इजराइल में आम चुनाव आज, भारत के लिए नेतन्याहू की जीत के क्या है मायने?

भारत और इजराइल करीबी सहयोगी हैं. नेतन्याहू ऐलान कर चुके हैं कि वह वेस्ट बैंक के करीब एक तिहाई हिस्से को इजराइल में शामिल करेंगे.

इजराइल में संसदीय चुनाव के लिए मंगलवार को वोट डाले जा रहे हैं. इस चुनाव में‘लिकुड पार्टी’की अगर जीत होती है तो बेंजामिन नेतन्याहू लगातार चौथी बार और कुल मिलाकर रिकॉर्ड पांचवी बार प्रधानमंत्री बनेंगे. इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का मुक़ाबला इस बार मुख्य विपक्षी नेता बेनी गांट्ज़ से है.

इजराइली सेना के पूर्व प्रमुख जनरल बेनी गांट्ज़ बेहद ईमानदार और साफ़ छवि के नेता हैं. दिसंबर- 2018 में ही वे ‘इजराइल रेसिलिएंस’ नामक पार्टी बनाकर चुनावी मैदान में उतरे हैं.

शुरुआत में उनकी पार्टी को बड़ी चुनौती नहीं माना जा रहा था, लेकिन जब बीती फरवरी में बेनी गांट्ज़ ने तीन पूर्व जनरलों को अपनी पार्टी से जोड़ा और देश की दो अन्य प्रमुख पार्टियां तेलेम और येश अतिद के साथ मिलकर ‘ब्लू एंड वाइट’ गठबंधन बनाया तो वे मुख्य लड़ाई में आ गए. हालांकि इन दोनों के अलावा 28 अन्य पार्टियां भी मैदान में है.

माना जा रहा है कि अगर अल्पसंख्यक अरब वोटर बड़ी तादाद में वोट डालने के लिए घरों से निकले तो नेतन्याहू की राह मुश्किल हो सकती है. इजराइल की कुल आबादी में 74.2 प्रतिशत यहूदी हैं, जबकि 21 प्रतिशत गैर-यहूदी अरब हैं. बाकी बचे 4.8 प्रतिशत को ‘अन्य’ में गिना जाता है.

इजराइल में कुल 58 लाख वोटर हैं, इनमें करीब 17 फीसदी इजराइली अरब हैं. जाहिर है, नतीजों को तय करने में इनकी अहम भूमिका हो सकती है. अरब नेताओं का दावा है कि वे 28 सीटें जीत सकते हैं बशर्ते कि अरब वोटरों का टर्नआउट 65 प्रतिशत हो.

बता दें कि इसी साल अप्रैल महीने में इजराइल आम चुनाव हुआ था लेकिन मई महीने में एक सैन्य विधेयक पर पैदा हुए गतिरोध के बाद एक सहयोगी दल ने गठबंधन में रहने से इंकार कर दिया. नतीजतन संसद भंग कर दोबारा चुनाव कराने का फैसला किया गया.

अप्रैल में जब चुनाव हुए थे तो कुल 120 सीटों में से नेतन्याहू की पार्टी लिकुड को 35, गैंट्ज की ब्लू ऐंड वाइट पार्टी को भी 35 और 50 सीटें अन्य को मिली थीं. इजराइली संसद नेसेट के अबतक के 71 सालों के इतिहास में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है. विशेषज्ञों के मुताबिक इस बार के भी नतीजे अप्रैल जैसे हो सकते हैं.

हालिया चुनावी सर्वेक्षण की माने तो बेंजामिन नेतन्याहू रिकॉर्ड पांचवी बार प्रधानमंत्री बनने वाले है. सवाल यह उठता है कि कई भ्रष्टाचार के मामलों में घिरे होने के बाद और चार बार प्रधानमंत्री होने के बाद भी एंटी इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) क्यों नहीं दिखता.

जानकार मानते हैं कि इजराइल की चुनावी प्रक्रिया की वजह से भी बेंजामिन नेतन्याहू एक बार फिर से जीतते दिखाई दे रहे हैं. यहां चुनाव ‘अनुपातिक-मतदान योजना’ के तहत होता है. इसमें वोटर को बैलेट पेपर पर प्रत्याशियों की जगह पार्टी को चुनना पड़ता है. किसी भी पार्टी को वहां की संसद (नेसेट) में पहुंचने के लिए कुल मतदान में से न्यूनतम 3.25 फीसदी वोट पाना जरूरी है.

अगर किसी पार्टी का वोट प्रतिशत 3.25 से कम रहता है तो उसे संसद की कोई सीट नहीं मिलती. पार्टियों को मिले मत प्रतिशत के अनुपात में उन्हें संसद की कुल 120 सीटों में से सीटें आवंटित कर दी जाती हैं.

इजराइल की बहुदलीय प्रणाली और चुनावी प्रक्रिया की वजह से बीते 70 सालों में किसी भी पार्टी को चुनाव में पूर्ण बहुमत नहीं मिला. इजराइल चुनाव में सबसे ज्यादा सीट जीतने वाली पार्टी भी सरकार नहीं बना सकती अगर दूसरी पार्टी चुनाव के बाद अन्य दलों से गठबंधन करने में कामयाब हो जाए.

दो सर्वेक्षणों में लिकुड को 32 सीटों का अनुमान जताया गया है, जबकि ब्लू ऐंड वाइट को 31 सीट मिलने की भविष्यवाणी की गई है. मतलब यह कि चुनाव बाद गठबंधन करने में जो बाजी मारेगा, अगले 4 साल तक उसकी सत्ता हो सकती है.

नेतन्याहू को दक्षिणपंथी सरकार माना जाता है. इस वजह से सारी दक्षिणपंथी पार्टियां चुनाव नतीजे के बाद उनके साथ आ जाती है. इस बार भी चुनाव में दक्षिणपंथी विचारधारा की पार्टियों की संख्या ज्यादा है, इसलिए माना जा रहा है कि बेंजामिन नेतन्याहू के समर्थन वाली सरकार बनेगी.

नेतन्याहू के लिए इस जीत के मायने

नेतन्याहू रेकॉर्ड 5वीं बार सत्ता में आने के लिए लड़ रहे हैं.उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप हैं और अगर उनकी जीत होती है तो उसका सीधा मतलब होगा कि कार्यकाल पूरा होने तक उनके खिलाफ मुकदमे नहीं चलाए जा सकेंगे.

इजराइल के अटॉर्नी जनरल भ्रष्टाचार के तीन मामलों में पुलिस जांच के बाद उनके खिलाफ मुकदमा चलाए जाने की इजाजत दे चुके हैं, जिसकी कार्रवाई अगले महीने शुरू की जाएगी. वह जीतते हैं तो फिलिस्तीनियों को रियायत देने पर शायद हो सहमत होंगे जबकि गैंट्ज फिलिस्तीनियों के साथ बातचीत के लिए ज्यादा खुले होंगे.

साल 1967 में इजराइल ने युद्ध के दौरान सीरिया से गोलान क्षेत्र छीन लिया था और साल 1981 में इस क्षेत्र पर अपना कब्ज़ा जमा लिया था. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने अब तक इस कब्जे को मान्यता नहीं दी है. पिछले मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान नेतन्याहू ने घोषणा करते हुए कहा कि अगर वे दोबारा प्रधानमंत्री बनते हैं, तो वेस्ट बैंक में इजराइली बस्तियां बसाएंगे.

उनका कहना था, ‘अगर हम दोबारा सत्ता में आते हैं, तो इजराइल के संप्रुभ क्षेत्र में विस्तार होगा. इजराइल के विस्तार को जॉर्डन घाटी और नॉर्थ डेड समुद्र तक लेकर जाएंगे. अभी वहां पर जो यहूदी रह रहे हैं, उन्हें ज्यादा सुविधाएं दी जाएंगी.’

इसके अलावा इजराइली प्रधानमंत्री ने एक और बड़ा दावा किया. उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस मसले पर उनके साथ खड़े हैं.

इजराइल और फिलीस्तीन के बीच दशकों से विवाद चल रहा है. वेस्ट बैंक की बात करें तो इजराइल की ओर से यहां पर लाखों यहूदियों को बसाया जा चुका है. लेकिन इसी हिस्से में 20 लाख से ज्यादा फिलीस्तीनी लोग भी रहते हैं.

वेस्ट बैंक, पूर्वी यरूशलम और गाजा पट्टी पर फिलीस्तीन अपना दावा करता है. बेंजामिन नेतन्याहू यहां अब चार लाख यहूदियों की बस्ती का विस्तार कर इन क्षेत्रों को अपने अधिकार में लेना चाहते हैं.

रविवार को एक साक्षात्कार में बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा, ‘किसमें इतनी क्षमता है जो अमेरिका के दबाव के आगे खड़ा रहे. मैंने बिल क्लिंटन और बराक ओबामा के समय दबाव का समना किया….यह ऐतिहासिक मौका है, मैं इतिहास की दिशा मोड़ रहा हूं. हम पीछे हटने और दूसरों के आगे झुकने के बजाय मान्यता और अधिकार लेने जा रहे हैं…मैंने यरुशलम को राजधानी घोषित करवाया, गोलान क्षेत्र को आधिकारिक मान्यता दिलवाई और अब मैं जॉर्डन घाटी को इजराइली क्षेत्र के रूप में मान्यता दिलवाने के लिए कूटनीतिक प्रयास शुरू कर रहा हूं…और ये सब, मैं राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ मिलकर करना चाहता हूं.’

भारत के लिए इजराइली चुनाव की अहमियत

भारत और इजराइल करीबी सहयोगी हैं. नेतन्याहू ऐलान कर चुके हैं कि वह वेस्ट बैंक के करीब एक तिहाई हिस्से को इजराइल में शामिल करेंगे. नेतन्याहू की पार्टी लिकुड ने चुनाव प्रचार के दौरान नेतन्याहू की पीएम मोदी और ट्रंप के साथ की तस्वीरों को पोस्टरों, होर्डिंग्स और बैनरों पर खूब जगह दी थी.

पीएम मोदी और बीबी के नाम से मशहूर नेतन्याहू के व्यक्तिगत रिश्ते भी काफी प्रगाढ़ हैं. इसके अलावा दोनों देशों के प्रमुख दक्षिणपंथी विचारधारा के हैं. ऐसे में अगर नेतन्याहू की जीत हुई तो भारत-इजराइल संबंधों में और गर्मजोशी देखने को मिल सकती है.