वाराणसी और अमेठी पर देश की नज़र, दोनों VVIP सीटों का पूरा गणित जानिए

देश की दो सबसे अहम लोकसभा सीटों वाराणसी और अमेठी पर देश की नज़रें हैं. पीएम मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के गढ़ों का लेते हैं हालचाल.

देश की दो संसदीय सीटों के घमासान पर देशभर की नज़र है. एक तरफ वाराणसी है तो दूसरी तरफ अमेठी. दोनों ही उत्तर प्रदेश में हैं. दोनों की अपनी राजनीतिक विरासत है और दोनों पर ही देश के दो सबसे बड़े नेता चुनाव लड़कर संसद का रास्ता तय करने की जुगत में हैं.

वाराणसी से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीजेपी के प्रत्याशी हैं तो अमेठी की अपनी परंपरागत सीट से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी चुनावी ताल ठोक रहे हैं. देश-विदेश के पत्रकारों का मेला दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रंग देखने के लिए दोनों ही ज़िलों में डेरा डाले हुए है. आइए आज जल्दी से नज़र डालते हैं इन दो वीवीआईपी सीटों के राजनीतिक इतिहास पर.

वाराणसी- कांग्रेस से फिसलकर बीजेपी के हाथ में आया गढ़
देश की आज़ादी के बाद जब पहला लोकसभा चुनाव शुरू हुआ तो 1952 में वाराणसी ने भी लोकतंत्र का स्वाद चखा. 1952, 1957 और 1962  में कांग्रेस के टिकट पर रघुनाथ सिंह ने जीत दर्ज की लेकिन 1967 में रघुनाथ सिंह को हराकर कम्युनिस्ट पार्टी के सत्य नारायण सिंह वाराणसी से सांसद बने. इसके बाद कांग्रेस ने राजा राम शास्त्री की बदौलत 1971 में वापसी तो की मगर इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में (1977) भारतीय लोकदल के चंद्रशेखर ने वाराणसी की लड़ाई जीती.

1980 में मशहूर नेता कमलापति त्रिपाठी को जनता ने अपना सांसद चुना. वो इंदिरा की कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे. बेहद प्रभावशाली भी. 1984 में फिर चुनाव हुए. फिर कांग्रेस जीती. इस बार श्यामलाल यादव ने कम्युनिस्ट पार्टी को हराया. ये वही श्यामलाल यादव हैं जिनकी बहू आज गठबंधन की ओर से समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी बनकर मोदी को चुनौती दे रही हैं.

मोदी के विरुद्ध गठबंधन की प्रत्याशी शालिनी यादव उन श्यामलाल यादव की बहू हैं जो कांग्रेस से सांसद रह चुके हैं

फिर 1989 का चुनाव आया. इस बार पूर्व पीएम लालबहादुर शास्त्री के बेटे अनिल शास्त्री ने जनता दल प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़कर श्यामलाल यादव को बड़े अंतर से हराया और वीपी सरकार मे मंत्री बने.

मंडल-कमंडल के दौर में 1991 का चुनाव आया. श्रीशचंद्र दीक्षित बीजेपी के प्रत्याशी बने और सीपीएम के राजकिशोर को शिकस्त देकर पहली बार अपनी पार्टी को वाराणसी में जीत दिला दी. साल 1996 के चुनाव में एक बार फिर बीजेपी ने वाराणसी का किला फतह किया लेकिन इस बार नायक थे शंकर प्रसाद जायसवाल. यही जायसवाल 1998 के संसदीय चुनाव में भी वाराणसी से अपनी सीट कायम रखने में कामयाब रहे. 1999 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी ने उन पर भरोसा जताकर तीसरी बार टिकट दिया और वो फिर से जीते. साल 2004 में एक बार फिर शंकर प्रसाद जायसवाल को ही टिकट मिला लेकिन इस बार वो पिछली बार हारे कांग्रेस प्रत्याशी राजेश कुमार मिश्रा से शिकस्त खा गए. 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने मिश्रा पर फिर भरोसा जताया लेकिन इस बार वो चौथे नंबर पर आए. पहले नंबर पर पहुंच गए बीजेपी के मुरली मनोहर जोशी.

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को अपना पीएम उम्मीदवार बनाया तो किसी अदद सीट की खोज शुरू हुई जिससे कई उद्देश्य एक साथ सध सकें. पहली बार गुजरात की राजनीति से बाहर निकले मोदी के लिए यूपी में वाराणसी की सीट बीजेपी के रणनीतिकारों को सबसे मुफीद लगी. जो सोचा गया वही हुआ भी. प्रचंड बहुमत के साथ बीजेपी ने केंद्र में तो सरकार बनाई ही, यूपी में गठबंधन के साथ मिलकर 80 में से 71 सीटें भी जीत लीं. पीएम मोदी ने अपने सबसे करीबी प्रतिद्वंद्वी अरविंद केजरीवाल को करारी शिकस्त दी.

 

अमेठी- एक अनजान ज़िला जिसकी पहचान बन गया गांधी परिवार
राहुल गांधी चौथी बार अमेठी से कांग्रेस के प्रत्याशी बने हैं. इसके अलावा उन्होंने वायनाड सीट से भी नामांकन किया है. साल 2014 में जब राहुल ने अमेठी जीती थी तब वो कांग्रेस के उपाध्यक्ष थे लेकिन इस बार वो अध्यक्ष के तौर पर पार्टी की कमान भी संभाल रहे हैं. अमेठी का रियासत के तौर पर इतिहास करीब एक हजार साल पुराना है. अंग्रेज़ तक इस रियासत को खत्म नहीं कर सके थे.

दरअसल अमेठी लोकसभा सीट 1967 में बनी थी. इससे पहले वो प्रशासनिक तौर पर सुल्तानपुर का कस्बा भर थी. तब उन्नाव के विद्याधर वाजपेयी को कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बनाया. वाजपेयी गांधी परिवार के बेहद करीबी थे. इस चुनाव में उन्होंने भारतीय जनसंघ के गोकुल प्रसाद पाठक को मामूली फर्क से हराया. अगला चुनाव 1971 में फिर विद्याधर वाजपेयी और गोकुलप्रसाद पाठक के बीच ही लड़ा गया मगर इस बार वाजपेयी की जीत का फर्क बढ़ गया.

संजय गांधी ने अपने पहले ही चुनाव में मुंह की खाई

इसके बाद आया साल 1977. इमरजेंसी के बाद ये चुनाव हो रहा था. अब तक संगठन की राजनीति कर रहे संजय गांधी ने पहली बार चुनावी राजनीति में कदम रखा. उनके लिए रायबरेली के निकट अमेठी को चुना गया. सांसद विद्याधर वाजपेयी ने संजय के लिए अपनी सीट सहर्ष छोड़ दी, वहीं अमेठी राजपरिवार ने भी संजय का हौसला बढ़ाया. राजा रणंजय सिंह ने गांधी परिवार को आसान जीत का आश्वासन दिया था लेकिन आपातकाल में झुलसी जनता ने जनता पार्टी से प्रत्याशी बने रविंद्रप्रताप सिंह को कंधों पर उठा लिया और अपने पहले ही चुनाव में संजय गांधी को मुंह की खानी पड़ी.

साल 1980 में एक बार चुनाव हुआ और इस बार संजय गांधी फिर प्रत्याशी बने और आसान चुनाव जीतकर संसद में पहुंच गए. कुछ ही महीनों के बाद संजय का हवाई हादसे में देहांत हो गया और उप चुनावों ने अमेठी में दस्तक दी. संजय के बड़े भाई राजीव गांधी ने कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर पहला चुनाव लड़ा और लोकदल के शरद यादव को बुरी तरह हरा दिया.

अमेठी के दौरे पर पत्नी सोनिया के साथ राजीव गांधी

इसके बाद आया साल 1984 का वो चुनाव जिसमें गांधी परिवार की फूट चुनावी सिर फुटौव्वल में तब्दील हो गई. राजीव गांधी के सामने मेनका गांधी ने चुनाव लड़ा. राजीव ने तीन लाख वोटों के अंतर से मेनका को हरा दिया और प्रधानमंत्री बने. बोफोर्स के शोर में 1989 का चुनाव लड़ा गया. राजीव गांधी ने फिर अमेठी को ही चुना और इस बार उनसे हारनेवालों में अपना नाम लिखवाया जनता दल के राजमोहन गांधी ने. दुर्भाग्य से इसी साल राजीव को लिट्टे ने आत्मघाती हमले में शहीद कर दिया. उप चुनाव ने एक बार फिर अमेठी में दस्तक दी. राजीव गांधी की जगह कांग्रेस ने उनके दोस्त कैप्टन सतीश शर्मा को टिकट थमा दिया. इस तरह 1991 का उपचुनाव सतीश शर्मा आराम से जीते और सिलसिला 1996 में भी चला. इस जीत के सिलसिले पर रोक लगी 1998 में जब राजा रणंजय सिंह के दत्तक पुत्र संजय सिंह ने बीजेपी को पहली बार अमेठी मे जीत दिला दी. कांग्रेस की परंपरागत सीट तक छिन चुकी थी. सोनिया गांधी अब तक कांग्रेस का नेतृत्व संभालने को तैयार नहीं दिख रही थीं लेकिन 1999 में उन्होंने कांग्रेस की कुरसी संभालते हुए अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ा. संजय सिंह बड़े अंतर से हारे. साल 2004 तक राहुल गांधी भी राजनीति में एंट्री कर गए और अपने चाचा, पिता और मां की तरह पहला चुनाव अमेठी से लड़े. अमेठी ने उन्हें स्वीकार किया और वो पहली बार में ही 3 लाख 90 हजार वोट पाए गए जबकि उनके मुकाबले खड़े प्रत्याशी एक लाख का आंकड़ा तक नहीं छू सके. साल 2009 में राहुल गांधी की जीत का अंतर और बड़ा हो गया. फिर आया साल 2014 और स्मृति ईरानी ने अमेठी जाकर राहुल की नींद हराम कर दी. जो राहुल तीन लाख के अंतर से चुनाव जीतते थे उन्हें एक लाख के अंतर से ही जीत मिल सकी.

 एक बार फिर मोदी वाराणसी और राहुल अमेठी से चुनाव लड़ रहे हैं. गठबंधन जहां नरेंद्र मोदी की घेरबंदी करना चाहता है, वहीं बीजेपी राहुल गांधी को अमेठी में बांधकर उन्हें शर्मिंदा करने की चाहत में है. जल्द ही पता चल जाएगा कि दोनों सेना के सेनापति अपने गढ़ बचा पाते हैं या लुटाते हैं.

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