ब्रह्मपुत्र से बॉर्डर तक… बांग्लादेशी घुसपैठ के कितने रास्ते, पहली बार ‘सीक्रेट डोर’ पर पहुंचा रिपोर्टर

भारत-बांग्लादेश सीमा पर मुस्तैद सीमा सुरक्षा बल इस बात के लिए पूरी तरह से चौकस है कि बांग्लादेश से कोई भी घुसपैठिया भारत मे प्रवेश ना कर सके.
Bangladeshi infiltration, ब्रह्मपुत्र से बॉर्डर तक… बांग्लादेशी घुसपैठ के कितने रास्ते, पहली बार ‘सीक्रेट डोर’ पर पहुंचा रिपोर्टर

असम में NRC की फाइनल लिस्ट आने के बाद से जहां देश के अलग-अलग भागों में भी NRC करवाने की मांग जोर पकड़ रही है. वहीं, भारत-बांग्लादेश सीमा पर मुस्तैद सीमा सुरक्षा बल यानी BSF भी इस बात के लिए पूरी तरह से चौकस है कि बांग्लादेश से कोई भी घुसपैठिए भारत मे प्रवेश ना कर सके.

ब्रह्मपुत्र नदी के अथाह पानी में जल भवरों को पार करके BSF के ये जवान लगातार अपने कर्तव्यों को अंजाम दे रहे है. पानी में दौड़ रही स्पीड बोट भले ही हिचकोले खाये लेकिन जवानों की नजरें एक पल के लिये में भी अपने लक्ष्य से डिगती नहीं है. फिर चाहे बारिश में उफनती ब्रह्मपुत्र की लहरें हो या भीषण उमस भरी गर्मी में शरीर पसीने से तर बतर हो. मां भारती के ये सपूत अपने कर्म पथ पर सब कुछ समर्पित करने के लिए तैयार हैं.

टीवी 9 भारत वर्ष की टीम ने जब ब्रह्मपुत्र के इन जाबांज प्रहरियों से मिलने का फैसला किया तो मकसद था ये देखना कि आखिरकार हमारे बहादुर जवान किन हालातों में हमारे देश में घुसने की फ़िराक में लगे घुसपैठियों को कैसे रोकते हैं. गुवाहाटी से हमारी टीम करीब 325 किलोमीटर का सफर तय करके असम के धुबड़ी इलाके में पहुंची.

1971 में तब के पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश में पाकिस्तानी सेना के जुल्मोसितम से तंग आकर लाखों शरणार्थी भारत आये थे. असम और पश्चिम बंगाल में इसका सबसे अधिक असर पड़ा था. असम के धुबड़ी, करीमगंज और सिलचर जैसे इलाकों ने तब के पूर्वी पाकिस्तान से आये लोगों को अपने घर और दिल में जगह दी.

वक्त गुजरा. पाकिस्तान से आज़ाद होकर बांग्लादेश बना. अधिकांश शरणार्थी वापस अपने वतन लौट गए जबकि बहुत सारे लोग यहीं बस गए. तब से लगातार ये मांग उठती रही कि जो भी गैर कानूनी तौर पर भारत आये हों वो वापस बांग्लादेश जाएं.

सरकार ने 1985 के असम समझौते के तहत और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में NRC करवाया. करीब तीन करोड़ तीस लाख लोगों में से असम में रह रहे 19 लाख लोगों के नाम इस लिस्ट में नहीं आ पाए हैं. हैरानी की बात ये है कि 1971 में जिन इलाकों में बांग्लादेश से ज्यादा शरणार्थियों का आना हुआ था वहां पर लोगों के नाम लिस्ट में है जबकि गुवाहाटी या दूसरे जगहों पर बहुत सारे लोगों के नाम लिस्ट में नहीं है.

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