वाराणसी का चुनाव अब बना दिलचस्प, मोदी के खिलाफ खुल गया मोर्चा

देश की सबसे वीआईपी सीट वाराणसी पर सबकी निगाहें टिकी हैं. प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ गठबंधन ने मिलजुलकर प्रत्याशी उतार दिया है, वहीं कांग्रेस भी अपनी तरफ से रणनीति बना रही है. साफ लग रहा है कि इस बार मुकाबला एकतरफा नहीं रहनेवाला.

लोकसभा चुनाव 2019 के रण में सबसे ज़्यादा दिलचस्पी से जिस सीट के नतीजे का इंतज़ार हो रहा है वो निश्चित ही वाराणसी है. अपने ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भों के साथ वाराणसी या बनारस हमेशा ही प्रासंगिक रही है लेकिन पीएम मोदी ने 2014 में वारणसी सीट से चुनाव लड़कर इसका राजनीतिक महत्व बढ़ा दिया.

मोदी ने 2014 में इस सीट को अपने लिए क्यों चुना इस पर तब खूब विश्लेषण हुए. बाद में उन्होंने वड़ोदरा की उस सीट को भी छोड़ दिया जो उन्होंने वाराणसी के साथ-साथ जीती थी. ज़ाहिर है, वो वाराणसी विजय से हासिल फायदों को हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे, और कहानी इस बार भी वही है. एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री ने अपने लिए वाराणसी को ही चुना. इस अहम सीट पर अंतिम चरण में मतदान होना है.

वाराणसी लोकसभा क्षेत्र की बात करें तो इसमें 5 विधानसभाएं आती हैं. 3 शहरी इलाके में पड़ती हैं तो 2 ग्रामीण में. इनके नाम हैं- रोहनिया, वाराणसी उत्तर, वाराणसी दक्षिण, वाराणसी छावनी, सेवापुरी विधानसभा. इनमें रोहनिया और सेवापुरी की सीट पर अपना दल का दबदबा है जो बीजेपी की गठबंधन सहयोगी है. वाराणसी छावनी में भी कुर्मी मतदाताओं की अच्छी खासी संख्या है जिस वजह से अपना दल यहां प्रभावी है. वैसे वाराणसी लोकसभा में कुल मतदाताओं की संख्या 18,32,438 है.

वाराणसी का जातीय समीकरण
ये वाराणसी का जातीय समीकरण ही है जिसे साधकर जीत का परचम लहराया जा सकता है. साल 2014 में जब यूपी के बीजेपी प्रभारी अमित शाह अपनी पार्टी के पीएम उम्मीदवार के लिए संसदीय सीट खोजने निकले तो यही उनके दिमाग में भी था. एक बार वाराणसी की सीट तय होने के बाद उन्होंने पूरा ध्यान इसी बात पर लगाया कि नरेंद्र मोदी किसी जातिगत समीकरण की वजह से जीतने में ना चूक जाएं. इसके बाद सुनिश्चित किया गया कि अपना दल के साथ हाथ मिलाए जाएं.

varanasi, वाराणसी का चुनाव अब बना दिलचस्प, मोदी के खिलाफ खुल गया मोर्चा

इस बार प्रियंका गांधी ने कांग्रेस की तरफ से यूपी में कमान संभाल रखी है. वाराणसी भी उन सीटों में से एक है जहां वो विरोधियों को पस्त करने का हौसला बांध कर रणनीति बना रही हैं. इसी रणनीति के तहत उन्होंने बाबू सिंह कुशवाहा की जन अधिकार पार्टी को सहयोगी बनाया है. दूसरी तरफ बीजेपी की सहयोगी अपना दल के एक गुट को भी प्रियंका ने अपनी तरफ खींच लिया है जो कुर्मी मतदाताओं को बांटेगा.

आइए एक नज़र डालते हैं साल 2014 में वाराणसी के मतदाताओं की अनुमानित जातिवार संख्या पर, जो इस बार भी बहुत कुछ वैसी ही रहनेवाली है.

वैश्य- 3.25 लाख

ब्राह्मण- 2.50 लाख

मुस्लिम- 3 लाख

भूमिहार- 1.25 लाख

राजपूत- 1 लाख

यादव- 1.50 लाख

पटेल- 2 लाख

चौरसिया- 80 हजार

दलित- 80 हजार

अन्य पिछड़ी जातियां- 70 हजार

 

मोदी के खिलाफ किसने ठोकी ताल
प्रधानमंत्री मोदी अपनी पार्टी का सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं. पिछली बार उन्हें सीधी टक्कर देने के लिए आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने ताल ठोकी थी लेकिन वो हार गए. इस बार यूपी में गठबंधन ने मिलकर ऐसा प्रत्याशी खोजा जिसकी क्षेत्र में पकड़ हो. ऐसे में बहुत सोच विचारकर समाजवादी पार्टी ने शालिनी यादव को अपना प्रत्याशी बनाया. शालिनी कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल होते ही टिकट पा गईं. असल में गठबंधन की शर्तों में तय हुआ था कि वाराणसी सीट समाजवादी पार्टी के खाते में जाएगी. शालिनी ने पट कांग्रेस छोड़ चट समाजवादी पार्टी का टिकट थाम लिया. वैसे शालिनी पेशे से फैशन डिज़ाइनर हैं लेकिन राजनीति उन्हें अपने ससुर केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय श्यामलाल यादव से विरासत में मिली है. श्यामलाल यादव ना सिर्फ कांग्रेस के दिग्गज थे बल्कि गांधी परिवार के भी करीबी थे. यूपी विधानसभा से लेकर उन्होंने संसद तक में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया. इसके अलावा वो केंद्र में मंत्री भी रहे और राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन भी. खुद शालिनी ने 2017 में वाराणसी से मेयर का चुनाव लड़ा और हारीं भी, लेकिन खास बात ये थी कि बीजेपी प्रत्याशी को उन्होंने कड़ी टक्कर देते हुए 1,13,345 वोट हासिल कर अपना प्रभाव दिखा दिया. वो दूसरे नंबर पर आईं. वाराणसी में उनके इस प्रभाव को देखकर ही अखिलेश ने उन्हें पीएम मोदी के खिलाफ उतारा है.

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वहीं गठबंधन से बाहर कांग्रेस भी वाराणसी के लिए प्रत्याशी टटोल रही है. बार-बार प्रियंका गांधी का नाम उम्मीदवार के तौर पर हवा में उछाला तो जा रहा है लेकिन अब तक धुंधलका कायम है. ये भी हो सकता है कि कांग्रेस अंतिम दौर में गठबंधन प्रत्याशी का समर्थन कर दे या फिर उसे ताकत देने के लिए कमज़ोर उम्मीदवार खड़ा कर दे. अगर उम्मीदवार कमज़ोर हुआ तब तो वो गठबंधन के वोट काटने तक ही सीमित रहेगा लेकिन यदि वो मज़बूत हुआ तो फिर ना सिर्फ मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकता है बल्कि परिणाम हैरतअंगेज़ भी हो सकते हैं.