जब हिटलर की फौज ने मित्र देशों की तीनों सेनाओं का हमला कर दिया था नाकाम

फ्रांस में जिस दिन ब्रिटिश और कनाडाई-अमरीकी फौजी टुकड़ियां उतरीं, उसे डी डे कहा जाता है. इसके बाद जर्मनी में हिटलर के उलटे दिन शुरू हो गए थे.

Second world war, जब हिटलर की फौज ने मित्र देशों की तीनों सेनाओं का हमला कर दिया था नाकाम

ऑपरेशन जुबली या डायपीड रेड दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान 19 अगस्त 1942 को हुई थी. जो उत्तरी फ्रांस के डिपे के जर्मन-कब्जे वाले बंदरगाह पर मित्र देशों की सेना का एक बड़ा हमला था. इस हमले को जल, थल और वायुसेना ने मिलकर अंजाम दिया था. ब्रिटेन की रॉयल एयर फोर्स के लड़ाकों के नेतृत्व में, नौसैनिक बल और टैंकों की एक टुकड़ी के साथ, 6 हजार से ज्यादा पैदल सैनिकों ने ये डायपीड रेड की थी, जिसमें ज्यादातर कनाडाई सैनिक शामिल थे.

सेकंड वर्ल्ड वॉर शुरू होते ही जर्मनी ने फ्रांस पर किया था कब्जा

दरअसल 1939 में सेकंड वर्ल्ड वॉर शुरू होते ही जर्मनी ने फ्रांस पर कब्जा कर लिया था. खतरा ब्रिटेन के दरवाजे तक आ गया था. ब्रिटेन और अमरीका के नेता चाहते थे कि जल्द से जल्द फ्रांस को हिटलर के कब्जे से आजाद कराया जाए लेकिन हिटलर की सेनाओं ने पश्चिमी यूरोप में इतनी जबरदस्त मोर्चेबंदी कर रखी थी कि ब्रिटेन और उसके सहयोगी देशों की हर कोशिश नाकाम हो रही थी.

डिपे नाम पर उतरीं ब्रिटेन और कनाडा की फौजी टुकड़ियां

डिपे के बंदरगाह पर बहुत थोड़े समय के लिए कब्जा करने का प्लान बनाया गया, ताकि लैंडिंग की संभावनाओं का परीक्षण करने के साथ साथ कुछ खुफिया जानकारी भी जुटाई जा सके. इस ऑपरेशन के जरिये जर्मनी की तटीय सुरक्षा, बंदरगाह संरचना और महत्वपूर्ण इमारतों को भी ध्वस्त किया जाना था. ब्रिटेन और कनाडा की फौजी टुकड़ियां डिपे नाम की जगह पर उतरीं.

इस ऑपरेशन में थल सेना को एयर फोर्स और नौसेना का सपोर्ट काफी कमजोर था. मित्र देशों के टैंक समंदर किनारे फंस गए थे और पैदल सेना बड़े पैमाने पर जर्मन सेना की फायरिंग और कई मुश्किलों के चलते शहर में नहीं घुस पाई थी. छह घंटे से भी कम समय में मित्र देशों की सेना पीछे हटने को मजबूर हो गई थी. दस घंटे के अंदर उस बंदरगाह पर उतरे मित्र देशों के 6,086 लड़ाकों में से 3,623 लोग या तो मारे गए, या घायल हुए या फिर पकड़े जा चुके थे.

लैंडिंग क्राफ्ट और एक विध्वंसक का नुकसान

जर्मनी की वायुसेना लूफ्टवाफे ने मित्र देशों की लैंडिंग के खिलाफ बड़ा मोर्चा खोल दिया था, जैसी कि रॉयल एयर फोर्स को उम्मीद भी थी, फिर आरएएफ ने इस हमले में अपने 106 विमान खो दिए थे, हालांकि उन्होंने जर्मनी के भी 48 विमान गिरा दिए गए थे. रॉयल नेवी को भी 33 लैंडिंग क्राफ्ट और एक विध्वंसक का नुकसान हुआ था.

नॉर्वे तक समंदर के किनारे खेमेबंदी

इस मिशन में नाकाम रहने के बाद, अगले दो साल तक मित्र देश, फ्रांस की घेरेबंदी वाली जर्मन दीवार लांघने के बारे में सोच भी नहीं सके. जर्मनों ने स्पेन से लेकर नॉर्वे तक समंदर के किनारे खेमेबंदी कर रखी थी. इसे अटलांटिक वॉल का नाम दिया गया था, जिसमें कंक्रीट के बने खेमे थे, खाइयां थीं, बड़ी बड़ी तोपें थीं. एंटी टैंक तोपें थीं और बारूदी सुरंगें बिछी हुई थीं.

जर्मनी के सुरक्षा घेरे को भेदने में मिली कामयाबी

इसके बाद फिर पहली बार मित्र देशों की सेनाएं 6 जून 1944 को फ्रांस की नॉर्मंडी नाम की जगह पर उतरीं. इसके साथ पांच और जगहों पर उन्होंने जर्मनी के सुरक्षा घेरे को भेदने में कामयाबी हासिल की. फ्रांस में जिस दिन ब्रिटिश और कनाडाई-अमरीकी फौजी टुकड़ियां उतरीं, उसे डी डे कहा जाता है. इसके बाद जर्मनी में हिटलर के उलटे दिन शुरू हो गए थे.

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