उल्टा चोर कोतवाल को डांटे… सेना का डर दिखाने वाला चीन भारत पर लगा रहा आरोप

कमाल की बात है… चीन (China) कह रहा है कि भारत को उसकी सीमा के करीब सड़कें, पुल, रन वे, हवाई अड्डे, संचार केंद्र और सैनिकों के रहने के स्थान नहीं बनाने चाहिए, भले ही वह खुद ऐसे सारे काम कई दशकों से कर रहा है.

  • TV9 Hindi
  • Publish Date - 5:54 pm, Thu, 15 October 20
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भारत चीन सीमा (FILE)

13 अक्टूबर को चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जाओ लीजियान ने बीजिंग में एक प्रेस ब्रीफिंग में बताया कि भारत द्वारा चीन के साथ लगने वाली सीमाओं पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और फौज की तैनाती ही चीन की टेंशन का सबसे बड़ा कारण है. जाओ ने यह भी कहा कि चीन ‘विवादित’ सीमा के करीब भारत द्वारा सैनिक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के खिलाफ है.

जाओ ने आगे फरमाया कि चीन चाहता है कि भारत दोनों देशों के बीच बनी सहमतियों का निष्ठा से पालन करे और ऐसी कोई हरकत न करे, जिससे स्थिति और खराब हो जाए. जाओ ने भारत को सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए निश्चित कदम उठाने की सलाह भी दी.

कमाल की बात है न, कि चीन कह रहा है कि भारत को उसकी सीमा के करीब सड़कें, पुल, रन वे, हवाई अड्डे, संचार केंद्र और सैनिकों के रहने के स्थान नहीं बनाने चाहिए, भले ही वह खुद ऐसे सारे काम कई दशकों से कर रहा है. भारत और चीन के बीच सीमा करीब साढ़े तीन हजार किलोमीटर लंबी है और अभी तक हमारा यह पड़ोसी यहां अपनी मन मर्जी करता था.

लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक सीमा विवाद का उठाया फायदा

अक्साई चिन इसकी अच्छी मिसाल है. आजादी के कुछ सालों के भीतर ही चीन ने धीरे-धीरे पूरे इलाके को हड़प लिया और 1962 की जंग के बाद यहां अपना नियंत्रण और मजबूत कर लिया.

लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक सीमा विवादों का फायदा उठाकर चीन की सेना बार-बार भारत में घुसपैठ करती रही है. सीमा पर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए चीन की सरकार 1950 के दशक से लगातार इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत किया है. इनमें LAC के करीब रेल, रोड और एयरपोर्ट का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना शामिल है.

शिंजियांग प्रांत से तिब्बत को जोड़ने वाला चीन का G-219 नेशनल हाइवे LAC के लगभग समानांतर लद्दाख से लेकर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा को कवर करता है. जंग के हालात में सेना की तैनाती में इस हाइवे की भूमिका कितनी अहम होगी ये आप अच्छे से समझ सकते हैं.

चीन ने रोड के साथ-साथ रेल नेटवर्क भी किया तैयार

ऐसे ही सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के इलाकों के करीब चीन ने रोड के साथ रेल नेटवर्क तैयार किया है. तिब्बत में शिगात्से-येडॉन्ग रेलवे, ल्हासा-न्यिंगची रेलवे और मेडॉग-जायू रोड का जाल बिछाया है. ध्यान देने वाली बात ये है कि चीन के इन रोड और रेल नेटवर्क में चीन की आर्मी के एयरफील्ड भी जुड़े हैं

तिब्बत में होटान, नगारी गुंसा, शिगात्से, ल्हासा गोंग्गर और न्यिंगची मेनलिंग जैसे पांच ऐसे एयरपोर्ट हैं, जिनका सैनिक और नागरिक दोनों ही तरह से इस्तेमाल किया जा रहा है.

गौरतलब है कि भारत ने कभी भी चीन के इस इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर आपत्ति नहीं की. LAC के साथ लगे सीमान्त इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के काम में भी भारत ने पिछले 5 से 6 सालों में ही तेजी दिखाई है, जब चीन की नीयत पर भारत को शक हुआ.

घुसपैठ से साफ हुए चीन के नापाक इरादे

फिर इसी साल अप्रैल-मई महीने में पूर्वी लद्दाख में चीन की घुसपैठ से चीन का इरादा साफ हो गया. सीमाओं पर चीन का मुकाबला करने के लिए भारत ने पिछले कुछ सालों में लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना शुरू किया.

2006 में भारत सरकार ने बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन (BRO) को 2012 तक सीमा से सटे इलाकों में 3324 किलोमीटर लंबी 61 सड़कें तैयार करने को कहा. हालांकि, 2015 के मार्च महीने तक सिर्फ 625 किलोमीटर सड़कें तैयार हो सकीं. मार्च 2018 तक ये आंकडा 981 किमी तक पहुंचा.

पिछले दो सालों में काम में तेजी आई और भारत ने मार्च 2020 तक 2486 किलोमीटर रोड तैयार कर ली. सीमा से जुड़े इलाकों में सेना को जल्द मोर्चे पर तैनात किया जा सके, इसके लिए 44 पुल भी तैयार कर लिए गए हैं.

भारत के पास अब तैयार है इंफ्रास्ट्रक्चर 

चीन की हर चाल का मुकाबला करने के लिए भारत के पास अब इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार है. तोपों और मिसाइलों के साथ करीब 50 हजार भारतीय सैनिक चीन की सेना का सामना करने के लिए लद्दाख में तैनात हैं. यही वजह है कि चीन अब परेशान हो रहा है.

चीन ने 2017 के डोकलाम विवाद के बाद सीमा पर जो इंफ्रास्ट्रक्चर विकास किया है. उसका मकसद अपनी वायुशक्ति को मजबूत करना है, ताकि भारत के साथ लगने वाली पूरी सीमा पर वह अपनी धमक जारी रख सके और भारत की सैनिक तैयारी में किसी कमजोरी का फायदा उठा सके.

जानकार मानते हैं कि इस बार भारत के साथ सीमा पर चीन की तनातनी पिछले सभी वाकयों से अलग है और उसका इरादा भारत को अपनी सैन्यशक्ति से डराने का है.

दक्षिण चीन सागर में भी दूसरे देशों को डरा रहा ड्रैगन

चीन ने ऐसी ही रणनीति दक्षिण चीन सागर में भी अपनाई है, जहां उसने स्थाई रक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर बना रखा है और इलाके के अन्य देशों को अपनी शक्ति दिखा कर डराने की कोशिश करता रहता है. चीन का इरादा अपने प्रतिद्वंदियों को यह संदेश देने का है कि अगर वो उसे अपनी मनमानी नहीं करने देंगे, तो यह फैसला महंगा पड़ेगा.

ध्यान देने वाली बात है कि साउथ और ईस्ट चाइना सी से सटे देशों और भारत के साथ चल रहे तनाव के बीच चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग ने बुधवार को गुआंगडोंग प्रांत का दौरा किया, एक मिलिट्री बेस पर पहुंचे, सुरक्षा बलों की तैयारियों का जायजा लिया और सेना के मरीन सैनिकों को युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा.

“चीनी हितों की रक्षा की जिम्मेदारी मरीन सैनिकों के कंधे पर”

जिनपिंग ने सैनिकों से कहा कि वो ‘एक साथ कई मोर्चों पर मुकाबला करने और सभी मौसम और इलाकों में जंग लड़ने के लिए तैयार रहें. चीनी राष्ट्रपति ने कहा कि देश के इलाके, संप्रभुता, समुद्री हितों और विदेशों में चीनी हितों की रक्षा की जिम्मेदारी मरीन सैनिकों के कंधे पर है.

चीनी राष्ट्रपति की जुबान पर किसी देश का नाम तो नहीं आया, लेकिन माना जा रहा है कि उनका इशारा अमेरिका की तरफ था, लेकिन भारत उनके जहन में बहुत दूर होगा ऐसा भी नहीं माना जा सकता.

चीन की नीयत देख कर भारत अपना डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करता रहेगा. अब इसमें कोई शक नहीं है. विशेषज्ञों का विचार है कि जब सीमा के दोनों तरफ सैनिक और बंदूकें, तोपें, टैंक और गोला बारूद जमा होंगे, तो इससे तनाव की स्थिति के काबू से बाहर चले जाने की आशंका बहुत बढ़ जाती है.

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