NRC से किस तरह अलग है NPR और क्यों हो रहा है इस पर विवाद?

देश भर में एनआरसी के साथ एनपीआर की प्रक्रिया लागू करने पर अभी निर्णय नहीं लिया जा सका है.

30 जुलाई 2019 को असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) का फाइनल ड्राफ्ट जारी किया गया तो उसमें 19 लाख आवेदकों को स्थान नहीं मिला. इस पर सड़क से संसद तक हंगामा मच गया. अब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में कहा है कि असम की तरह पूरे देश में एनआरसी लागू करेंगे, किसी को डरने की जरूरत नहीं है.

असम में एनआरसी के नतीजों को देखते हुए नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) का प्रस्ताव किया गया, जिसके पीछे विचार था कि एनआरसी 2021  में होने वाली जनगणना के बाद लागू की जाए. बहरहाल सरकार की तरफ से एनपीआर के बाद एनआरसी के मुद्दे पर कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया है.

एनपीआर और एनआरसी में क्या फर्क है और ये दोनों किस प्रकार देश के नागरिकों पर प्रभाव डालेंगे इसकी बहस तेज हो गई है. इस लेख में दोनों योजनाओं के अंतर पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है.

क्या है एनआरसी

एनआरसी से पता चलता है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं. इस रजिस्टर में जिसका नाम शामिल नहीं होगा उसे अवैध नागरिक माना जाएगा. असम पहला राज्य है जहां इसे लागू किया गया और इसके हिसाब से 25 मार्च 1971 से पहले से असम में रह रहे लोगों को भारत का नागरिक माना गया.

असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों के आने पर बवाल हुआ जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी को अपडेट करने का आदेश दिया था. असम में पहला रजिस्टर 1951 में जारी हुआ था और इस मुद्दे पर वहां कई हिंसक आंदोलन हो चुके हैं.

1947 में हुए विभाजन के बाद असम के लोग पूर्वी पाकिस्तान आते-जाते रहे. 1979 में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने घुसपैठियों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया. 1985 में राजीव गांधी सरकार ने असम गण परिषद से समझौता किया जिसके तहत 1971 से पहले जो बांग्लादेशी असम में आए उन्हें भारत की नागरिकता दी जाएगी.

लंबे वक्त तक ठंडे बस्ते में रही इस योजना पर 2005 में कांग्रेस सरकार ने काम शुरू किया. 2015 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसमें तेजी आई और असम में नागरिकों के सत्यापन का काम शुरू हुआ. राज्य में एनआरसी केंद्र खोले गए जहां नागरिकों को अपने कागजात सौंपने थे.

क्या है एनपीआर

एनपीआर देश के सामान्य नागरिकों की लिस्ट है. गृह मंत्रालय के मुताबिक सामान्य नागरिक वह है जो देश के किसी भी हिस्से में कम से कम 6 महीने से स्थायी निवासी हो या किसी जगह पर उसका अगले 6 महीने रहने की योजना हो.

एनपीआर एनआरसी की तरह नागरिकों की गणना नहीं है. इसमें वो विदेशी भी जोड़ लिया जाएगा जो देश के किसी हिस्से में 6 महीने से रह रहा हो. एनपीआर को नागरिकता अधिनियम 1955 और नागरिकता कानून 2003 के तहत तैयार किया जा रहा है. इसमें गृह मंत्रालय के निर्णय से 2021 में जनगणना की जाएगी. असम को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा क्योंकि वहां एनआरसी लागू कर दिया गया है.

गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक एनपीआर को सभी के लिए अनिवार्य किया जाएगा. इसके लिए डेमोग्राफिक और बायोमेट्रिक दोनों तरह का डेटा एकत्र किया जाएगा. डेमोग्राफिक डेटा में 15 कैटेगरी हैं जिनमें नाम से लेकर जन्म स्थान, शैक्षिक योग्यता और व्यवसाय आदि शामिल हैं. बायोमेट्रिक डेटा में आधार है जिससे जुड़ी हर जानकारी सरकार के पास पहुंचेगी. विवाद की वजह बताई जा रही है कि इससे आधार का डेटा सुरक्षित नहीं रह जाएगा. इसके अलावा नागरिकों का पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर आईडी और पासपोर्ट की जानकारी भी देनी होगी.

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