BHU प्रोफेसर फिरोज खान ने कहा, मुस्लिम हूं तो क्या संस्कृत नहीं पढ़ा सकता?

राजस्थान में मेरे दादाजी गफूर खान के गाए भजन को सुन हिंदू झूम उठते थे. मेरे पिता रमजान खान ने भी संस्कृत में शास्त्री तक पढ़ाई की: फिरोज खान

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान (एसवीडीवी) फैकल्टी के साहित्य विभाग में एक मुस्लिम सहायक प्रोफेसर फिरोज खान की नियुक्ति के खिलाफ विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन किया गया. छात्र ‘गैर-हिंदू’ की नियुक्ति को रद्द करने की मांग कर रहे हैं. वहीं प्रोफेसर फिरोज खान का कहना है कि क्या मैं मुस्लिम होने की वजह से संस्कृत नहीं पढ़ा सकता?

खान ने अपने बचपन को याद करते हुए कहा कि, ‘राजस्थान में मेरे दादाजी गफूर खान के गाए भजन को सुन हिंदू झूम उठते थे. मेरे पिता रमजान खान ने भी संस्कृत में शास्त्री तक पढ़ाई की. हमें तब तक कोई दिक्कत नहीं हुई लेकिन जैसे ही मैं BHU में प्रोफेसर होने के नाते संस्कृत पढ़ाने पहुंचा छात्रों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया. उनका कहना है कि एक मुस्लिम संस्कृत नहीं पढ़ा सकता. पंडित मदनमोहन मालवीय ये तो नहीं चाहते थे.’

गौरतलब है BHU में साहित्य विभाग के शोध छात्रों और अन्य छात्रों ने गुरुवार को विश्वविद्यालय परिसर में मुस्लिम सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति के खिलाफ कुलपति के निवास के पास होलकर भवन में धरना देना शुरू कर दिया. छात्रों ने संगीत वाद्ययंत्रों को बजा कर अपनी मांगों की ओर उनका ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की.

हालांकि BHU प्रशासन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि, “उम्मीदवार की नियुक्ति यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन (यूजीसी) के नियमों और BHU के अधिनियमों के तहत पारदर्शी तरीके से हुआ है.”

BHU के कुलपति राकेश भटनागर को लिखे पत्र में प्रदर्शनकारियों ने यह दावा किया है कि विश्वविद्यालय के संस्थापक व दिवंगत पंडित मदन मोहन मालवीय ने एसवीडीवी फैकल्टी को विश्वविद्यालय के दिल का दर्जा दिया था.

पत्र में कहा गया है कि, “फैकल्टी की स्टोन प्लेट में यह भी लिखा गया है कि यह संस्था सांस्कृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक तर्क-वितर्क और सनातन हिंदुओं और उनकी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शाखाओं जैसे आर्य समाज, बौद्ध, जैन, सिख आदि के विचार-विमर्श के लिए भी है.”

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इन सभी तथ्यों को जानने के बावजूद साजिशन एक ‘गैर-हिंदू’ को नियुक्त किया गया है.

BHU के प्रवक्ता राजेश सिंह ने कहा, “यह नियुक्ति एसवीडीवी के फैकल्टी के ‘साहित्य’ विभाग में एक साक्षात्कार के बाद ही की गई है. विश्वविद्यालय ने यूजीसी के नियमों और BHU अधिनियम के तहत ही नियुक्ति की है, ऐसे में जात-पात के आधार पर भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है. नियुक्ति पूरी पारदर्शिता के साथ सिर्फ और सिर्फ उम्मीदवार की पात्रता के आधार पर की गई है.”