जब 11 साल की मलाला ने ली तालिबानियों से टक्कर, पढ़ें- नोबल पुरस्कार विजेता के संघर्ष और कामयाबी के किस्से

मलाला (Malala Yousafzai) ने उन दिनों को अपनी किताब में बहुत ही बारीकी के साथ बताया, जब उनके परिवार को तालिबान (Taliban) की तरफ से धमकियां मिलती थीं.
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पाकिस्तान (Pakistan) की मलाला युसुफजई (Malala Yousafzai) किसी पहचान की मोहताज नहीं है. दुनिया भर के लोग मलाला को जानते हैं. और इसके पीछे वजह है बंदूक की वो गोली, जिससे जंग जीतकर मलाला दुनिया भर की लड़कियों की प्रेरणा बन गई. तालिबानी (Taliban) ने खूब कोशिश की थी वो मलाला जैसी कई लड़कियों की शिक्षा पर रोक लगाए. पर मलाला ने अपनी शिक्षा के लिए ही नहीं बल्कि अपने क्षेत्र की तमाम लड़कियों की शिक्षा के लिए तालिबानियों से सीधे टक्कर ली.

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आज 23 साल की हुईं मलाला

12 जुलाई यानी आज मलाला युसुफजई का जन्मदिन है. मलाला के जन्मदिन के खास मौके पर आज हम उनके संघर्ष और कामयाबी के किस्से आपके साथ शेयर कर रहे हैं. ऐसे किस्से जिन्हें सुनकर आपके अंदर भी एक उर्जा भर जाएगी. ऐसे किस्से जिन्हें सुनकर आप हैरान भी हो सकते हैं कि कैसे एक छोटी सी लड़की ने तालिबानी आतंकियों का सामना किया.

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पाकिस्तान के स्विट्जरलैंड में जन्मी मलाला

मलाला का जन्म खैबर पख्तूनख्वा की स्वात घाटी में 1997 में हुआ था. स्वात घाटी को पाकिस्तान का स्विट्जरलैंड कहा जाता था. मलाला के बाबा उन्हें प्यार से जानेमन और मां पीशो बुलाती थीं, जिसका मतलब होता है बिल्ली. साल 2007 से लेकर 2009 तक तालिबान का स्वात घाटी पर कब्जा रहा. वो लड़कियों को न तो पढ़ने की इजाजत देते थे और न ही उन्हें स्कूल जाने की इजाजत थी.

जब मलाला ने तालिबानियों को ललकारा

तालिबानियों के आतंक से अपने परिवार को बचाने के लिए मलाला के पिता जियाउद्दीन अपने परिवार को पेशावर ले गए. मलाला महज 11 साल की थीं जब उन्होंने पहली बार तालिबानियों से सीधे तौर पर अपने भाषण के जरिए टक्कर ली.

यहां मलाला ने एक भाषण दिया, जिसका टाइटल था- How Dare The Taliban Take Away My Basic Education? यहीं से शुरू हुआ था मलाला का शिक्षा को लेकर संघर्ष.

जियाउद्दीन भी तालिबानियों को स्वात घाटी से खदेड़ने के लिए अभियान चलाते थे. उनके साथ कई लोग शामिल थे. 2010 में मलाला का परिवार वापस स्वात घाटी आकर रहने लगा था. यहां जियाउद्दीन का अपना स्कूल था, जिसका नाम था – कुशल स्कूल. मलाला इसी स्कूल में पढ़ती थीं. मलाला बताती हैं कि एक मुफ्ती ने उनके स्कूल को बंद कराने की कोशिश तक की थी, लेकिन उनके पिता ने ऐसा होने नहीं दिया. मुफ्ती कहते थे कि लड़कियों को पढ़ाने की जरूरत नहीं है और उन्हें पर्दें में रहना चाहिए.

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ध्यान रखो… अगले तुम हो

मलाला ने उन दिनों को अपनी किताब में बहुत ही बारीकी के साथ बताया, जब उनके परिवार को तालिबान की तरफ से धमकियां मिलती थीं.

“मैं पैदल जाने के बजाए बस से स्कूल जाना शुरू कर दिया था क्योंकि मेरी मां डरती थीं. हमें पिछले कई सालों से धमकियां मिल रही थीं. कभी अखबार के जरिए तो कभी कोई कागज के जरिए धमकी देता. मेरी मां को मेरी चिंता थी, लेकिन मुझे लगता था कि तालिबान मेरे बाबा को निशाना बनाएगा, क्योंकि वो अक्सर उनके खिलाफ बोला करते थे.”

अगस्त में उनके सबसे अच्छे दोस्त और अभियान में उनके साथ शामिल जाहिद खान की चेहरे पर गोली मारकर अगस्त में हत्या कर दी गई थी, जब वो नमाज पढ़कर लौट रहे थे.

मैं जानती थी, सभी मेरे बाबा से कहते थे कि अपना ध्यान रखो… अगले तुम हो.

9 अक्टूबर, 2012 – वो खूनी दिन

मंगलवार 9 अक्टूबर, 2012 यह वहीं दिन था जब तालिबान के आतंकियों ने मलाला को स्कूल से आते समय गोली मारी थी. मलाला बताती हैं कि परीक्षा चल रही थीं, इसलिए परीक्षा को लेकर थोड़ी टेंशन भी बनी हुई थी. वो अपनी दोस्त मोनिबा और एक अन्य लड़की शाजिया के साथ स्कूल बस में बैठी हुई थीं. स्कूल बस में 20 लड़कियां और तीन टीचर थे.

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मलाला घर से स्कूल के बीच पड़ने वाले सुंदर रास्तों और नजारों का लुत्फ लेती जा ही थीं. जैसा कि उन्होंने कहा था कि वो दिन में सपने देखती थीं, तो स्कूल बस में बैठे हुए भी उन्हें अपने पिता को लेकर चिंता सता रही थी. उन्होंने सपना देखा कि किसी ने उनके बाबा को गोली मार दी है. इसी बीच मलाला का सपना टूट जाता है.

सामने से हल्के रंग के कपड़े पहने एक व्यक्ति आता है और अपना हाथ हिलाते हुए बस को रोकने के लिए कहता है. मलाला बताती हैं, उस शख्स ने उसमान भाई (स्कूल बस ड्राइवर) से पूछा-

“क्या यह कुशल स्कूल की बस है?” उसमान भाई को लगा कि यह कैसा बेकार सा सवाल है जबकि बस पर बड़े-बड़े अक्षरों में स्कूल का नाम लिखा हुआ है. उसमान भाई कहते हैं – “हां.”

फिर वो शख्स कहता है कि मुझे कुछ बच्चों की जानकारी चाहिए. उसमान भाई उससे कहते हैं कि तुम्हें ऑफिस जाना चाहिए. वह कोई कॉलेज जाने वाले लड़के की तरह दिख रहा था.

वह जोर से चिल्लाने लगा और उसने पूछा – “मलाला कौन है?”

किसी ने कुछ नहीं कहा लेकिन कुछ लड़कियां मेरी तरफ देखने लगीं. पूरी बस में मैं अकेली लड़की थी, जिसने अपने चेहरे को कवर नहीं कर रखा था.

“फिर उसने अपनी पिस्टल निकाली. मेरे दोस्तों ने बताया कि उसने तीन गोली चलाईं. पहली गोली मेरी लेफ्ट आंख के पास लगी और दूसरी लेफ्ट हाथ में. दोस्तों ने यह भी बताया कि जब उसने गोली चलाई तो उसके हाथ बुरी तरह से कांप रहे थे.”

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इसके बाद मलाला को अस्पताल ले जाया गया और उनकी सर्जरी हुईं. वो कई सालों तक इलाज के लिए इंग्लैंड में रहीं. गोली लगने के बाद भी मलाला ने हार नहीं मानी. तालिबान ने भले ही बहुत कोशिशें कीं कि मलाला युसुफ़ज़ई के हाथों से उनकी कलम छीन ले, पर ऐसा हो न सका.

मलाला ने गोली खाकर भी दुनिया में वो नाम कमाया, जो कि आज हर लड़की के लिए प्रेरणा बन गया है. मलाला ने लड़कियों की पढ़ाने के लिए संघर्ष किया और आज वो ग्लोबल आइकन बन चुकी हैं. अपनी लगन और अपने जज्बे के चलते मलाला नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित हो चुकी हैं. इतना ही नहीं यूनाइटेड नेशनल मलाला के जन्मदिन यानी 12 जुलाई को मलाला डे घोषित कर चुका है.

(इस लेख में लिखे गए अंश ‘I am Malala’ किताब से लिए गए हैं )

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