, पुलवामा की तरह ही ‘कड़वी’ हैं ये आवाजें!
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पुलवामा की तरह ही ‘कड़वी’ हैं ये आवाजें!

, पुलवामा की तरह ही ‘कड़वी’ हैं ये आवाजें!

देश के सामने आज जो सबसे बड़ा मुद्दा है वो है पुलवामा. लक्ष्य है- हमले के दोषियों को न भूलने वाला सबक सिखाना. सत्ता में बैठी जमात किसी भी हद तक जाकर कार्रवाई का भरोसा दे रही है. सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी ‘अब तक’ उसके साथ है. तीसरा खेमा कश्मीर की राजनीति से जुड़े चेहरों का जो सीआरपीएफ जवानों पर हमला करने वाले युवा कश्मीरी फिदायीन को बाकी कश्मीरियों से अलग दिखाने की भरपूर कोशिश में हैं. ये तीनों ही खेमे कहीं-न-कहीं अपनी राजनीति के तकाजे के हिसाब से काम कर रहे हैं. 

लेकिन एक चौथा खेमा भी है. ये वो खेमा है, जिनका कहना और बोलना सुर्खियों में भी है और विवादों में भी. इनमें से कुछ मौका दे रहे हैं उन लोगों को, जो मुख्य मुद्दे और लक्ष्य से देश का ध्यान बंटाना चाह रहे हैं जबकि कुछ के सवाल अपने तीखेपन की वजह से सत्ता में बैठे लोगों को बुरी तरह से चुभ रहे हैं. मिलते हैं उन चेहरों से और जानते हैं उनके संभावित मकसद के बारे में.

कंट्रोवर्सी मास्टर तथागत रॉय

“आप कश्मीर न जाएं. 2 साल के लिए अमरनाथ यात्रा पर जाने का विचार छोड़ दें. कश्मीर में बनने वाले सामानों को न खरीदें. सर्दियों में आने वाले कश्मीरी व्यापारियों से सामान न खरीदें. हर उस चीज का बायकाट करें, जिसका जुड़ाव कश्मीर से है. मैं इस राय से सहमत हूं”

एक फौजी के विचारों से सहमति जताते हुए तथागत रॉय ने अपनी ये सोच देश के सामने रखी है. तथागत रॉय मेघालय के राज्यपाल हैं. बड़ी संवैधानिक जिम्मेदारी है उन पर लेकिन देश के ही एक प्रदेश के समग्र बायकॉट की बात कर रहे हैं. 

तथागत रॉय वही साहब हैं, जिन्होंने 26/11 की बरसी पर ट्वीट कर कहा था कि- “पाकिस्तानी आतंकवादियों ने मुसलमानों को छोड़कर सभी मासूमों को मारा था.”

2017 में दिवाली पर पटाखे छोड़ने या न छोड़ने को लेकर बहस चल रही थी, तो उस विवाद में भी तथागत कूद गए थे. तब उन्होंने कहा था कि- “हर बार दिवाली के मौके पर पटाखों से होने वाले ध्वनि प्रदूषण को लेकर हंगामा होता है लेकिन ये त्योहार तो साल में एक बार आता है, जबकि हर रोज सुबह साढ़े 4 बजे लाउडस्पीकर पर दी जाने वाली अजान पर कोई सवाल नहीं उठाता. धर्मनिरपेक्ष भीड़ की अजान से पैदा होने वाले इस शोर पर ये चुप्पी मुझे वाकई हैरान करती है.”

वैसे तो कहा और माना यही जाता है कि एक राज्यपाल पार्टी लाइन से ऊपर होता है लेकिन तथागत रॉय ने इसकी कभी भी परवाह नहीं की. राज्यपाल रहते हुए भी उन्होंने हर मौके पर खुद को आरएसएस और बीजेपी का बताया. 

करीब दो साल पहले एक पत्रकार ने जब उनसे सवाल किया था कि राज्यपाल की कुर्सी पर रहते हुए आप ऐसी बातें कैसे कर सकते हैं? इस पर तथागत ने जवाब दिया था कि- “अगर कोई मुझे संविधान में इस बात का उल्लेख दिखा दे कि एक राज्यपाल को क्या बातें करनी चाहिए और क्या नहीं, तो मैं फिर कुछ नहीं बोलूंगा.”

तथागत रॉय के विवादित बयानों की फेहरिस्त और भी ज्यादा लंबी है लेकिन इन सबमें कॉमन ये है कि उनके ज्यादातर विवादित बयानों में कहीं न कहीं धर्म की लकीर खींचने की कोशिश लगती है.

कमल हासन की नादानी या चाल?

राजनीति के नौसिखिये कमल हासन ने कश्मीर में जनमत संग्रह की बात कर दी. कह दिया कि- “भारत कश्मीर में जनमत संग्रह क्यों नहीं कराता? हम ऐसा करने से डरते क्यों हैं?”

कमल हासन ने हालांकि बाद में अपने बयान पर सफाई भी दी, लेकिन उन्होंने देश की दुखती रग को छेड़ तो दिया ही. सवाल बाकी रह गया कि आखिर कमल हासन ने ये सब कहा क्यों? राजनीति की अज्ञानता में या किसी सोची-समझी राजनीतिक चाल में? याद रहे धूम-धड़ाके के साथ ‘मक्कल निधि मय्यम’ नाम की पार्टी लॉन्च करने के बाद कमल हासन तमिलनाडु की राजनीति में कहां हैं, ये फिलहाल शायद उन्हें भी पता नहीं है.

देश को सूट नहीं करता ममता का पुलवामा पर बयान

ममता बनर्जी कहती हैं- “मुझे शक है कि ऐन चुनावों से पहले ही ऐसी घटना क्यों हुई? जब आपके पास एजेंसियों से इनपुट था, तो फिर आपने उस पर एक्शन क्यों नहीं लिया? ये सब आरएसएस, वीएचपी और बीजेपी का गेमप्लान है. हम मौजूदा माहौल से राजनीतिक फायदा उठाने की किसी भी कोशिश का विरोध करेंगे.”

ममता बनर्जी का ये बयान उनकी पार्टी को सूट कर सकता है लेकिन उसी वक्त ये सवाल जरूर रहेगा कि क्या देश को उनका बयान सूट करता है? क्योंकि अगर एक राज्य की मुख्यमंत्री ही इतनी बड़ी आतंकवादी घटना से अपने ही देश की किसी राजनीतिक पार्टी को जोड़ने की कोशिश करेंगी, तो इसका सबसे बड़ा फायदा उस पाकिस्तान को ही होगा जिसे सबक सिखाने का जज्बा इस वक्त देश के बहुसंख्यक लोगों में है.

सिद्धू का बयान गलत या टाइमिंग?

पुलवामा हमले के बाद सबसे पहला विवादित बयान नवजोत सिंह सिद्धू का था. तब उन्होंने कहा था कि- “कुछ लोगों की नापाक हरकत के लिए पूरे पाकिस्तान को दोष नहीं दिया जा सकता.” सिद्धू ने बातचीत से समस्या के हल की भी वकालत की थी. विपक्षी पार्टियों ने सिद्धू का जीना हराम कर दिया, तो कांग्रेसियों ने भी उनसे किनारा कर लिया लेकिन मीडिया में जिस सवाल पर सबसे कम चर्चा हुई वो ये कि- सिद्धू का बयान ही गलत था या सिर्फ बयान की टाइमिंग गलत थी?

मल्लिका दुआ को नहीं दिखादेश का रोना

पुलवामा हमले की आंच में एक्ट्रेस और राइटर मल्लिका दुआ भी झुलसीं.

दरअसल मल्लिका ने कह दिया कि- “क्या हम सोशल मीडिया पर चीजें पोस्ट कर इंसेंसेटिव हो रहे हैं? ये सब आखिर क्या चल रहा है? ये क्या नॉनसेंस कहा जा रहा है कि पूरा देश रो रहा है और तुम हंस रही हो? तब क्या हमें पूरा साल दुख में बिताना चाहिए?” 

ट्रोल करने वालों ने मल्लिका की खबर ली और मल्लिका उनकी खबर लेती रहीं.

दिलचस्प है कि न ममता बनर्जी का राजनीतिक रूप से कुछ बिगड़ा और न ही तथागत रॉय की कुर्सी हिली. न ही कमल हासन को कोई खरोंच आई. हां, नवजोत सिंह सिद्धू एक लाफ्टर शो से आउट जरूर हो गए. ऐसे ही विरोधाभासों से देश की राजनीति अकसर खुद को हास्यास्पद बना लेती है.

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