वंशराज मौर्य Corona काल में उगा रहे इम्‍युनिटी बूस्टर, गरीबों को मुफ्त में देते हैं काढ़ा

वंशराज मौर्य ने आपातकाल (Emergency) के समय नसबंदी (Sterilization) के लिए जबरन दबाव बनाने पर नौकरी छोड़ दी. इसके बाद साल 1980 में बागवानी (Horticulture) के लिए एक एकड़ खेत रिजर्व कर देश के कई स्थानों से फल-फूल और वनस्पतियों को कलेक्ट करना शुरू कर दिया.
Immunity booster plants on your land, वंशराज मौर्य Corona काल में उगा रहे इम्‍युनिटी बूस्टर, गरीबों को मुफ्त में देते हैं काढ़ा

उत्तर प्रदेश गोंडा जिले के रायपुर गांव के निवासी वंशराज मौर्य (Vanshraj Maurya) अपनी बगिया में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए इम्‍युनिटी बूस्टर वाले औषधीय पौधे (Medicinal Plants) उगा रहे हैं. वह इन पौधों के मिश्रण से बनाया गया काढ़ा आसपास के गरीबों को फ्री में देते हैं. उनकी इस मुहिम को काफी सराहना मिल रही है.

कोरोनावायरस से लड़ने में कारगर

वंशराज ने बताया कि कोरोना संकट के दौरान वह औषधीय पौधों से काढ़ा और अर्क बनाकर गरीबों को मुफ्त में दे रहे हैं. इसके अलावा गिलोय या अन्य औषधियों के डंठल और पत्तियां भी दे रहे हैं.

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कोरोना के समय से यहां पर करीब 100 से ज्यादा लोग हमारे काढ़ा और औषधियों को मुफ्त में ले गये हैं. गिलोय-तुलसी से बना काढ़ा कोरोनावायरस (Coronavirus) से लड़ने में बेहद कारगर साबित हो रहा है. इससे इम्‍युनिटी बढ़ रही है, इसलिए गरीबों को फ्री में दिया जा रहा है.

वंशराज के पुत्र शिवकुमार मौर्य ने बताया कि ‘एलोवेरा जूस, पपीता का अर्क, नींबू से तैयार लेमनेड (Lemonade) की बहुत ज्यादा मांग रहती है. हम लोग इसे बनाकर एक बोतल में तैयार करते हैं. कुछ गरीब लोग हमारे यहां से पत्तियां और डंठल भी ले जाते हैं.’

देश-प्रदेश से इकट्ठे किए फल-फूल और वनस्पति

उन्होंने बताया कि ‘पिता वंशराज मौर्य ने आपातकाल के समय नसबंदी (Sterilization) के लिए जबरन दबाव बनाने पर नौकरी छोड़ दी. इसके बाद साल 1980 में बागवानी के लिए एक एकड़ खेत रिजर्व कर देश के कई स्थानों से फल-फूल और वनस्पतियों को कलेक्ट करना शुरू कर दिया. इसके लिए शहरों में लगने वाली पौधशालाओं (Agricultural Schools)- नागपुर, पंतनगर और कुमार गंज में स्थिति एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से जानकारी हासिल की. चार दशक में देश-प्रदेश के पौधे यहां फल-फूल रहे हैं.’

होती है 2 से 3 लाख रुपये की आमदनी

वंशराज ने आगे बताया कि बागवानी के लिए रिजर्व एक एकड़ भूमि के आलावा दो एकड़ भूमि और है. उनमें सब्जी, गन्ना, धान, गेहूं की खेती के साथ बागवानी से लगभग दो से 3 लाख रुपये की आमदनी हो जाती है. उनके इस अभियान में उनका परिवार भी सहयोग करता है.

इन्होंने अपने बगीचे में दो सौ से भी ज्यादा पेंड़-पौधों की प्रजातियां स्टोर करके रखी हैं. इनके अलावा पांच तरह की तुलसी, बेलपत्र, लेमन ग्रास, काला बांसा, जलजमनी, शतावरी, बोगनबेलिया, हरड़, बहेड़ा, अंजीर और आंवला के अलावा हर तरह की परंपरागत और उपयोगी वनस्पति की प्रजाति यहां मौजूद है. इन्होंने यहां नर्सरी भी तैयार की है, जिसमें हर साल हजारों पौधे तैयार होते हैं.

बगीचे में है और भी बहुत कुछ

इसके अलावा तेजपत्ता, इलायची, इरानी खजूर, बिना बीज का अमरूद, नींबू की 10 प्रजातियां, चकोतरा की दो प्रजातियां, तीन प्रकार के छोटा-बड़ा नारियल, लीची, सेब, नाशपाती, वालम खीरा, चीकू, आंवला की दो प्रजातियां, हाथी झूल, रुद्राक्ष, सफेद और लाल चंदन, 15 प्रजातियों के अमरूद, दो तरह के पान का पौधे, हींग, बेर, लौंग, धूप का पेड़, अनानास और मौसमी इनके बगीचे की शोभा बढ़ा रहे हैं. (IANS)

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