सपा-बसपा गठबंधन खत्म होने के बाद भी इन बागियों को अखिलेश का साथ पसंद है

हाल के दिनों में नेता दोनों पार्टियों से निकल रहे हैं और बीजेपी ज्वाइन कर रहे हैं. जबकि कई ऐसा नेता हैं जो बसपा छोड़कर सपा ज्वाइन कर रहे हैं.

लोकसभा चुनाव 2019 को देखते हुए उत्तर प्रदेश में बसपा (बहुजन समाजवादी पार्टी) और सपा (समाजवादी पार्टी) के बीच गठबंधन हुआ. लेकिन चुनाव ख़त्म होते ही बसपा गठबंधन से अलग हो गई. बसपा का मुल्यांकन था कि इस गठबंधन से सपा को ज़्यादा फ़ायदा हुआ.

मायावती ने एक प्रेस कॉफ्रेंस में भी इस बात का ज़िक्र किया था कि बीएसपी का वोट सपा को ट्रांसफर हुआ लेकिन सपा को वोट बीएसपी को ट्रांसफर नहीं हुआ.

बीएसपी प्रमुख मायाावती का यह बयान अब दूसरे मायनों में एक बार फिर से सही साबित होता दिख रहा है.

हाल के दिनों में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दयाराम पाल, पूर्व सांसद लालमणि प्रसाद, मिठाई लाल भारती, अतहर खां समेत एक दर्ज़न नेता बसपा छोड़कर सपा में शामिल हुए हैं.

लालमणि और दयाराम पाल कांशीराम के सिपहसलारों में से रहे हैं. उन्होंने कांशीराम के साथ मिलकर दलित समाज के लिए बसपा का गठन किया था. लालमणी ने अपना इस्तीफा सौपते हुए उन्होंने बसपा की मौजूदा नीतियों पर सवाल खड़े किये और कहा कि लगता है कि बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर और कांशीराम के मूवमेंट से पार्टी भटक गई है, इस वजह से बहुजन समाज में आक्रोश पैदा हो रहा है.

हालांकि हाल के दिनों में नेता दोनों पार्टियों से निकल रहे हैं और बीजेपी ज्वाइन कर रहे हैं. जबकि कई ऐसा नेता हैं जो बसपा छोड़कर सपा ज्वाइन कर रहे हैं.

सपा ने भी हाल के दिनों में पार्टी में शामिल होने वाले बाग़ी नेताओं के लिए नियम आसान कर दिया है. सपा ने स्पष्ट किया है कि अगर किसी नेता पर कोई मुकदमा भी है तब भी अगर वो सपा का दामन थामना चाहता है तो स्वागत है. यानी अगर कोई बाग़ी दागी है तो भी वेलकम है.

ज़ाहिर है सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने की घोषणा की है. ऐसे में बसपा के नेताओं के सपा में शामिल होने से मायावती कमज़ोर होंगी. वहीं दूसरी तरफ अखिलेश यादव नाराज़ यादवों को मनाने में जुटी है.