इस जगह आकर महात्मा गांधी ने घड़ी और काठियावाड़ी सूट पहनने से कर ली थी तौबा

30 जनवरी को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि होती है, इस मौके पर हम उनसे जुड़े किस्से बता रहे हैं. जब लंदन से बैरिस्टर की पढ़ाई करके वह लौटे तो सूट बूट में रहते थे. फिर चौथाई शरीर पर धोती तक कैसे आए. चलिए बताते हैं.

जैसा कि हमने आपसे वादा किया था, 30 जनवरी तक हर रोज हम आपको गांधी जी का एक किस्सा पढ़वाएंगे क्योंकि 30 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि होती है. आज का कोई किस्सा नहीं बल्कि किस्से हैं और इनके जरिए आपको महात्मा गांधी से जुड़ी बेहद खास बात पता चलेगी. हमने गांधी की ज्यादातर तस्वीरें देखी हैं जिनमें वह सिर्फ एक धोती पहने दिखाई देते हैं वह भी घुटने तक. हमेशा तो ऐसा नहीं रहा होगा. जब लंदन से बैरिस्टर की पढ़ाई करके वह लौटे तो सूट बूट में रहते थे. फिर चौथाई शरीर पर धोती तक कैसे आए. चलिए बताते हैं.

वो साल था 1917 और 15 अप्रैल की तारीख थी. दोपहर तीन बजे गांधी जी चंपारण के मोतिहारी स्टेशन पर उतरे थे. चंपारण के बारे में वे अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में लिखते हैं कि वह हिंदुस्तान के एक कोने में अलग-थलग पड़ा था. वहां के सत्याग्रह की खबर अखबारों तक पहुंचती ही नहीं थी. ऐसे समय में गांधी वहां पहुंचे और किसानों से मिले.

चंपारण में गांधी जी

ये किसान अंग्रेजी हुकूमत द्वारा जबरन नील की खेती के लिए मजबूर किए गए थे और किसी अनाज की खेती नहीं कर सकते थे. भूख और बीमारी से बेजार किसान गांधी को अपना दुख दर्द सुनाने के लिए इकट्ठा हुए. वहां घूंघट और परदे में आई महिलाओं ने गांधी जी को बताया कि उन्हें पानी लेने से रोका जाता है. बच्चों को पढ़ाई लिखाई से दूर रखा जाता है. उन्हें अंग्रेजों के घर में बंधुआ मजदूर की तरह काम करना पड़ता है और उसके बदले सिर्फ एक जोड़ी कपड़ा दिया जाता है.

जब पहली बार गांधी जी चंपारण गए तो बढ़िया काठियावाड़ी आउटफिट में सजे धजे हुए थे. ऊपर शर्ट, नीचे धोती, गमछा, घड़ी, चमड़े का जूता और टोपी पहने हुए थे. दोबारा नवंबर में गए तो पत्नी कस्तूरबा से कहा कि गांव-गांव जाइए. वहां महिलाओं से रोज नहाने को और साफ-सफाई का ध्यान रखने को बोलिए.

कस्तूरबा एक गांव में औरतों के बीच गईं तो एक औरत ने कहा कि आप मेरे घर की हालत देखिए. यहां आपको कोई सूटकेस या अलमारी दिखती है? मेरे पास केवल एक साड़ी है जो पहन रखी है. आप बताएं कि इसे साफ कर दें तो पहनें क्या? महिला ने कहा कि आप महात्मा जी से कहकर एक साड़ी मुझे दिला दीजिए ताकि मैं एक साड़ी धो सकूं.

गांधी जी को इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने अपना ओढ़ने वाला चोंगा उतारकर दे दिया और उसके बाद कभी नहीं ओढ़ा. यहां से शुरू हुआ सफर घुटनों तक धोती पर कब आया, बताते हैं.

1918 में वह अहमदाबाद के मिल मजदूरों की लड़ाई में शामिल हुए. उस दौरान उन्होंने देखा कि जितना कपड़ा उनकी पगड़ी में खर्च होता है उसमें कम से कम चार लोग अपना तन ढक सकते हैं. यहां से पगड़ी भी छूट गई.

31 अगस्त 1920 को खेड़ा में किसानों के सत्याग्रह के दौरान शपथ ली कि मैं जिंदगी भर हाथ से बनाए खादी के कपड़े ही पहनूंगा. 1921 में वह मद्रास से मदुरई की यात्रा के बीच लोगों से मिलते हैं और देखते हैं कि हर कोई विदेशी कपड़ों में सजा खड़ा है. उन्होंने सबसे खादी पहनने की गुजारिश की. इस पर लोगों ने कहा कि हम गरीब हैं, खादी नहीं खरीद पाएंगे.

बात सच थी. गांधी लिखते हैं कि मेरे पास बनियान, टोपी और नीचे तक धोती थी. जहां लाखों लोग बिना कपड़ों के हैं और चार इंच लंबी लंगोट के लिए तरस रहे हैं मैं उन्हें क्या जवाब देता. मदुरई की सभा के बाद फिर गांधी ने सब कपड़े छोड़ आधी धोती पहन ली और लोगों के साथ आकर खड़े हो गए.

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