मुन्ना बजरंगी: 17 गोलियां लगने के बाद भी पोस्टमार्टम के समय जिंदा हो गया था बजरंगी..

Share this on WhatsAppनई दिल्ली: पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों में ज्यादातर शार्पशूटर्स का करियर शायद ही एक दशक से लंबा चलता हो, वे या तो राजनीति में चले जाते हैं या पुलिस के हत्थे चढ़ जाते हैं लेकिन प्रेम प्रकाश उर्फ मुन्ना बजरंगी  के साथ ऐसा नहीं हुआ. अपराध में मुन्ना बजरंगी का करियर […]

नई दिल्ली: पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों में ज्यादातर शार्पशूटर्स का करियर शायद ही एक दशक से लंबा चलता हो, वे या तो राजनीति में चले जाते हैं या पुलिस के हत्थे चढ़ जाते हैं लेकिन प्रेम प्रकाश उर्फ मुन्ना बजरंगी  के साथ ऐसा नहीं हुआ. अपराध में मुन्ना बजरंगी का करियर साढ़े तीन दशक से भी ज्यादा लंबा चला. इस दौरान उसके खिलाफ हत्या और जबरन वसूली के दो दर्जन से अधिक मामले दर्ज हुए और इस सफर पर विराम लगा 9 जुलाई 2018 को, जब बजरंगी को बागपत जेल में साथी कैदी सुनील राठी ने गोली मार दी.

इस घटना ने यह याद दिलाने की कोशिश की कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपराध और राजनीति कितनी आसानी से एक दूसरे के साथ चलते हैं जिसके परिणाम अक्सर खतरनाक होते हैं.

कैसा रहा शुरूआती सफर

1964 में जौनपुर में जन्मे प्रेम सिंह का बचपन उसके गांव पूरे दयाल में बीता जो बाद में डेयरी की दुकान चलाने मुंबई चला गया. कक्षा 5 तक पढ़े बजरंगी की ज्यादा रुचि घूमने और कुश्ती में थी. वह एक अच्छा पहलवान था.

कैसे पड़ा बजरंगी नाम

कुश्ती के प्रति प्रेम ने उसे भगवान हनुमान का भक्त बना दिया जिसके कारण बाद में उसे ‘बजरंगी’ नाम मिला. घर वाले उसे प्यार से मुन्ना बुलाते थे जिसने उसे प्रेम सिंह से मुन्ना बजरंगी बना दिया.

कैसे हुई जुर्म की दुनिया में एंट्री

जनवरी 1982 में बजरंगी पर मारपीट करने को लेकर पहला आपराधिक मुकदमा दर्ज किया गया. उसी साल काकोपुर गांव में लूट और हत्या के एक मामलें उसे शामिल पाया गया पर अगले 2 सालों में उसने भुल्लन सिंह नाम के एक व्यक्ति की हत्या कर जुर्म की दुनिया में एंट्री ले ली और तब से 2009 के बीच, जब उसे दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने मुंबई से गिरफ्तार किया तब तक वह एक छोटे अपराधी से खूंखार गैंगस्टर बन चुका था.

कौन थे बजरंगी के ‘गॅाडफादर’

बजरंगी पर सबसे पहले नजर पड़ी जौनपुर के गजराज सिंह की जिसने उसका इस्तेमाल लोगों को धमकाने और अपने प्रतिद्वंद्वियों को खत्म करने के लिए किया. इसके बाद वह जौनपुर छोड़ वाराणसी चला गया जहां उसने कई लोगों के साथ काम किया. जुर्म की दुनिया की असली शुरूआत उसने गैंगस्टर कृपा चौधरी के संपर्क में आने के बाद की. कृपा चौधरी उस समय एक बड़ा नाम था और मुख्तार अंसारी भी उसी की छत्र-छाया में पनप रहा था. कृपा ने ही बजरंगी की मुलाकात अंसारी से कराई थी जिसके बाद लगभग एक दशक तक दोनों की दोस्ती चली.

पहली बड़ी हत्या

मुन्ना बजरंगी ने 1995 में वाराणसी के छावनी इलाके में कथित तौर पर पहली सनसनीखेज हत्या की. अगले ही साल उसने जमालपुर के ब्लॉक प्रमुख कैलाश दुबे और दो अन्य लोगों की एके-47 से भूनकर हत्या कर दी.

कैसे मजबूत हुई बजरंगी-अंसारी की दोस्ती

1996 की शुरुआत में, बजरंगी ने गजराज सिंह के कहने पर भाजपा नेता रामचंद्र सिंह की हत्या कर दी, जब वह अपने सहयोगी के साथ बाइक से भाग रहा था तब उसने गलती से अपने ही पैर में गोली मार ली और मदद के लिए अंसारी के पास गया. तब अंसारी ने उसका इलाज कराया जिसके बाद से दोनों के रिश्ते और मजबूत हुए.

न कभी शराब पी, न फोन इस्तेमाल किया

बजरंगी ने ज्यादातर हत्याएं दिन के उजाले में ही कीं और लोगों को घरों में घुसकर गोली मारी जिसने लोगों में उसका खौफ पैदा किया. पुलिस का कहना था कि उसने कभी शराब नहीं पी और शायद ही कभी मोबाइल फोन इस्तेमाल किया जिसकी वजह से वह पुलिस की गिरफ्त से दूर रहा.

जब पोस्टमॅार्टम करते समय जिंदा हो गया बजरंगी

1998 में यूपी एसटीएफ और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की एक संयुक्त टीम ने दिल्ली-हरियाणा सीमा के पास समयपुर-बादली में बजरंगी को घेर लिया जहां मुठभेड़ में उसे 17 गोलियां मारी गईं और दावा किया गया कि बजरंगी मारा जा चुका है लेकिन पोस्टमार्टम करने आए डॅाक्टरों की टीम ने पाया कि उसकी सांसे चल रही थी जिसके बाद काफी समय तक उसका इलाज चला और बाद में वह जमानत पर बाहर भी आ गया.

कैसे शुरू हुआ पतन

2005 में बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के मामले में गिरफ्तारी के बाद उसके पतन का दौर शुरू हुआ. बजरंगी मुंबई जाकर अंडरग्राउंड हो गया और 2009 तक मुंबई में ही रहा. जहां बाद में मुंबई के मलाड से उसकी गिरफ्तारी हुई.

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