काली मिर्च ना होती तो क्या हिंदुस्तान ना बना होता अंग्रेज़ों का गुलाम ?

काली मिर्च जितनी आम लगती है उतनी है नहीं. जंग के बाद समझौतों और कई बार तो जंग की वजह भी बनी है काली मिर्च. आइए आपको सुनाएं काली मिर्च की सुनहरी दास्तान..

काली मिर्च कमाल की चीज़ है। उसकी कहानी पढ़ेंगे तो महसूस करेंगे कि शायद ये ना होती तो भारत भी गुलाम ना बना होता। दरअसल 18वीं सदी तक दुनिया भर में भारत के केरल से ही काली मिर्च का निर्यात होता था। ग्रीक, रोमन, सीरियन, अरब हर किसी के जहाज केरल के तट पर चंदन और चाय का इंतज़ार करते थे, मगर सबसे ज़्यादा इंतज़ार उन्हें काली मिर्च का ही था। सब उसे ब्लैक गोल्ड कहते थे। वजह यही कि वो सोने जैसी महंगी थी।
काली मिर्च की सबसे ज़्यादा ज़रूरत रोमन्स को थी। तीन-चार महीने की भयानक सरदी में जब रास्तों से लेकर व्यापार तक ठप्प पड़ जाते थे, तब खाने-पीने की किल्लत से काली मिर्च ही बचाती थी। रोमन गाय-भैंस का मीट कमरों में स्टोर करते थे जिसे नमक और काली मिर्च खराब नहीं होने देती थी। सरदी और जुकाम में भी काली मिर्च दवाई के तौर पर काम आती थी। पूरा यूरोप ही उसके फायदों का मुरीद था।

जब युद्ध जीतकर एलरिक ने रोम में प्रवेश किया

पांचवीं सदी चल रही थी। अविजित रोम के दरवाज़े पर हमलावरों की भारी फौज खड़ी थी। एलेरिक प्रथम  उनका नेता था। घुटने टेक चुके रोम के रखवालों ने निवेदन किया कि शहर में बर्बादी ना फैलाई जाए, चाहे बदले में जो मांगा जाए। कहा जाता है कि एलेरिक ने चालीस बोरे काली मिर्च मांगी। उस वक्त ये काली मिर्च भारत से रोम को बेची जाती थी और लेनदेन का प्रमुख माध्यम बन चुकी थी।

सैकड़ों साल बाद 1498 में भारत आए वास्कोडिगामा को भी काली मिर्च भारत खींच लाई थी। काली मिर्च बेचना खासे मुनाफे का सौदा था। कहा जाता है कि वो जब पुर्तगाल लौटा तो उसने काली मिर्च से जहाज भर लिया। इस अकेली यात्रा ने उसे छह गुना मुनाफा दिया। इस तरह के सौदों ने पूरे यूरोप को भारत की तरफ आकर्षित किया। डच, फ्रेंच, अंग्रेज़, स्पेनिश हर कोई काली मिर्च जैसे मसाले में अपने देश का भविष्य देख रहा था। बाकी का इतिहास तो हर कोई जानता ही है कि कैसे अलग-अलग देश से पहुंचे व्यापारियों ने पहले मसाले के व्यापार की अनुमति ली और उसके बाद भारतीय राजदरबारों में विदेशियों ने अपनी घुसपैठ बना ली। आगे चलकर अंग्रेज़ों ने अपने बाकी सारे प्रतियोगियों को मात दे दी और भारत की राजनीति पर काबू पा लिया।

भारत का रास्ता खोजनेवाला वास्को डि गामा

वैसे इतिहास किंतु-परंतु नहीं देखता लेकिन विश्लेषण की दृष्टि से देखा जाए तो काली मिर्च ही वो मसाला था जिसकी वजह से पश्चिमी जगत भारत को अहमियत दे रहा था। ये ना होता तो शायद उसकी भारत में दिलचस्पी उतनी भी ना होती। तो अगली बार काली मिर्च का इस्तेमाल करते हुए उसके रोचक इतिहास और हिस्ट्री मिस्ट्री का ख्याल रखिएगा।

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