अल्‍बामा में बच्‍चों का यौन शोषण करने वाले बनाए जाएंगे नपुंसक, सिर्फ दो देशों में है इतनी कड़ी सजा

यह अमेरिका का पहला राज्य है, जहां पर बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध को रोकने के लिए इतना सख्त कानून बनाया गया है.

अल्बामा: अमेरिका के अल्बामा में अब बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न करने वालों को ऐसी सजा दी जाएगी, जिसके बाद कोई भी शख्स बच्चों को अपना शिकार बनाने से पहले हजार बार सोचेगा. अल्बामा में बच्चों का यौन शोषण करने वालों को नपुंसक बनाने की सजा का कानून पास हुआ है.

यह अमेरिका का पहला राज्य है, जहां पर बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध को रोकने के लिए इतना सख्त कानून बनाया गया है. रसायनिक प्रक्रिया के जरिए बच्चों के खिलाफ अपराध में संलिप्त आरोपियों को नपुंसक बनाने का कानून अल्बामा के गवर्नर काय इवे ने बिल पर साइन करके पास किया.

इस बिल को रिपब्लिकन पार्टी के नेता स्टीव स्मिथ की ओर से सदन में पेश किया गया था, जिसे अल्बामा के दोनों सदनों में सर्वसम्मति के साथ पारित किया गया.

इस बिल के अनुसार, अब जो भी व्यक्ति 13 साल से कम उम्र के बच्चों को यौन शोषण का शिकार बनाता है तो उसे मिली सजा के बाद उसकी रिहाई से पूर्व उसे रसायनिक प्रक्रिया के जरिए नपुंसक बना दिया जाएगा. यह प्रक्रिया आरोपी की रिहाई से एक महीने पहले शुरू की जाएगी.

वहीं इसका फैसला कोर्ट के जज द्वारा किया जाएगा कि आरोपी को नपुंसक बनाने के लिए कितनी मात्रा में और कब तक दवा देनी है. इसके अलावा इस प्रक्रिया के लिए जो भी खर्चा होगा, उसका भुगतान आरोपी को ही करना होगा.

रिपोर्ट के अनुसार, इस पर गवर्नर काय इवे का कहना है कि यौन शोषण जैसे जघन्य अपराध के लिए इसी प्रकार की सख्त सजा होनी चाहिए, क्योंकि अभी अपराधियों के अदंर भय नहीं है और यही कारण है कि ऐसे मामलों में इजाफा हो रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि इससे ऐसे लोगों के मन में डर बैठेगा, जो कि बच्चों को अपना शिकार बनाते हैं. यह कानून बच्चों की सुरक्षा हेतु एक बड़ा कदम है.

वहीं इस कानून को लेकर कुछ मानवाधिकारी संगठन आगे आए हैं, जिन्होंने इस कानून को गलत ठहराया और इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं.

इन देशों में भी है ये सजा

अल्बामा पहला शहर नहीं है, जहां पर यौन शोषण के आरोपियों को नंपुसक बनाने की सजा का कानून बनाया गया है. दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया ऐसे दो देश हैं, जहां पर यौन शोषण के आरोपियों के लिए इतनी कड़ा सजा का प्रावधान है. दक्षिणा कोरिया में साल 2011 में यह कानून लागू किया गया था. वहीं साल 2016 में इंडोनेशिया ने इस कानून को लागू किया था.

 

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