सरेंडर से लेकर याचिका तक की पूरी कर ली थी तैयारी, उज्जैन से कानपुर आते समय विकास ने किए थे कई खुलासे

विकास दुबे ने बताया था, ''मैं समझ गया था कि इस खूनखराबे के बाद पुलिस मुझे कुत्ते की तरह तलाश करेगी. मैंने गिरोह के लोगों को अलग-अलग भागने को कहा और मैं खुद अतुल और अमर को लेकर पैदल शिवली पहुंचा, जहां एक करीबी के घर दो दिन तक रुका.''
Kanpur encounter case Vikas Dubey, सरेंडर से लेकर याचिका तक की पूरी कर ली थी तैयारी, उज्जैन से कानपुर आते समय विकास ने किए थे कई खुलासे

कानपुर एनकाउंटर (Kanpur Encounter) केस में यूपी पुलिस अब तक अपराधी विकास दुबे और उसके पांच साथियों को ढेर कर चुकी है. गुरुवार को विकास दुबे (Vikas Dubey) को उज्जैन से पकड़ा गया था. पुलिस सूत्रों के मुताबिक जब एसटीएफ उसे कानपुर ला रही थी तब विकास ने एसटीएफ को पूरा घटनाक्रम विस्तार से बताया था.

पुलिस – शहीद सीओ से क्या रंजिश थी?

विकास- सीओ मुझे मारना चाहते थे. इसके लिए मेरे विरोधी उन्हें पूरी मदद कर रहे थे. मुझे एक मामले में इन्हीं लोगों के कहने पर 120-बी (अपराध की साजिश में शामिल होना) में फंसाया गया. फिर मुझे राहुल तिवारी की हत्या के प्रयास में नाप दिया. थाने के लोगों ने मुझे बताया था कि मेरा एनकाउंटर करने की सुपारी ली थी सीओ ने.

पुलिस – घटना वाले दिन क्या हुआ था?

विकास- मेरे भतीजे हीरू दुबे के पास रात आठ बजे मेरे खास सिपाही राजीव चौधरी ने फ़ोन किया था. उसने बताया कि आज दबिश की प्लानिंग है. काफी फोर्स आएगा. मेरे एनकाउंटर की पूरी तैयारी है. धीरू ने मुझे बताया तो मैंने एसओ विनय तिवारी को पलटकर फ़ोन किया था. एसओ को धमकाया भी था और कहा था कि आ गए तो अंजाम अच्छा नहीं होगा. एसओ ने कहा था कि सबकुछ सीओ के स्तर से हो रहा है, उसका रोल नहीं है.

पुलिस – आठ पुलिसकर्मियों को क्यों मारा?

विकास- मेरा प्लान ये था कि कुछ सिपाहियों को घायल कर देंगे तो पुलिस भाग जाएगी और दहशत कायम हो जाएगी. मगर मेरे प्लान के हिसाब से चीजें नहीं हुईं. अमर और अतुल ने काफी शराब पी रखी थी. अतिउत्साह में उन्होंने और गैंग के नए लड़कों ने ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी. मेरे घर पर बाहर के आधा दर्जन अपराधी रुके थे. उन्हें लगा कि कहीं पुलिस उन्हें न धर ले, इसलिए उन्होंने भी अंधाधुंध फायरिंग कर दी.

पुलिस – कौन से असलहों से फायरिंग की?

विकास- मेरे भांजे शिवम तिवारी के नाम मैंने विनचिस्टर कंपनी की सेमी ऑटोमैटिक राइफल ले रखी थी. अमर इसी से फायरिंग कर रहा था. अतुल और दूसरे साथी भी राइफल और देशी तमंचों से गोलियां चला रहे थे. ये लोग मेरे मामा प्रेम प्रकाश की छत पर मौजूद थे और मैं अपनी छत पर रिपीटर बंदूक से गोलियां चला रहा था.

मेरा अहम मकसद दहशत फैलाने का था. मगर जब पुलिसवाले भागने लगे तब मैंने नीचे उतरकर देखा तो आठ पुलिसवाले मरे पड़े थे. ये मेरी उम्मीद से कही ज्यादा था. सीओ को मैंने नीचे आकर राइफल एक गोली पैर में मारी थी, क्योंकि वो कहते थे कि विकास एक पैर से लंगड़ा है. मैं दोनों से कर दूंगा. शवों को डीजल से जलाने की तैयारी थी लेकिन वक्त न होने के चलते हम सभी भाग गए.

पुलिस – इसके बाद कहाँ भागे?

विकास- मैं समझ गया था कि इस खूनखराबे के बाद पुलिस मुझे कुत्ते की तरह तलाश करेगी. मैंने गिरोह के लोगों को अलग-अलग भागने को कहा और मैं खुद अतुल और अमर को लेकर पैदल शिवली पहुंचा, जहां एक करीबी के घर दो दिन तक रुका.

मुझे पता चला कि पुलिस शनिवार की देर रात पुलिस ने मेरे बहनोई को उठा लिया है तो मैं यहां से तड़के चार बजे निकला. नगर पालिका के एक पदाधिकारी और मेरे करीबी ने अपनी सिल्वर कलर हुंडई कार को ड्राइवर के साथ मुझे, अमर और अतुल को फरार करवाया. तड़के चार बजे हम लोग शिवली से निकल गए.

पुलिस – उसके बाद कहां गए?

विकास- यहां से सीधे नोएडा होते हुए दिल्ली गए, जहां कुछ वकीलों से मुलाकात हुई. उनसे सरेंडर की बात हुई. पचास हजार रुपये एडवांस दिलवाने की उन्होंने बोला था. यह भी तय हुआ था कि उज्जैन में सरेंडर करेंगे. इस पर मैंने गाड़ी वापस शिवली भेज दी और बस से फरीदाबाद गया, जहां प्रभात मिश्र के दूर के रिश्तेदार का मकान है.

एक दिन रुकने के बाद मैं दोबारा फरीदाबाद से वकीलों के पास दिल्ली पहुंचा. वापस फरीदाबाद जाना था लेकिन तब तक पता चला कि प्रभात गिरफ्तार हो गया है. ऐसे में मैंने संदीप पाल के नाम से पहले दिल्ली से जयपुर के टिकट कराया. फिर जयपुर से झालावाड़ गया और वहां से उज्जैन आया. वकील से यह बात भी हुई थी कि सरेंडर होते ही एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगाई जाएगी, जिससे पुलिस मेरा एनकाउंटर न कर पाए. मुझे अमर और अतुल की मौत से सबसे ज्यादा दुख पहुंचा.

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