ट्रेनिंग में ज़ीरो मगर लेक्चरबाज़ी का उस्ताद है जैश-ए-मोहम्मद का मौलाना

अगर हम आपको ये बताएं कि संसद से पठानकोट एयरबेस और पुलवामा तक सुरक्षाबलों पर हमले का मास्टरमाइंड आतंक की पाठशाला का फेल छात्र है तो आप क्या कहेंगे?

आपको यकीन तो नहीं होगा लेकिन जैश ए मोहम्मद के जिस सरगना मौलाना मसूद अज़हर की तलाश दुनिया के कई देशों को है वो दरअसल खुद एक सफल लड़ाका बनने में असफल हो गया था. ये बात खुद उसी ने भारतीय जांच एजेंसियों को पूछताछ में कई साल पहले बताई थी. एक ऑनलाइन मीडिया पोर्टल के हाथ मसूद अज़हर से पूछताछ के कागज़ लगे हैं जिनसे खुलासा हुआ कि नाटे और मोटे अज़हर को आतंकी ट्रेनिंग में मिसफिट मानकर वापस घर भेज दिया गया था.

क्लासरूम से लेकर आतंक की ट्रेनिंग तक

10 जुलाई 1968 को पाकिस्तानी पंजाब के बहावलपुर में पैदा होनेवाले अज़हर मसूद को उसके हेडमास्टर पिता ने पढ़ाई के लिए कराची भेजा था. जामिया-उलूम-उल इस्लामिया में पढ़ते हुए उसने इस्लाम की तालीम ली. यहीं वो ऐसे छात्रों के संपर्क में आया जो आतंकी संगठन हरकत उल मुजाहिद्दीन के नेताओं से ज़बरदस्त प्रभावित थे. उन दिनों ये संगठन अमेरिका के संसाधनों के बूते अफगानिस्तान में सोवियत यूनियन से टक्कर ले रहा था. 

अज़हर ने ऊंचे नंबरों के साथ अपनी पढ़ाई पूरी की और हरकत उल मुजाहिद्दीन के सरगना मौलाना फज़लुर रहमान खलील से मुलाकात कर ‘जिहाद’ में शामिल होने की पेशकश रखी. अफगानिस्तान के युवर में अज़हर की तरबियत यानि ट्रेनिंग शुरू हो गई.

आतंक की ट्रेनिंग में छूट गए पसीने

मसूद अज़हर का जोशोखरोश जल्द ही ठंडा पड़ने लगा. ट्रेनिंग कैंप में कई तरह के हथियारों की ट्रेनिंग कराई जा रही थी. इसके अलावा भागना-दौड़ना, छिपना और रेंगकर चलना भी अभ्यास में शामिल था. 5 फीट 3 इंच के अज़हर के लिए अच्छे खासे वज़न के साथ पानी से भरे ट्रेंच को पार करना मुश्किल हो गया. बंदूक से निशाना लगाना तो और भी ज़्यादा कठिन रहा. साथ में ट्रेनिंग वालों ने उसका मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया. हालात ऐसे बने कि चालीस दिन की ज़रूरी ट्रेनिंग को बीच में ही छोड़कर उसने जिहादी बनने का इरादा त्याग दिया. ट्रेनर ने उसे वापस कराची भेज दिया. हताश परेशान अज़हर ने टीचर बनने में ही अपनी भलाई समझी.

बंदूक नहीं कलम से बरसाई गोलियां

मज़हब की अपनी जानकारी को मसूद अज़हर ने आतंकी गढ़ने में लगा दिया. उसने ‘सदा-ए-मुजाहिद्दीन’ नाम की पत्रिका निकाली. अफगानिस्तान में लड़ रहे ‘हरकत-उल-मुजाहिद्दीन’ पर पत्रिका में खूब लिखा गया. शुक्रवार की नमाज़ के बाद पत्रिका मुफ्त बंटती. पत्रिका के ज़रिए मसूद अज़हर ने मशहूर होने में ज़्यादा वक्त नहीं लगाया. वो लोगों की नज़रों में चढ़ने लगा. हरकत-उल-मुजाहिद्दीन के सरगना को भी उसमें हुनर दिखा. जल्द ही उसे एक अलग विभाग का मुखिया बना दिया गया जिसका काम पाकिस्तानी लोगों के बीच संगठन की गतिविधियों का प्रचार करना तो था ही, साथ में नए लड़कों को संगठन की ओर आकर्षित करना भी था. इस काम को तब और तेज़ी मिली जब अज़हर की ज़हरीली भाषण कला का हुनर बिखरा.

आतंकी जमात में ज़ीरो से बना हीरो

साल 1992 तक मसूद अज़हर पत्रकार के तौर पर जाना जाता था. उसका मुख्य काम ‘सदा-ए-मुजाहिद्दीन’ का प्रकाशन और अफगानिस्तान में लड़ रहे साथियों के लिए चंदा इकट्ठा करना था. कामकाज से खुश संगठन के मुखिया खलील ने मसूद अज़हर को विदेशी दौरे करने को कहा. तुरंत उसने सऊदी अरब का दौरा किया और चंद ही दिनों में तीन लाख रुपए की रकम इकट्ठा कर ली. अफ्रीका के ज़ाम्बिया में भी उसका दौरा हुआ. ब्रिटेन में उसने बर्मिंघम, नॉटिंघम, लीसेस्टर और लंदन से चंदा उगाहने की कोशिशें कीं. उसकी कोशिशों ने आतंकी जमात में उसका कद बढ़ा दिया. सरगना खलील को समझ आ चुका था कि मसूद अज़हर कोई आम लड़का नहीं है बल्कि ठीक से इस्तेमाल करने पर बड़े काम कर सकता है. 

आगे पढ़िए कि कैसे मौलाना मसूद अज़हर को अफगान मोर्चे से हटाकर कश्मीर भेजा गया और किस तरह वो सुरक्षाबलों के शिकंजे में आने के बाद एक बड़ी आतंकी साज़िश के बाद रिहा हुआ…

जेल में सुरंग बनाकर भी नहीं भाग सका था ‘मोटा’ मसूद अज़हर !

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