श्रीअरविंद: स्वतंत्रता दिवस पर होती है जयंती, पढ़ें- आखिर क्यों लाल किले से पीएम मोदी ने दिलाई याद

महान देशभक्त क्रांतिकारियों में से एक महर्षि श्रीअरविंद (Sri Aurobindo) देश की आध्यात्मिक क्रां‍ति की पहली चिंगारी थे. उनके आह्वान पर हजारों युवकों ने देश की स्वतंत्रता के लिए हंसते-हंसते जान दे दी थी. सशस्त्र क्रांति के लिए उनकी प्रेरणा को आज भी याद किया जाता है.
Sri Aurobindo birth anniversary on Independence Day, श्रीअरविंद: स्वतंत्रता दिवस पर होती है जयंती, पढ़ें- आखिर क्यों लाल किले से पीएम मोदी ने दिलाई याद

देश के 74वें स्वतंत्रता दिवस (Independence Day) के मौके पर लाल किले (Red Fort) की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) ने अपने भाषण में महान क्रांतिकारी और आध्यात्मिक नेता श्री अरविंद घोष (Sri Aurobindo Ghosh) का विशेष तौर पर नाम लिया. आज विश्व प्रसिद्ध भारतीय दार्शनिक योगी श्रीअरविंद की 148वीं जयंती भी है.

भारत में आजादी का त्योहार मनाने का मौका हमें इतनी आसानी से नहीं मिला. हजारों देशभक्तों की मेहनत और निस्वार्थ बलिदान से यह दिन हम सबके सामने आया है. स्वतंत्रता दिवस उन सभी क्रांतिकारियों-स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने का दिन भी है. आइए, हम श्रीअरविंद और उनके काम के बारे में जानते हैं.

 

स्वदेश और स्वतंत्रता के लिए छोड़ी सिविल सर्विस

इस पावन दिन पर ही आजादी के लिए काम करने वाले एक स्वतंत्रता सेनानी का जन्म हुआ. जो जन्म के बाद विदेशी माहौल में रहे. लेकिन पिता की लाख कोशिशों के बावजूद भारत से पूरी तरह अलग नहीं हो सके. बंगाल के मशहूर और असरदार परिवार के मुखिया कृष्णधन घोष और उनकी पत्नी स्वमलता के पुत्र के तौर पर महर्षि श्रीअरविंद का जन्म कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में 15 अगस्त, 1872 में हुआ था.

अरविन्द घोष ने दार्जिलिंग के लोरेटो कान्वेंट स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की. 1879 में उन्हें बेहतर शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया. लंदन के सेंट पॉल उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की. उसके बाद उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में प्रवेश ले लिया. इस दौरान उन्होंने आईसीएस के लिए तैयारी की और सिविल सेवा परीक्षा पास की. उन्होंने घुड़सवारी की परीक्षा देने से इनकार कर दिया और सिविल सर्विस को छोड़कर देश की आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने भारत आ गए.

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लोकमान्य तिलक से मुलाकात और कांग्रेस

भारत आने के बाद उन्होंने सिविल सर्विस और उसके सुधार से जुड़े काम की शुरुआत की. बड़ौदा राज्य में प्रशासनिक अधिकारी और एक शिक्षक के तौर पर सेवा दी थी. वे बंग भंग आंदोलन के दौरान कांग्रेस के गरम दल के साथ खड़े थे. उसके बाद श्रीअरविंद ने वंदे मातरम नामक एक पत्र का संपादन भी किया. साल 1902 में अहमदाबाद के कांग्रेस सत्र में उनकी मुलाकात लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से हुई. उनके अद्भुत और क्रांतिकारी व्यक्तित्व से प्रभावित श्रीअरविंद भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़े. 1906 में उन्होंने दोबारा कांग्रेस का रुख किया और ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता हासिल करने के लिये लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल के साथ भी जुड़ गए.

 

शिक्षक-लेखक-पत्रकार-प्रिंसिपल और क्रांतिकारी

बाद में उन्होंने अखबार और पत्रिकाओं में लेख लिखे. संपादक बने. उनके लिखे लेखों ने लोगों को स्वराज, विदेशी सामानों के बहिष्कार और स्वतंत्रता पाने के तरीके तक सुझाए. बड़ौदा कॉलेज में प्रिंसिपल रहे-छात्रों को तैयार किया. स्वतंत्रता संग्राम को गति दी. उन्होंने क्रांतिकारी धारा चुनी और अलीपुर बम कांड में जेल भी गए. कोर्ट में उनके पक्ष में चित्तरंजन दास ने पैरवी की. श्रीअरविंद ने जेल से निकलने के बाद उत्तरपाड़ा में भाषण दिया. इस दौरान उन्होंने भारत और सनातन हिन्दू धर्म से संबंधित विचारों को पूरे देश को बताया.

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महान देशभख्त क्रांतिकारियों में से एक महर्षि श्रीअरविंद देश की आध्यात्मिक क्रां‍ति की पहली चिंगारी थे. उनके आह्वान पर हजारों युवकों ने देश की स्वतंत्रता के लिए हंसते-हंसते जान दे दी थी. सशस्त्र क्रांति के लिए उनकी प्रेरणा को आज भी याद किया जाता है.

अपने जेल के दिनों मे उनकी आध्यात्मिक अनुभूतियों के चलते रिहाई के बाद 1910 में श्रीअरविंद साधना के लिए तत्कालीन फ्रेंच आधिपत्य वाले पांडिचेरी चले गए. इस दौरान कई वर्षों तक साधना की. इस साधना के परिणाम में महर्षि ने पूर्ण योग के सिद्धांत से पूरी दुनिया को परिचित कराया. पांडिचेरी में एक आश्रम स्थापित किया. वेद, उपनिषद, गीता आदि भारतीय वांग्मय के ग्रंथों पर टीकाएं लिखीं. श्रीअरविंद आश्रम की स्थापना के बाद वो कभी बाहर नहीं गए.

पांडिचेरी में आध्यात्मिक साधना

15 अगस्त 1914 को महर्षि श्रीअरविंद ने मीरा अल्फांसा और पॉल रिचर्ड के साथ मिलकर आर्य नामक एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन भी शुरू किया. इसके अलावा पुडुचेरी में श्री अरविंद अंतराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र भी है. साथ ही उनकी अध्यात्मिक सहयोगिनी श्रीमां ने इंटरनेशनल टाउनशिप ऑरोवील की स्थापना भी की. जहां पूरी दुनिया के 50 से अधिक देशों के लोग एक साथ रह रहे हैं. पुडुचेरी में ही साल 1950 में 5 दिसंबर को उनका महानिर्वाण हो गया.

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पहले स्वतंत्रता दिवस पर रेडियो संदेश

15 अगस्त को भारत को अंग्रेजों से आजादी मिली. श्रीअरविंद ने इस मौके के लिए रेडियो तिरुचापल्ली के माध्यम से देश के नाम एक संदेश दिया था. इस संदेश में महर्षि अरविंद ने भारत और उसके भविष्य के लिए अपने विचार को बताया था. इस संदेश का आज भी काफी महत्व है. श्रीअरविंद ने अपने संदेश में कहा कि 15 अगस्त स्वतंत्र भारत का जन्मदिवस है. ये एक पूराने युग की समाप्ति और नए युग में प्रवेश का सूचक है.

हमेशा के लिए स्वीकार नहीं हो सकता विभाजन

महर्षि श्रीअरविंद ने अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण साल भारत के आजादी की सोच के साथ गुजारे. उनमें से एक सपना अखंड भारत का था. क्रांतिकारी आंदोलन के माध्यम से उनका सपना स्वतंत्र और अखंड भारत के निर्माण का भी था. श्रीअरविंद ने कहा कि भारत स्वतंत्र तो हुआ है. लेकिन उसने अभी तक एकता को प्राप्त नहीं किया है. लेकिन हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच बना साप्रदायिक तनाव अब स्थायी राजनीतिक बंटवारे के रूप में देश में बना रहेगा. आशा की जानी चाहिए कि इसे हमेशा के लिए स्वीकार नहीं किया जाएगा.

मानवता की भलाई के लिए अखंड भारत का सपना

इस संदेश में उन्होंने देश की स्वतंत्रता को तब तक अधूरा बताया था जब तक इसे अखंड नहीं बनाया जाएगा. श्रीअरविंद भारत को साक्षात मां दुर्गा का चैत्य बताते थे. उनका मानना था कि हर राष्ट्र की एक आध्यात्मिक नियति परमात्मा ने निहित की है और भारत भूमि की नियति हमेशा अखंड रहने की है. श्रीअरविंद ने कहा था युगों का भारत न तो मृत हुआ है और न ही उसने अपना अंतिम रचनात्मक शब्द बोला है. भारत की स्वतंत्र आत्मा जीवन और निश्चित रूप से मानवता और अन्य समस्याओं के लिए समाधान देगी. इस दिन हम सभी भारतीयों को यह भी सोचना चाहिए कि विश्व में संघर्ष के अंधेरे के बीच शांति के प्रकाश के रूप में हमारा भारत इस कार्य में किस तरह से योगदान करे.

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