धर्मपरिवर्तन के सहारे हिंदुत्‍व से टक्‍कर लेंगी मायावती, नागपुर में किया सबसे बड़ा ऐलान

हिंदुत्‍व पॉलिटिक्‍स की काट के लिए मायावती दलितों के धर्मपरिवर्तन का यह दांव लेकर आई हैं. मायावती का यह ऐलान इसलिए भी अहम हो जाता है कि उन्‍होंने यह बयान महाराष्‍ट्र में दिया है.

नागपुर: बसपा सुप्रीमो मायावती ने धर्मपरिर्वतन करने की बात कही. उन्‍होंने कहा कि भीमराव अंबेडकर की तरह वह भी बौद्ध धर्म की दीक्षा लेंगी, लेकिन इसका फैसला सही समय पर किया जाएगा. महाराष्‍ट्र विधानसभा चुनाव 2019 में मायावती का यह ऐलान गेमचेंजर साबित हो सकता है.

भीमराव अंबेडकर ने 14 अप्रैल 1956 को नागपुर में ही बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी. भीमराव अंबेडकर को 1942 में भारत आकर बसे बौद्ध भिक्षु प्रज्ञानंद ने सात भिक्षुओं के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा दी थी.

मायावती ने बौद्ध धर्म अपनाने की यह बात सोमवार को नागपुर में एक सभा के दौरान कही. यहां एक सभा को संबोधित करते हुए मायावती ने कहा, ‘बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने अपने देहांत से कुछ वक्त पहले धर्म परिवर्तन कराया था. आप लोग मेरे धर्म परिवर्तन के बारे में भी सोचते होंगे. मैं भी बौद्ध धर्म की अनुयायी बनने के लिए दीक्षा अवश्य लूंगी, लेकिन यह तब होगा जब सही समय आ जाए. ऐसा तब होगा जब पूरे देश में बड़ी संख्या में लोग ऐसा धर्मांतरण करें. धर्मांतरण की यह प्रक्रिया भी तब ही संभव है, जब बाबा साहब के अनुयायी राजनीतिक जीवन में भी उनके बताए रास्ते पर चलें.’

मायावती एक के बाद एक चुनावों में हार के बाद पार्टी को दोबारा मजबूत बनाने के लिए प्रयास कर रही हैं. उनकी कोशिश है कि किसी भी प्रकार से दलितों को वापस बसपा के साथ जोड़ा जाए. अगर मायावती लाखों दलितों के साथ धर्मपरिर्वतन करने की योजना बना रही हैं तो यह दांव उनकी राजनीति के लिए बड़ा गेम चेंजर साबित हो सकता है.

एक ओर राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक हिंदुत्‍व की राजनीति के जरिए समाज के सभी तबकों को साथ लाने के लिए प्रयास कर रहा है, जिससे कि सभी हिंदू उनकी विचारधारा से जुड़ें. मायावती इसी रणनीति की काट के लिए दलितों के धर्मपरिवर्तन का यह दांव लेकर आई हैं.

मायावती का यह ऐलान इसलिए भी अहम हो जाता है कि उन्‍होंने यह बयान महाराष्‍ट्र में दिया है, जिसे दलितों को गढ़ माना जाता है. मायावती के गुरु कांशीराम ने महाराष्‍ट्र से ही दलित आंदोलन की शुरुआत की थी.

महाराष्‍ट्र से ही भीमराव अंबेडकर ने भी अपनी लड़ाई को देशव्‍यापी बनाया था. बड़ी संख्‍या में दलितों के साथ बौद्ध धर्म अपनाने का मायावती का यह दांव कितना सफल होता है यह तो वक्‍त ही बताएगा. देखना होगा कि मायावती इसमें कितनी सफल होती हैं, क्‍योंकि इस समय उनकी पकड़ पहले की तरह मजबूत नहीं रही है. हालांकि, इस बात में कोई शक नहीं कि अगर मायावती इस अभियान को देशव्‍यापी बनाने में सफल हो गईं तो नए राजनीतिक समीकरण बन सकते हैं.

धर्मपरिर्वतन के सहारे रसातल में जाती अपनी दलित पॉलिटिक्‍स में जान फूंकने की मायावती की रणनीति का संकेत संघ पर उनके पलटवार से भी मिलता है. नागपुर की सभा में मायावती ने कहा, ‘मैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के हिंदू राष्ट्र वाले बयान से सहमत नहीं हूं.

बाबा साहब आंबेडकर ने धर्मनिरपेक्षता के आधार पर संविधान बनाया था. उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के आधार पर सभी धर्म के लोगों का ख्याल रखा था. आरएसएस प्रमुख को इस तरह का बयान देने से पहले सच्चर समिति की रिपोर्ट पढ़नी चाहिए.’

विजयदशमी के अवसर पर नागपुर में आयोजित कार्यक्रम में आरएसएस प्रमुख ने कहा था कि भारत हिंदू राष्ट्र है और यहां के मुस्लिम बहुत खुश हैं.