तालिबान से बातचीत करने के लिए क्यों तैयार हुआ भारत, ये है बड़ी वजह

यह भी माना जा रहा है कि पाकिस्तान (Pakistan) ने इस बातचीत में भारत के शामिल होने पर अपनी चिंता जाहिर की होगी, क्योंकि भारतीय भागीदारी अब काबुल से कहीं आगे निकल चुकी है. भारत अफगान शांति और सुलह प्रक्रिया में एक वैध हितधारक है.

फोटो क्रेडिट- माइक पॉम्पियो ट्विटर

कतर की राजधानी दोहा में होने वाले इंट्रा-अफगान वार्ता (Intra-Afghan Inaugural Dialogue) में भारत शामिल होने के लिए तैयार हो गया है. भारत ने तालिबान (Taliban) समेत अफगान पक्ष के सभी संगठनों के साथ काबुल में शांति बनाए रखने के लिए इच्छा जाहिर की है. ऐसा करके भारत यह निश्चित करना चाहता है कि अफगानिस्तान की भूमि का इस्तेमाल भारत के खिलाफ न हो.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ”अफगान पक्षों के साथ आमने-सामने होने में भारत के रुख में कोई अस्पष्टता नहीं है, क्योंकि भारतीय प्रतिनिधिमंडल अफगान सरकार और तालिबान के साथ एक ही मेज पर बैठा. मेजबान देश कतर ने अफगान डायलॉग के सभी हितधारकों से बात करके यह संभव किया.”

यह भी माना जा रहा है कि पाकिस्तान ने इस बातचीत में भारत के शामिल होने पर अपनी चिंता जाहिर की होगी, क्योंकि भारतीय भागीदारी अब काबुल से कहीं आगे निकल चुकी है. भारत, अफगान शांति और सुलह प्रक्रिया में एक वैध हितधारक है.

तालिबान से की शांति की अपील

पिछले एक दशक से भारत तालिबान के साथ बातचीत के लिए अनिच्छुक रहा है, लेकिन विदेश मंत्री के उद्घाटन सत्र को संबोधित करने के बाद यह अस्पष्टता समाप्त हो गई है. भारत दोनों पक्षों के साथ बातचीत के लिए तैयार है. अति रूढ़ीवादी सुन्नी संगठन का तालिबान नेतृत्व क्वेटा के बोलन दर्रे के पास है. इस हक्कानी नेटवर्क का नेतृत्व सिराजुद्दीन हक्कानी कर रहा है.

अफगान सुलह के अमेरिकी प्रतिनिधि जलमय खलीलजाद (Zalmay Khalilzad) मंगलवार को विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ मुलाकात करेंगे और भारत को अफगान शांति, चुनाव और भारत से उम्मीदों पर ब्रीफ करेंगे. एक पश्तून और खलीलजाद इस्लामाबाद से पहुंचे हैं.

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अफगानिस्तान की सरकार और तालिबान के बीच शांति की अपील की. उन्होंने दोनों पक्षों से यह अपील भी की कि अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल भारत के खिलाफ न हो. आपको बता दें कि पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी कैंप बोलन पास और खैबर में मौजूद हैं.

क्या है भारत की चिंता

भारत इस बात को समझता है कि अमेरिका 19 साल बाद अफगानिस्तान से अपनी सेना को वापस बुला रहा है. अमेरिकी सेना के हटते ही काबुल में हिंसा बढ़ने के आसार हैं. चुनाव के बाद यहां सिर्फ 4700 सैनिक ही बचेंगे. हालांकि, दोहा से सकारात्मक खबर यह है कि अफगानिस्तान सरकार और तालिबान दोनों बातचीत की मेज पर एक साथ थे. यह उम्मीद लगाई जा रही है कि अफगानिस्तान में तालिबान चुनाव का रास्ता अपना सकता है.

Related Posts