Bahraich, बहराइच का अनोखा स्कूल, जहां घर-घर जाकर बच्चों को पढ़ाने ले आए टीचर
Bahraich, बहराइच का अनोखा स्कूल, जहां घर-घर जाकर बच्चों को पढ़ाने ले आए टीचर

बहराइच का अनोखा स्कूल, जहां घर-घर जाकर बच्चों को पढ़ाने ले आए टीचर

स्कूल में न कोई बाउंड्री वॉल थी ना ही कोई गेट. गांव वाले स्कूल के कंपाउंड से अपने गाय-भैंसों को चराने ले जाते थे.
Bahraich, बहराइच का अनोखा स्कूल, जहां घर-घर जाकर बच्चों को पढ़ाने ले आए टीचर

ये कहानी है उत्तर प्रदेश के यादवपुर गांव की. गवर्नमेंट प्राइमरी स्कूल के तीसरी क्लास में पढ़ने वाला देवानंद 7:45 को स्कूल पहुंचा. सुबह की प्रार्थना सभा चल रही थी और देवानंद वो 15 मिनट लेट था. जैसे ही वो पहुंचा तो प्रिंसिपल राजेश कुमार पांडेय की नजर उसपर पड़ी.

उन्होने कहा, “जाकर लाइन में खड़े हो और कल से वक्त पर आना. अबसे जो भी लेट होगा, उसे आने नहीं दिया जायेगा”. उन्होंने ऊंची आवाज़ में कहा ताकि बाकी लेट आने वाले बच्चों तक भी यह बात पहुंच जाए. असेंबली खत्म होने के बाद सरे बच्चे अपनी-अपनी क्लास में चले गए.

स्कूल के प्रिंसिपल ने बताया की उन्हें स्ट्रिक्ट होना पड़ता है क्यूंकि वो नहीं चाहते की स्कूल की वो हालत हो, जैसी उनके जॉइन करने के वक्त थी. उन्होंने 2011 में यह स्कूल जॉइन किया था.

171 बच्चों में से 70-80 बच्चे ही आते थे स्कूल

पांडे बताते हैं- “प्राइमरी स्कूल में मैं अकेला टीचर था और अपर प्राइमरी में भी एक ही टीचर थे. उस वक्त स्कूल में बच्चे अपने मन मुताबिक आते थे. किसी ने उन्हें नहीं समझाया था की स्कूल में आने का कोई समय होता है. 171 बच्चों में से 70-80 बच्चे ही आते थे. स्कूल में न कोई बाउंड्री वॉल थी ना ही कोई गेट. गांव वाले स्कूल के कंपाउंड से अपने गाय-भैंसों को चराने ले जाते थे.”

अब इस स्कूल की तस्वीर बदल चुकी है. प्राइमरी स्कूल में अब 532 बच्चे पढ़ते हैं. अब प्राइमरी और अपर प्राइमरी में 3-3 टीचर हैं. हालांकि अभी भी हमें और टीचर की ज़रूरत है लेकिन अभी की स्थिति पहले से काफी बेहतर है. अपर प्राइमरी स्कूल की हेड मिस्ट्रेस शहाना बेगम कहती हैं की इस पूरे बदलाव का श्रेय राजेश पांडे को जाता है. उन्होंने गांव में घर-घर जाकर लोगों से अपील की कि अपने बच्चों को स्कूल भेजें.

बहराइच के बेसिक शिक्षा अधिकारी श्याम किशोर तिवारी का कहना है की यादवपुर स्कूल की स्थिति वहां के प्रिंसिपल और टीचर्स की मेहनत के कारण सुधरी है. पिछले 8 सालों की मेहनत ने इस स्कूल को बाकियों के लिए ‘मॉडल स्कूल’ बना दिया.

 

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