हिसार से पाकिस्तान गया हाफिज का परिवार, जानें कब और कैसे शुरू किया नफरत का कारोबार

बकौल हाफिज़ मोहम्मद सईद उसके पिता ने बताया था कि हरियाणा छोड़ते हुए उनके काफिले में 800 लोग थे जिन्होंने पहले ट्रेन से यात्रा की शुरूआत की लेकिन भारी मारकाट की वजह से वो पैदल ही पाकिस्तान जाने को मजबूर हुए.
Hafiz Saeed, हिसार से पाकिस्तान गया हाफिज का परिवार, जानें कब और कैसे शुरू किया नफरत का कारोबार

आतंक को पालने पोसने के लिए दुनियाभर में बदनाम आतंकी हाफिज मोहम्मद सईद को आखिर पाकिस्तान ने भी आतंक का सरगना मान लिया है. बुधवार को पाकिस्तान के एक एंटी टेरर कोर्ट ने टेरर फंडिंग के दो अलग-अलग मामलों में सईद को 11 साल की सजा सुनाई है. हालांकि आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के कई मामलों में उसे पाकिस्तान बरी कर चुका है. पाकिस्तान में बैठ न सिर्फ भारत बल्कि दुनियाभर में आतंकी मंसूबों को अंजाम देने वाले हाफिज सईद का परिवार विभाजन से पहले भारत के हरियाणा में रहता था.

हाफिज़ सईद का जन्म पाकिस्तानी पंजाब के सरगोधा में 5 जून 1950 (कई जगहों पर 6 मई 1950) को ऐसे परिवार में हुआ था जो विभाजन में हिसार से लाहौर का सफर चार महीनों के भारी संघर्ष के बाद पूरा कर सका था. इस हिजरत में उसके परिवार के 36 लोगों ने अपनी जान खो दी थी. खुद हाफिज़ सईद ने कराची के उर्दू अखबार रोज़नामा उम्मत को अपने इंटरव्यू में बताया था कि उसे विभाजन के दौरान हिंदू और सिखों के अत्याचारों के बारे में बताया गया था जिस वजह से परिवार को पुश्तैनी घर छोड़ देना पड़ा.

सईद के पिता कमालुद्दीन एक किसान थे. बकौल हाफिज़ मोहम्मद सईद उसके पिता ने बताया था कि हरियाणा छोड़ते हुए उनके काफिले में 800 लोग थे जिन्होंने पहले ट्रेन से यात्रा की शुरूआत की लेकिन भारी मारकाट की वजह से वो पैदल ही पाकिस्तान जाने को मजबूर हुए.

सरगोधा में बसने के बाद शुरूआती दिन मुश्किल थे. कुछ रिश्तेदार जो पहले ही भारत से पाकिस्तान आकर एक गांव चख में बस चुके थे उन्होंने सईद परिवार को कच्चे मकान में एक कमरा दे दिया. हाफिज़ के बचपन के कई साल वहां बीते. बाद में पिता ने एक किराना दुकान खोल ली. कुछ ही दिन गुज़रे थे कि सरकार की पॉलिसी के तहत उन्हें मुहाज़िर होने के नाते 15 एकड़ ज़मीन आवंटित की गई जिस पर एक बार फिर से परिवार किसानी करने लगा.

पांच भाई-बहनों में सबसे बड़े हाफिज़ सईद को उसकी मां ने कुरआन कंठस्थ कराई. उन्होंने गांव में एक मदरसा भी खोल लिया. पढ़ाई के साथ-साथ अब हाफिज़ का काम पिता के साथ खेती करना भी था. आगे की पढ़ाई के लिए उसे सरगोधा शहर जाना पड़ा और उससे भी आगे पढ़ने के लिए वो बहावलपुर पहुंचा. उसके चाचा हफीज़ अब्दुल्लाह खुद भी बहावलपुर यूनिवर्सिटी में पढ़ाते थे.

हफीज़ अब्दुल्लाह का ताल्लुक अहले-हदीस नाम के पंथ से था जो वहाबी समुदाय का हिस्सा है और अपने कट्टरपंथ के लिए जाना जाता है. इन्हीं हफीज़ अब्दुल्लाह के विचारों का बहुत असर हाफिज़ सईद पर पड़ा. इनका बेटा अब्दुल रहमान मक्की आगे चलकर हाफिज़ सईद का दायां हाथ बना.

1965 की जंग ने पैदा की हाफिज सईद में नफरत

वक्त बीतता रहा और भारत के प्रति हाफिज़ सईद के ज़हन में नफरत पकती रही. यहां तक कि 1965 की भारत-पाक जंग के दौरान जब वो नौवीं जमात में था तो उसने तीस-चालीस लड़कों का एक ग्रुप बनाकर लाठी-डंडों से गांव की चौकीदारी करनी शुरू कर दी. तब ये अफवाह फैली थी कि कभी भी भारतीय पैराशूटर्स सरगोधा में उतर सकते हैं.

साइकोलॉजी और फिलोसॉफी में ग्रेजुएशन करनेवाला हाफिज़ सईद जब सरगोधा में आगे की पढ़ाई करने के लिए तैयारी में लगा था तभी एक दिन उसके चाचा ने उसे अपने पिता के साथ बहावलपुर बुलाया. वो हाफिज़ को अपना दामाद बनाना चाहते थे. उसी शाम की नमाज़ के बाद निकाह पढ़वा दिया गया.

शादी के बाद हाफिज़ सईद ने लाहौर यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया जहां से उसका जीवन एक अहम मोड़ लेनेवाला था. उसने यूनिवर्सिटी की राजनीति में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी और इस्लामी जमाते तुल्बा का सदस्य बन गया. इसी दौरान पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए और पूर्व में नए देश बांग्लादेश का उदय हुआ जिससे हाफिज़ सईद को गहरा सदमा लगा. 1972 में वो पहली बार बांग्लादेश विरोधी आंदोलन में ही जेल भी गया.

अरबी और इस्लामिक स्टडीज़ में मास्टर्स करने के बाद हाफिज़ सईद को पाकिस्तानी तानाशाह ज़िया उल हक ने 1974 में इस्लामिक आइडियोलॉजिकल काउंसिल में रिसर्च असिस्टेंट के तौर पर काम करने का मौका दिया. महज़ सात महीनों के बाद उसे यूनिवर्सिटी ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी में लेक्चरर पद पर नियुक्ति मिली जहां वो आनेवाले 25 सालों तक पढ़ाता रहा.

साल 1981 में हाफिज़ सईद की ज़िंदगी ने एक और मोड़ लिया. यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हुए उसे सऊदी अरब के रियाद में स्थित किंग सऊद यूनिवर्सिटी से स्कॉलरशिप का न्यौता मिला. 2 सालों तक पढ़ाई के दौरान हाफिज़ सईद ने सऊदी अरब के प्रमुख मुफ्ती शेख अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ की तकरीरें नियमित सुनीं.

ये वो दौर था जब हाफिज़ सईद की समझ पक्की हो रही थी. वो खुद मानता है कि अगर शेख बिन बाज़ से उसकी मुलाकात ना होती तो जमात उद दावा का बनना मुश्किल था. ये वही मुफ्ती थे जिन्होंने ओसामा बिन लादेन को भी सबक दिए थे. हालांकि हाफिज़ सईद के मुताबिक उस दौर में ओसामा वहां मौजूद नहीं था.

1983 में वतन वापसी के बाद एक बार फिर से हाफिज़ मोहम्मद ने उसी यूनिवर्सिटी में पढ़ाना शुरू कर दिया, लेकिन अब वो सिर्फ पढ़ा नहीं रहा था. उसके दिमाग में एक खलबली मची थी. जमात-उद-दावा का कॉन्सेप्ट तैयार हो रहा था. कुछ वक्त बाद उसने 1985 में शेख बिन बाज़ के संस्थान मरकज़-दावत-उल -इरशाद से प्रेरणा लेकर पांच- छह लोगों के सहयोग से जमात-उद-दावा शुरू कर दिया. उस वक्त साइकिल पर चलनेवाला हाफिज़ सईद लोगों के घर-घर जाकर उन्हें इस्लामिक शिक्षा देता था. एक मैग्ज़ीन भी निकाली जाने लगी जिसका नाम था दावा, जिसे बाद में परवेज़ मुशर्रफ ने बैन भी कराया.

जहां किया बचाव कार्य…वहीं जमाई पैठ

हाफिज़ का संगठन सार्वजनिक तौर पर डिस्पेंसरी खोल रहा था, कराची से लेकर गुजरांवाला तक अस्पताल बना रहा था, एंबुलेंस चला रहा था, स्कूलों का निर्माण कर रहा था लेकिन पर्दे के पीछे जो असल खेल था वो आम भाषा में आतंकवाद कहा जाता है.  जमात -उद-दावा वो नकाब था जिसके पीछे लश्करे तैयबा की करतूतें जारी थीं. जमात-उद-दावा ने 2005 में भूकंप और 2010 में बाढ़ के दौरान लोगों के बीच जाकर जो काम किया उसने इसे मकबूलियत दिलाई. आगे चलकर इन्हीं इलाकों में वो अपनी पैठ जमाता गया.

आम पाकिस्तानी उसे समाजसेवी के रूप में देख रहा था. हाफिज़ सईद का सीधा सा गणित लोगों के बीच अपना प्रभाव जमाना और उन्हीं के बीच से अपने काम के लड़कों को कश्मीर में जारी आतंकी गतिविधियों में झोंकना था. यही वजह है कि उसके समाजसेवा के कामों की तारीफ करनेवाले अमेरिका ने ही बाद में उस पर नकेल कसवाई.

जब तक हाफिज़ सईद का हिंसक चेहरा छिपा रहा तब तक ठीक था लेकिन 9/11 के बाद दुनिया बहुत बदल गई. आतंकवाद को ना समझने का नाटक करनेवाला अमेरिका अपने आंगन में गिरती इमारतों को देखकर हिल गया. तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुशर्रफ को समझा दिया गया कि या तो साथ दो या फिर कीमत चुकाने को तैयार रहो.

अब तक हाफिज़ सईद और मौलाना मसूद अज़हर को पनाह देकर मासूम बन रहा पाकिस्तान अचानक हरकत में आया. लश्करे तैयबा को प्रतिबंधित कर दिया गया. 2002 में हुकूमत ने उसे सहला रेस्टहाउस में नज़रबंद करके उसे सब जेल में तब्दील कर दिया. यकीनन पाकिस्तान सरकार के लिए मुश्किलें बहुत बड़ी थीं. पाकिस्तान में ऐसे बहुत लोग थे जो हाफिज़ सईद के साथ थे. फिर भी अमेरिका का दबाव नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था. हाफिज़ सईद को सिर्फ तब छोड़ा गया जब उसकी मां गुज़र गई.

2008 में नवंबर के महीने में जब मुंबई आतंकियों के हमले से दहला तब भारत सरकार ने सख्त प्रतिक्रिया दिखाई. महीने भर बाद फिर से हाफिज़ सईद नज़रबंदी में था. हालांकि लाहौर हाईकोर्ट ने उसकी नज़रबंदी को जून 2009 में गैर कानूनी ठहरा दिया. इस वक्त तक पाकिस्तान में भी एक हिस्सा ऐसा उभरा जो हाफिज़ को खलनायक मानने लगा. 25 अगस्त 2009 को इंटरपोट ने हाफिज़ सईद के खिलाफ रेडकॉर्नर नोटिस जारी कर दिया. हाफिज़ सईद पाकिस्तानी सरकार के लिए वो गले की हड्डी बन गया जो ना निगला जा रहा है और ना उगला.

हालांकि पाकिस्तान भर में उसके संपर्क आईएसआई के लिए फायदेमंद थे. भारतीय कश्मीर में घुसपैठ के लिए भी वो अपने चुने हुए लड़कों को भेजता रहा है. ना जाने कितने ही सबूत हैं जिनसे साबित होता है कि हाफिज़ सईद कश्मीर में जारी हिंसा को ना केवल बढ़ावा देता है बल्कि उस पूरी हिंसक कवायद की अहम कड़ी है.

क्या इसबार FATF के डर से सुनाई हाफिज को सजा?

हाफिज़ के दो भाई हैं. एक इस्लामिक यूनिवर्सिटी में इस्लाम पढ़ाता है तो दूसरा हाफिज़ का हाथ बंटाता है. पहली बीवी से उसके तीन बच्चे थे जिनमें एक लड़की थी जिसकी मौत हो गई. बेटा तल्हा लाहौर यूनिवर्सिटी में पढ़ाता है. उसने दूसरी शादी ऐसी महिला से की जिसका पति मर चुका था. पांचों बच्चों को हाफिज़ सईद ने अपना लिया.

खुद हाफिज़ मानता है कि पहली पत्नी को दूसरे निकाह पर ऐतराज़ था मगर बेटे ने साथ दिया तो सब मान गए. अभी हाफिज़ सईद को दूसरी बीवी से भी एक बेटा और बेटी है. हाफिज़ का पूरा खानदान उसके एजेंडे को आगे बढ़ाने में शामिल रहा है. ऐसे में सिर्फ हाफिज़ सईद की गिरफ्तारी हमेशा नाकाफी साबित होती है. पाकिस्तान भी उसे ही नज़रबंद करके दुनिया भर से पड़ रहा दबाव हल्का करने का प्रयास करता रहा है.

बुधवार को लाहौर की अदालत द्वारा सुनाया गया फैसला भी फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की बैठक के दवाब में लिया गया है. FATF की चार दिनों पहली ही पेरिस में बैठक हुई है. FATF ने पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में डाल रखा है और उसे आतंकी गतिविधियों को रोकने की सख्त हिदायत दी है. अगर पाकिस्तान आतंक को रोकने के लिए सख्त कदम नहीं उठाता है तो उसे ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जाएगा और इसके बाद उसे मिलने वाली तमाम आर्थिक सहायताओं पर भी रोक लग जाएगी. ऐसा माना जा रहा है कि इसी डर से पाकिस्तान हाफिज के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है.

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