनडीए सत्ता में लौटा. पाकिस्तान से सख्त लहज़े में पेश आने की नसीहत देनेवाले मोदी प्रधानमंत्री बने. लगा कि भारत की नीति पाकिस्तान के खिलाफ उदार नहीं रहनेवाली लेकिन मोदी ने अपने शपथग्रहण में पड़ोसी देशों के नेताओं को बुलाया तो पाकिस्तान भी इसमें शामिल था. 2015 में पीएम मोदी अचानक ही लाहौर में नवाज़ शरीफ के जन्मदिन और नातिन की शादी में जा पहुंचे. किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने 2004 के बाद पहली बार पाकिस्तान का दौरा किया था.

महीना भर नहीं बीता कि पठानकोट में घुसकर आतंकियों ने सात जवानों को मार गिराया. भारत ने पाकिस्तान से शिकायत की. पाकिस्तान ने एक जांच दल को पठानकोट भेजा. लगा कि आतंकवाद के खिलाफ दोनों मुल्कों में गंभीर तालमेल बन गया है, लेकिन पाकिस्तान की जांच समिति ने मामला लटका कर साबित कर दिया कि पाकिस्तान सरकार की नीयत साफ नहीं है. 2016 के मध्य में घाटी के आतंकियों का पोस्टरबॉय बुरहान वानी मार गिराया गया तो महीनो तक कश्मीर अशांत रहा. पाकिस्तान इसमें भूमिका निभाने से बाज नहीं आया. पटरी पर आए घाटी के हालात बेपटरी हो गए. इसके दो महीने बाद उरी स्थित सेना के बेस में आतंकवादियों ने हमला कर 18 जवानों को शहीद कर दिया. भारत ने इसका जवाब पीओके स्थित आतंकी कैंपों में एक सर्जिकल स्ट्राइक से दिया.

2017 में तो अमरनाथ यात्रियों तक पर हमला हुआ. हर हमले के साथ पाकिस्तान के प्रति भारत में तल्खी बढ़ती गई. 2018 में सुंजवान में भी सेना के कैंप पर हमला करके 11 जवानों को शहीद कर दिया गया. 2019 में पुलवामा का बड़ा आतंकी हमला हुआ जिसमें 40 जवानों की शहादत के बाद भारत ने पाकिस्तान में घुसकर बालाकोट स्थित आतंकी ट्रेनिंग कैंप पर बम बरसा दिए. इसके अगले दिन दोनों देशों के हवाई जहाज एक-दूसरे की वायुसीमा के अतिक्रमण में लगे रहे. इसी दौरान भारत के एक मिग-21 ने पाकिस्तान के तेज़ तर्रार एफ-16 को गिराया लेकिन खुद भी क्रैश हो गया. भारतीय पायलट को पाकिस्तान ने 48 घंटों तक अपने पास रखा लेकिन फिर रिहा कर दिया.

1971 के मुकाबले भारत आज बहुत मज़बूत
ज़ाहिर है, 1971 को आज 48 साल बीत गए हैं. पाकिस्तान में लोकतंत्र की बहाली हुई. चीन ने उसे सहारा दिया है. अब वो परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र है, लेकिन इन पांच दशकों में भारत की सैन्य-असैन्य उपलबधियों का लेखाजोखा पाकिस्तान को सिर्फ शर्मिंदा ही करेगा. दोनों की कोई तुलना ही नहीं है. भारत का मुकाबला चीन और अमेरिका से है. वहीं पाकिस्तान इन दोनों का मोहरा भर है. राजनीतिक विश्लेषक को पाकिस्तानी पीएम को सेना का मोहरा भी कहते हैं.

भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की पोल खोल जमकर की है. हाफिज़ सईद जैसे आतंकियों को पाकिस्तान के दोस्त अमेरिका तक ने बैन किया है. दुनिया का सबसे कुख्यात आतंकी लादेन पाकिस्तान मिलिट्री एकेडमी से चंद कदमों की दूरी पर छिपा मिला था. नए अमेरिकी नेतृत्व ने पाकिस्तानियों को नए वीज़ा देने से तौबा कर ली है. देश कभी भी ब्लैक लिस्ट हो सकता है. मसूद अज़हर को बचाने वाला चीन भी अब अपने फैसले पर फिर विचार कर रहा है. भारत का सैन्य बेड़ा पहले से अधिक समृद्ध है. इस सबसे अलग खुद भारत हथियारों का निर्माण करने में सक्षम हो चुका है. अंतरिक्ष तक में दुश्मन की खुफिया सैटेलाइट को मार गिराने की भारतीय क्षमता से दुनिया परिचित हो चुकी है.

ऐसे में पाकिस्तान का बार-बार 1971 को याद करना बताता है कि उसका ज़ख्म आज तक ताज़ा है. उस बिलबिलाहट में पाकिस्तानी सेना भारत को धमकाती रहती है. डर बस यही है कि मुशर्रफ की तरह खुद को काबिलियत से ज़्यादा आंकना पाकिस्तान के लिए नुकसानदेह तो होगा ही, भारतीय उपमहाद्वीप के लिए भी खराब होगा. भारत की परिपक्वता से अब तक शांति कायम है.

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