खत्म होंगी तल्खियां… क्या भारत और नेपाल ने बना लिया है द्विपक्षीय संबंध सुधारने का मन

ओली सरकार पर देश की विदेश नीति पर स्पष्ट और निश्चित सोच न होने और पड़ोसी देशों से संबंध अच्छे न रख पाने के आरोप भी लगे हैं. ऐसे समय में अगर भारत के साथ नेपाल के संबंध बेहतर होना शुरू होते हैं तो ओली सरकार जरूर राहत महसूस करेगी.

क्या नेपाल और भारत ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने का मन बना लिया है, जो पिछले 8 से 10 महीनों में तल्ख हो गए थे. संकेत तो ऐसे ही हैं. पहले भारत की तरफ से घोषणा हुई कि थलसेना अध्यक्ष एम एम नरवणे नवंबर के पहले हफ्ते में नेपाल की यात्रा करेंगे. फिर कल खबर आई कि नेपाल के प्रधानमंत्री, के पी शर्मा ओली ने अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल कर अपने रक्षा मंत्री ईश्वर पोखरेल को इस पद से हटा कर प्रधानमंत्री कार्यालय में नियुक्त कर दिया है.

पोखरेल को नेपाल की राजनीति में भारत का विरोधी और चीन का समर्थक माना जाता है. वो देश के उप प्रधानमंत्री भी थे, लेकिन नेपाल सरकार में फेरबदल का मुख्य कारण प्रधानमंत्री ओली की यह कोशिश है कि सत्ताधारी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी की विभाजित राजनीति में वो अपना पक्ष मजबूत कर सकें.

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ओली ने 3 नए मंत्री नियुक्त किए हैं, इनमें वित्त मंत्री बिष्णु पौडेल का नाम प्रमुख है. लेकिन, जैसा अपेक्षित था, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष और ओली की मुखालफत करने वाले धड़े के नेता पुष्प कमल दहाल प्रचंड इस फेरबदल से खुश नहीं हुए और इसे एकतरफा बताया. ओली और प्रचंड के बीच का सत्ता संघर्ष काफी समय से चल रहा है, और हाल के दिनों में फिर तेज हो गया है.

ओली ने फिलहाल रक्षा मंत्रालय का काम अपने पास रखा है और इसको लेकर कयासों का बाजार गर्म है. चूंकि पोखरेल का चीन प्रेम सर्व विदित है, इसलिए कहा जा रहा है कि उनका रक्षा मंत्रालय से हटना जनरल नरवणे की नेपाल यात्रा के संदर्भ में भारत के लिए एक पॉजिटिव संकेत है, कि नेपाल भारत के साथ अपने सीमा विवाद को सुलझाने पर लक्षित विचार विमर्श का इंतजार कर रहा है.

नेपाली सेना के मानद जनरल रैंक से सम्मानित होंगे जनरल नरवणे

जनरल नरवणे की नेपाल यात्रा तो फरवरी महीने में ही हो जानी चाहिए थी, लेकिन COVID-19 संक्रमण के चलते इसे स्थगित करना पड़ा था. जनरल नरवणे जब नेपाल में होंगे तब राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी उन्हें नेपाल की सेना के जनरल के मानद रैंक से सम्मानित करेंगी. यह परंपरा पिछले 70 सालों से चली आ रही है और दोनों देशों के सेनाध्यक्षों को काठमांडू और नई दिल्ली में इसी तरह मान दिया जाता है.

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी पर सीमा विवाद तेज होने के बाद जनरल नरवणे नेपाल की यात्रा करने वाले पहले उच्च भारतीय अधिकारी हैं. जनरल नरवणे ने ही उस समय कहा था कि नेपाल किसी और के उकसावे में आकर भारत नेपाल सीमा पर विवाद खड़ा कर रहा है. उस समय जनरल नरवणे के इस बयान की नेपाल में काफी आलोचना हुई थी.

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली
नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली

ईश्वर पोखरेल ने तब इसे नेपाल की बेइज्जती कहा था और आरोप लगाया था कि भारत नेपाल के इतिहास, स्वतंत्रता और सामाजिक संरचना की अनदेखी कर रहा था. 8 मई को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 80 किलोमीटर लंबी एक सड़क का उद्घाटन किया था जो धारचुला से लिपुलेख पास तक जाती है और इससे मानसरोवर यात्रा का मार्ग छोटा हो गया है.

इससे भी जरूरी बात यह है कि यह सड़क सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत के लिए तिब्बत पहुंचने का यह सबसे तेज रास्ता है. इस सड़क के खुलने को नेपाल में नाराजगी के साथ देखा गया था और ओली सरकार ने जवाब में नेपाल का एक नया नक्शा संसद में पारित करा कर प्रकाशित कर दिया. साथ ही इस इलाके में नेपाल, भारत और चीन की सीमा से लगने वाले ट्राई जंक्शन पर 370 वर्ग किलोमीटर और जोड़ दिए, जिसे भारत अपनी सीमा के भीतर मानता है. इसके बाद भारत और नेपाल में संवाद कुछ समय के लिए बिलकुल ही खत्म हो गया.

अब धीरे-धीरे सुधरने लगे हैं हालाता

फिर कुछ समय पहले प्रधानमंत्री मोदी और ओली के बीच एक टेलीफोन वार्ता हुई और द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने के प्रयास शुरू किए गए. 17 अगस्त को दोनों देशों के अधिकारी नेपाल में भारत द्वारा दी जाने वाली मदद से चलने वाले प्रोजेक्ट्स की समीक्षा के लिए काठमांडू में मिले, जिसमें नेपाल के विदेश सचिव और भारतीय राजदूत मौजूद थे और अब जनरल नरवणे नवंबर में काठमांडू में होंगे.

लौटकर नेपाल सरकार में हुए फेरबदल पर आते हैं. ईश्वर पोखरेल से रक्षा विभाग ले लिए जाने की एक और महत्वपूर्ण वजह नेपाल के सेना अध्यक्ष जनरल पूर्ण चंद्र थापा से उनकी पटरी न बैठ पाना थी. साथ ही पोखरेल, जो नेपाल की कोरोना क्राइसिस मैनेजमेंट कमिटी के अध्यक्ष भी थे, उन पर इस महामारी से ठीक से न लड़ पाने के आरोप लगे. कहा गया कि उन्होंने इस महामारी से लड़ने के लिए चीन से महंगा सामान मंगाया, लेकिन इसके लिए जरूरी प्रक्रिया का पालन नहीं किया.

सूत्रों के अनुसार नेपाल के सेनाध्यक्ष से उनके संबंध इसलिए खराब हो गए, क्योंकि नेपाल की सेना को कोरोना महामारी से लड़ने के लिए खरीदे गए सामान में गड़बड़ी होने के आरोपों वाले विवाद में शामिल करने की कोशिश की गई. हाल के दिनों में ओली सरकार पर देश की विदेश नीति पर स्पष्ट और निश्चित सोच न होने और पड़ोसी देशों से संबंध अच्छे न रख पाने के आरोप भी लगे हैं. ऐसे समय में अगर भारत के साथ नेपाल के संबंध बेहतर होना शुरू होते हैं तो ओली सरकार जरूर राहत महसूस करेगी.

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