Faiz Ahmed Faiz Poem controversy, ‘हम भी देखेंगे’, फैज अहमद फैज की इस कविता का क्‍या है इतिहास? पढ़ें
Faiz Ahmed Faiz Poem controversy, ‘हम भी देखेंगे’, फैज अहमद फैज की इस कविता का क्‍या है इतिहास? पढ़ें

‘हम भी देखेंगे’, फैज अहमद फैज की इस कविता का क्‍या है इतिहास? पढ़ें

आईआईटी कानपुर में पिछले दिनों फैज अहमद फैज की कविता के नारे आईआईटी कानपुर में लगे थे. ये नारे नागरिकता कानून के विरोध में लगाए गए थे. अब उन नारों के लेकर विवाद खड़ा हो गया है.
Faiz Ahmed Faiz Poem controversy, ‘हम भी देखेंगे’, फैज अहमद फैज की इस कविता का क्‍या है इतिहास? पढ़ें

जाने माने शायर फैज अहमद फैज (Faiz Ahmed Faiz) की एक कविता को लेकर आईआईटी कानपुर भारी असमंजस में है. कैंपस में कुछ छात्रों ने नागरिकता कानून के खिलाफ फैज की कविता के नारे लगाए जिसकी जांच शुरू हो गई है. आईआईटी कानपुर ने एक समिति बना दी है. समिति तय करेगी कि उर्दू के महान शायर फैज अहमद फैज की कविता ‘लाजिम है कि हम भी देखेंगे’ हिंदू विरोधी तो नहीं है?

ये है कविता

‘लाजिम है कि हम भी देखेंगे, जब अर्ज-ए-खुदा के काबे से. सब बुत उठाए जाएंगे, हम अहल-ए-वफा मरदूद-ए-हरम, मसनद पे बिठाए जाएंगे.  सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्त गिराए जाएंगे. बस नाम रहेगा अल्लाह का. हम देखेंगे…’ बता दें कि पाकिस्तान की जिया उल हक की फौजी हुकूमत के खिलाफ फैज अहमद फैज ने ये कविता लिखी थी.

कैंपस में लगे थे नारे

पिछले दिनों ये नारे आईआईटी कानपुर में लगे थे. नारे जामिया के प्रदर्शनकारी छात्रों के समर्थन में लगाए गए थे. ये नारे नागरिकता कानून के विरोध में लगाए गए थे. अब इसी नारे ने विवाद खड़ा कर दिया है.

फौजी हुकूमत की मुखालफत

खास बात ये है कि फैज खुद नास्तिक थे और समझने वाली बात ये है कि उन्होंने ये कविता फौजी हुकूमत की मुखालफत (विरोध) के लिए पाकिस्तान के संदर्भ में लिखी थी. ऐसे में खुदा और अल्लाह का जिक्र होना स्वाभाविक ही है. और रही बात किसी धर्म के विरोध की तो ये कविता पूरी तरह से पाकिस्तान की तब की सत्ता के खिलाफ है न कि किसी धर्म के.

छात्रों की शिकायत पर मामले की जांच

फैकल्टी सदस्यों और कुछ छात्रों की शिकायत पर मामले में जांच की जा रही है. नाराजगी इस बात से है कि जामिया कैंपस में पुलिस कार्रवाई के बाद छात्रों के साथ एकजुटता जाहिर करने के लिए आईआईटी कानपुर के छात्रों ने कैंपस में जुलूस निकाला था. उसी जुलूस में फैज अहमद फैज की ये कविता गाई थी.

आईआईटी के एक शिक्षक और कुछ छात्रों ने इस पर आपत्ति जाहिर की है और डायरेक्टर से शिकायत कर दी. आरोप है कि ये कविता हिंदू विरोधी है.

ये है कविता का इतिहास

फैज ने ये कविता 1979 में सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक को लेकर लिखी थी. ये विरोध पाकिस्तान में सैन्य शासन का था. क्रांतिकारी विचारों वाले फैज ने कई साल इसी वजह से जेल में भी बिताए. दिलचस्प बात ये भी है कि पाकिस्तान में औरतों को साड़ी पहनने से रोकने का विरोध करते हुए जानी-मानी सिंगर इकबाल बानो ने 1985 में ये गीत लाहौर में गाया था. तब इकबाल बानो को भी जेल में डाल दिया गया था.

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