लखनऊ का इमामबाड़ा अकेला नहीं जहां ड्रेसकोड लागू है, जानिए और कहां-कहां माना जाता है ऐसा नियम

लखनऊ के इमामबाड़े में ड्रेस कोड लागू करने की खबर है, लेकिन ऐसा नहीं कि ये पहली जगह हो जहां महिलाओं पर ड्रेसकोड लागू हुआ हो. भारत में कई जगहों पर स्त्री-पुरुष दोनों पर कपड़े पहनने के नियम लागू हैं.

लखनऊ. इमामबाड़ा परिसर में अब पर्यटकों को छोटे कपड़े या स्कर्ट पहनकर प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा. लखनऊ जिला प्रशासन ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के सुझाव पर तय किया है कि इमामबाड़ा परिसर में पर्यटक ‘गरिमामयी’ वस्त्र पहनकर ही प्रवेश करेंगे. भड़काऊ कपड़े पहनकर आनेवालों का प्रवेश वर्जित होगा. डीएम कौशलराज शर्मा के मुताबिक इसकी निगरानी की जिम्मेदारी सिक्योरिटी गार्ड्स को सौंपी गई है. इमारत में सीसीटीवी कैमरे भी लगवाए जाएंगे.

इस व्यवस्था के साथ ही ये भी तय किा गया है कि इमामबाड़ा परिस में प्रोफेशनल फोटोग्राफी और शूटिंग मना होगी.

क्या है लखनऊ का इमामबाड़ा?
इमामबाड़ा लखनऊ के इतिहास की खास पहचान का प्रतिनिधित्व करता है. इसे भूलभुलैया भी कहा जाता है जिसे नवाब आसिफउद्दौला ने बनवाया था. 1784 में ईरानी शैली में निर्मित ये शानदार इमारत अकाल राहत परियोजना के तहत बनवाई गई थी. जिनके पास खाने को नहीं था वो यहां मजदूरी करके पैसा कमा लेते थे. इसकी वजह से ही कहावत चल निकली- जिसे ना दे मौला, उसे दे आसिफउद्दौला.  मरहूम हुसैन अली की शहादत को याद करते हुए इसे बनवाया गया था. इसका विशाल गुम्बदनुमा हॉल 50 मीटर लंबा और 15 मीटर ऊंचा है. अनुमान है कि जब ये बना तब इस पर 5-10 लाख रुपए की लागत आई थी. इसकी सजावट पर हर साल 4-5 लाख रुपए तक का खर्च भी किया जाता था.

इसकी 84 सीढ़ियां बेहद खास बात हैं जो छत तक जाती हैं लेकिन ऐसे तरीके से बनाई गई हैं कि कोई अनजान शख्स फंस जाएगा. यहीं से इसका नाम भूलभुलैया पड़ा. आज भी लोग इसे गाइड लेकर ही देखने जाते हैं. इमामबाड़े में ऐसे झरोखे बने हैं कि वहां से उन लोगों पर नज़र रखी जा सकती है जो मुख्य द्वार से प्रवेश कर रहे हों, हालांकि जो अंदर आ रहा है वो झरोखे के पार बैठे शख्स को नहीं देख सकता. छत तक जानेवाला रास्ता तंग है लेकिन रौशनी और हवा का शानदार बंदोबस्त है. इसकी दीवारों में यदि आप फुसफुसाकर बात करेंगे तो दूर कोई दीवार से कान लगाकर भी सुन सकता है. इमामबाड़े की छत से लखनऊ दर्शन का अपना ही लुत्फ है. इमामबाड़े में एक असफी मस्जिद है जहां गैर मुसलमानों का प्रवेश वर्जित है.

साल 2014 में ही सिर ढक कर महिलाओं को बड़े और छोटे इमामबाड़े में प्रवेश करने का नियम लागू किया गया था. 2015 में शिया समुदाय के लंबे प्रतिरोध के बाद अधिकारियों ने बड़ा और छोटा इमामबाड़ा के दरवाजों में ताला डालने, एक ड्रेस कोड वगैरह तय करने के नियम बनाए लेकिन कभी सख्ती से इनका पालन नहीं हुआ.

अब शहर के डीएम ने लगाई रोक
लखनऊ के कलेक्ट्रेट सभागार में हुसैनाबाद ट्रस्ट के स्मारकों के संरक्षण की समीक्षा बैठक में डीएम कौशलराज शर्मा ने कहा कि छोटे और बड़े इमामबाड़े में लोगों के ‘अशोभनीय’ वस्त्र पहनकर आने की शिकायतें मिल रही थीं. ऐसे में तय किया गया है कि इमामबाड़ों में पर्यटक अब ‘गरिमामय’ वस्त्र पहनकर ही प्रवेश कर सकेंगे. इसकी निगरानी का जिम्मा गार्डों को सौंपा जाएगा और इसमें लापरवाही पर उनके खिलाफ भी कार्रवाई होगी.

डीएम के आदेश जैसे ही मीडिया में पहुंचा ये सुर्खियों में आ गया. खास बात है कि इमामबाड़े की शोहरत से खिंचकर देशभर के पर्यटक यहां पहुंचते हैं. साथ ही दुनिया भर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं क्योंकि ये इबादत की जगह भी है.

ड्रेस कोड वाली अकेली जगह नहीं इमामबाड़ा
लखनऊ के इमामबाड़े के अलावा भी देश की कई धार्मिक जगहों पर कपड़ों के बारे में नियम लागू हैं. इनमें वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर भी खास है. ऐतिहासिक महत्व रखनेवाले मंदिर में महिलाओं का साड़ी पहनकर आना अनिवार्य है.

काशी विश्वनाथ मंदिर

केरल के गुरूवायूर में भगवान कृष्ण का बेहद महत्वपूर्ण मंदिर है. इसकी अहमियत पौराणिक-धार्मिक तौर पर बहुत है. यहां पर पुरुषों को मुंडू यानि केरल की पारंपरिक लुंगी पहनना ज़रूरी है. वहीं महिलाओं के लिए साड़ी पहनना जरूरी बनाया गया. पश्चिमी परिधानों, जैसे  जींस वगैरह पर सख्त पाबंदी है.

केरल के गुरूवायूर में भगवान कृष्ण मंदिर

मध्यप्रदेश के उज्जैन में 12 ज्योतिर्लिंगों में एक महाकाल ज्योर्तिलिंग स्थापित है. इस परिसर में सभी कपड़े पहने जा सकते हैं लेकिन भगवान के अभिषेक और भस्म आरती में महिलाओं को बिना प्रयोग की गई नई साड़ी पहननी होती है. पुरुषों को धोती कुरता पहनना होता है.

उज्जैन का महाकाल शिव मंदिर

महाराष्ट्र के औरंगाबाद में दौलताबाद के नज़दीक घृष्‍णेश्‍वर महादेव का मंदिर है. ये भी 12 ज्योर्तिलिंग में अंतिम है. कुछ लोग इसे घुश्मेश्वर भी पुकारते हैं. इसके नजदीक ही एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएं हैं. मंदिर का निर्माण अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था. मंदिर के गर्भगृह में चमड़े की कोई चीज़ पहनकर प्रवेश नहीं कर सकते हैं. इसके अलावा कोट, जैकेट, शर्ट जैसे कपड़े जो शरीर के ऊपरी भाग में पहने जाते हैं उन्हें उतारकर ही प्रवेश किया जा सकता है.

औरंगाबाद का घृष्णेश्वर मंदिर