सुषमा स्वराज ने जीवन भर दी सोनिया गांधी को चुनौतियां, राहुल तक से कह दिया था- मम्मा से पूछना…

20वीं सदी के अंत ने भारत में दो बड़ी महिला नेताओं का उदय देखा था. एक थीं सोनिया और दूसरीं सुषमा. दोनों ने ही पूरे राजनीतिक जीवन में एक-दूसरे पर खूब हमले बोले. जानिए इन वार-पलटवार की कहानी.

पिछली सदी का आखिरी दशक ढल रहा था और साथ ही भारत की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर दो महिला नेताओं का उदय भी हो रहा था. इन दोनों महिलाओं का दल, विचार और पृष्ठभूमि एक-दूसरे से भले अलग थे लेकिन इनमें से एक ने दूसरे का विरोध करने की राह पर दूर का सफर तय किया.

इसमें पहली थीं इतालवी मूल की सोनिया गांधी जो अपनी सास और पति को खोने के बाद कांग्रेस की नैया पार लगाने के लिए चुनाव में पहली बार उतरीं, तो दूसरी तरफ थीं सुषमा स्वराज जो बीजेपी की दूसरी पांत के नेतृत्व से पहली पंक्ति में आने की प्रक्रिया पूरी कर रही थीं. सोनिया गांधी ने संसद में प्रवेश पाने के लिए यूपी में अमेठी और कर्नाटक में बेल्लारी की सीट चुनी. बीजेपी ने सोनिया की जीत मुश्किल बनाने के लिए सुषमा को बेल्लारी के मोर्चे पर भेज दिया.

मतदाताओं को सांसद तो चुनना था लेकिन असली लड़ाई छवि की थी. चुनाव नतीजे ये भी तय करते कि वोटर्स की नज़र में ‘कौन ज़्यादा भारतीय है’? सोनिया गांधी इटली छोड़कर भारत आई थीं. अपनी सास और पति को खोने के  बाद किशोरवय के दो बच्चों की मां थीं. उन्होंने लंबी हिचक के बाद परिवार की राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए मैदान में उतरना स्वीकार किया था. उधर ‘विदेशी बहू’ को रोकने के लिए बिंदी-सिंदूर-साड़ी और प्रांजल भाषा से लैस ‘भारतीय बेटी’ सुषमा स्वराज को चुना गया. ये और बात है कि सुषमा चुनाव हार गईं लेकिन राजनीतिक जानकारों ने तब माना था कि यदि प्रियंका गांधी चुनाव प्रचार के अंतिम दिन आकर अपनी मां के लिए वोट ना मांगतीं तो मुकाबला बेहद करीबी रहता.

इसके पांच साल बाद साल 2004 में सोनिया-सुषमा की जंग फिर नई हो गई. तब तक सुषमा स्वराज केंद्र में मंत्री रह चुकी थीं. पार्टी में भी उनका कद काफी बढ़ गया था. माना जा रहा था कि अटल युग के अवसान के बाद बीजेपी की किस्मत वही लिखेंगी. उधर सोनिया गांधी ने विपक्षी दलों का कुनबा जोड़कर वाजपेयी के दोबारा सत्ता में आने के ख्वाब को तोड़ने की पुरज़ोर कोशिश की जिसका नतीजा यूपीए की जीत में सामने आया. इस जीत ने सोनिया गांधी के लिए प्रधानमंत्री की कुरसी का रास्ता खोल दिया. अपनी हार से टूटी बीजेपी को इसमें विरोध की ऐसी संभावना दिखाई दी जिसका समर्थन देश कर सकता था. सुषमा स्वराज ने इस विरोध की अगुवाई का फैसला लिया. सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा ज़िंदा हो गया. सुषमा स्वराज ने प्रण लिया कि यदि सोनिया गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं तो वो अपनी सिर मुंडवा कर सफेद वस्त्र धारण करने लगेंगी. हिंदू विश्वास के अनुसार ये शोक का प्रतीक माना जाता है. सुषमा स्वराज से जब पूछा गया कि ऐसा वो क्यों कर रही हैं तब उन्होंने अपनी आहत भावनाओं का हवाला देते हुए कहा था कि ब्रिटिश हुकूमत को हटाने और भारतीयों के बलिदान के बावजूद किसी विदेशी का चुना जाना उन्हें बुरा लगा.

नई सदी की दहलीज़ पर खड़ी दिल्ली तब ज़बरदस्त पॉलिटिकल ड्रामे की दर्शक बनी. आखिरकार सोनिया गांधी ने पीएम बनने से इनकार करते हुए मनमोहन सिंह को आगे कर दिया और अचानक ही हवा में ‘त्याग’ की महिमा छा गई जो एक विदेशी बहू द्वारा अपनी भारतीयता की परीक्षा में किया गया था.

बाद के सालों में सुषमा स्वराज ने कई मुद्दों पर संसद में यूपीए सरकार की ईंट से ईंट बजाई लेकिन सोनिया गांधी पर सीधा हमला नहीं किया. फिर भी दोनों महिला नेताओं के बीच कोई दोस्ती नहीं दिखाई दी. टेलीग्राफ अखबार में प्रकाशित हुआ था कि साल 2010 में बराक ओबामा के दौरे में दोनों ही महिला नेता एक-दूसरे से मिलीं और काफी देर तक परिवार और साड़ियों पर चर्चा करती रहीं. ये भी सच है कि वक्त के साथ सुषमा स्वराज लोकसभा में वरिष्ठता की सीढ़ियां चढ़ती गईं और फिर लालकृष्ण आडवाणी की जगह नेता प्रतिपक्ष बनीं. उन्होंने सोनिया गांधी के मूल का मुद्दा भुला दिया. 2011 में तो सोनिया गांधी ने लंदन में अपने भाषण में सुषमा स्वराज की तारीफ भी की. फिर 2014 आया जब खुद सुषमा स्वराज ने सोनिया गांधी की शिष्ट नेता के तौर पर प्रशंसा करके संदेश दिया कि अब दोनों नेताओं के मध्य रही सियासी तल्खी मिट चुकी है.

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वायनाड से कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने सुषमा स्वराज को श्रद्धांजलि दी.

2015 में सुषमा स्वराज जब ललित मोदी के देश छोड़कर भागने पर घिरीं तो उन्होंने राहुल गांधी पर तल्ख हमला बोला और इसी सिलसिले सुषमा बोल गईं कि राहुल अपनी मम्मी से पूछें कि पापा ने क्वात्रोच्चि और एंडरसन को क्यों भगाया.. सुषमा स्वराज खुद पर लगे आरोपों से इतनी आहत थीं कि आगे बोलीं- राहुल जी को छुट्टियां बिताने का शौक है. इस बार एकांत में छुट्टी बिताने जाएं और अपने परिवार के इतिहास को पढ़ें. अपनी मां से पूछें कि मम्मा हमने क्वात्रोच्चि पर कितने पैसे लिए, 15 हजार लोगों के हत्यारे वॉरेन एंडरसन को हमने क्यों छुड़वाया था. जब सुषमा स्वराज ने ललित मोदी को छूट देने के पीछे उसकी बीमार पत्नी का हवाला दिया तो सोनिया ने दोटूक कहा कि सुषमा स्वराज नाटक में माहिर हैं

तीखी नोकझोंक के इस सिलसिले पर अब विराम लग चुका है. सोनिया गांधी सक्रिय राजनीति से किनारा कर चुकी हैं. सुषमा स्वराज भी अपनी खराब तबीयत की वजह से इस बार चुनाव नहीं लड़ी थीं. अंतिम दिनों में वो निजी घर पर आराम कर रही थीं इसलिए किसी भी राजनीतिक मुद्दे पर ट्वीट ही करती थीं. सुषमा स्वराज का पार्थिव शरीर उनके घर पर अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था तब खुद राहुल गांधी भी पहुंचे. सोनिया गांधी ने भी इस मौके पर सुषमा के पति स्वराज कौशल को खत लिखा. सोनिया गांधी ने हर पुरानी बात भुलाकर सुषमा को ना सिर्फ दोस्त कहा बल्कि उनकी बहुत तारीफ की. जीवन के साथ राजनीतिक कटुताएं भी खत्म हो जाती हैं जो शायद अब हो गई लेकिन जो याद रह जाएगा वो सुषमा स्वराज का वक्तृत्व और कर्तृत्व है.