“17 अनुसूचित जातियों संग धोखा किया”, मायावती ने योगी सरकार के फैसले पर उठाए सवाल

यह तीसरी बार है कि राज्य सरकार ने 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित वर्ग में शामिल करने का प्रयास किया है.

नई दिल्‍ली: बहुजन समाज पार्टी मायावती ने भाजपा सरकार द्वारा 17 जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में डालने का विरोध किया है. उन्‍होंने इस फैसले को ‘असंवैधानिक’ बताते हुए कहा कि योगी सरकार ने ऐसा कर 17 जातियों को धोखा दिया. उन्‍होंने कहा कि 17 जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा.

मायावती ने कहा कि “योगी सरकार ने सपा की पूर्व सरकार की तरह ही एक गैर-संवैधानिक आदेश जारी करके इन 17 जातियों के लोगों के साथ बहुत बड़ा धोखा किया है. ये अच्‍छी तरह से जानते हुए कि इस तरह के असंवैधानिक आदेश पहले भी जारी किए गए थे और उन्‍हें कोर्ट ने नकार दिया था, फिर भी पुन: संविधान को नकारते हुए ऐसा आदेश जारी कर यूपी सरकार ने संविधान की भी धज्जियां उड़ाई हैं.”

योगी सरकार के कदम को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को आरक्षण का लाभ प्रदान करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है. इस सूची में जिन जातियों को शामिल किया गया है वे हैं- निषाद, बिंद, मल्लाह, केवट, कश्यप, भर, धीवर, बाथम, मछुआ, प्रजापति, राजभर, कहार, कुम्हार, धीमर, मांझी, तुहा और गौड़, जो पहले अन्य पिछड़ी जातियां (ओबीसी) वर्ग का हिस्सा थे.

उत्तर प्रदेश की 12 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव से पहले आए इस कदम से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को फायदा होने के आसार हैं और समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के वोट आधार में और गिरावट आने के आसार हैं. यह तीसरी बार है कि राज्य सरकार ने 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित वर्ग में शामिल करने का प्रयास किया है.

इससे पहले, सपा और बसपा दोनों सरकारों ने उपरोक्त जातियों को अनुसूचित वर्ग में शामिल करने का प्रयास किया था, लेकिन कानूनी हस्तक्षेप के कारण ऐसा करने में विफल रहे. मुलायम सिंह यादव शासन द्वारा पहला प्रयास तब किया गया था जब 2004 में उसने एक प्रस्ताव पेश किया था.

तत्कालीन सपा सरकार ने पिछड़े वर्ग की 17 जातियों को अनुसूचित वर्ग में शामिल करने के लिए उप्र लोक सेवा अधिनियम, 1994 में संशोधन किया. चूंकि किसी भी जाति को अनुसूचित जाति घोषित करने की शक्ति केंद्र के पास है, इसलिए केंद्र की सहमति के बिना उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार का फैसला निर्थक साबित हुआ. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बाद में इस कदम को असंवैधानिक और व्यर्थ घोषित कर फैसले को रद्द कर दिया.

2012 में एक और प्रयास किया गया तब किया गया जब अखिलेश यादव सत्ता में आए और तत्कालीन मुख्य सचिव जावेद उस्मानी की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति ने इस संबंध में समाज कल्याण विभाग से विवरण मांगा. 28 मार्च, 2012 को मुख्य सचिव के परिपत्र में सरकार की प्राथमिकताओं के बारे में बात की गई, जिसमें अनुसूचित वर्ग के भीतर 17 से अधिक पिछड़ी उप-जातियों को हिस्सा बनाना शामिल था. हालांकि, इस मामले को केंद्र ने खारिज कर दिया था.

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