कोर नहीं करोड़ कमांडर कहलाते हैं PAK में सैन्य अधिकारी, क्या नवाज शरीफ कर पाएंगे मुकाबला?

नवाज शरीफ ने कहा कि पहले देश की सेना देश के भीतर एक इंस्टीटूशन यानि संस्थान था लेकिन धीरे-धीरे इसने देश से भी बड़े संस्थान की शक्ल ले ली है, जो सभी कायदे कानूनों से ऊपर है और जिसे छूने की हिम्मत भी कोई नहीं कर सकता, उसकी आलोचना की तो बात ही छोड़ दीजिए.

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पाकिस्तान में रविवार 20 सितंबर को कुछ ऐसा हुआ जिसकी उम्मीद वहां शायद ही किसी ने की हो. पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने लंदन से एक तकरीर में पाकिस्तान की कई विपक्षी पार्टियों को संबोधित किया और देश के सबसे सम्मानित संस्थान, सेना को, जोरदार शब्दों में आड़े हाथों लिया. इन विपक्षी पार्टियों को एक मंच पर लाने का काम PPP यानि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो जरदारी ने किया. आज हम पाकिस्तान पर चर्चा करेंगे और देखेंगे कि वहां विपक्ष की इस लामबंदी को गंभीरता से लिया जा सकता है?

नवाज शरीफ ने कहा कि पहले देश की सेना देश के भीतर एक इंस्टीटूशन यानि संस्थान था लेकिन धीरे-धीरे इसने देश से भी बड़े संस्थान की शक्ल ले ली है, जो सभी कायदे कानूनों से ऊपर है और जिसे छूने की हिम्मत भी कोई नहीं कर सकता, उसकी आलोचना की तो बात ही छोड़ दीजिए.

नवाज शरीफ और अन्य विरोधी नेताओं ने मांग की है कि देश की सियासत में पाकिस्तानी सेना की दखलंदाजी खत्म होनी चाहिए. सभी जानते हैं कि पाकिस्तान जब से आजाद हुआ है, तब से या तो देश में मिलिट्री डिक्टेटर का राज रहा है या अगर जनतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार रही है तो उसे सेना के जनरलों का हुक्म बजाना पड़ा है.

नवाज शरीफ का कहना था कि उनकी जद्दोजहद प्रधानमंत्री इमरान खान से नहीं है, बल्कि उनसे से है, जिन्होंने इमरान खान की गैरकानूनी सरकार को सत्ता में स्थापित किया. अपना गम साझा करते हुए नवाज शरीफ ने कहा कि राजनीतिक नेताओं को हमेशा जवाबदेही का हवाला दे कर फंसाया जाता रहा है, जबकि सेना के जनरलों को देश के संविधान से खिलवाड़ और अन्य कई गलत काम करने के बावजूद कभी कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सका है.

कोर नहीं करोड़ कमांडर कहलाते हैं सेना के अधिकारी

यह बिलकुल सच है कि पाकिस्तान में सेना के जनरलों का रुतबा ही अलग है और वे बिना किसी रोक या खौफ के अपनी मर्जी से काम करते हैं. जब वे सेना में हों तब और जब वे रिटायर हो जाएं उसके बाद भी. पाकिस्तान में ये जानकारी आम है कि सेना के जनरल विदेशों से पैसा लेते हैं. सभी रक्षा सौदों में कमीशन लेते हैं. रिटायर हो जाने के बाद विदेशी कंपनियों में बड़ी बड़ी और महंगी नौकरियां करते हैं.

पाकिस्तान के भीतर अपने रुसूख का इस्तेमाल कर पैसे की एवज में स्थानीय उद्योगपतियों और कॉर्पोरेट्स के काम कराते हैं. खुद अपने परिवार वालों के गलत काम सही कराते हैं. इनके कारनामे यहीं खत्म नहीं होते. पैसों के बदले ये जनरल साहिबान अशांत इलाकों में वसूली और सिक्योरिटी यानि सुरक्षा देने का काम भी करते हैं.

पाकिस्तान में यह किसी से छिपा नहीं है कि चाहे जनरल परवेज कयानी हों या राहील शरीफ सभी ने अपने पद और रुसूख का इस्तेमाल कर अपने और अपने परिवार वालों के लिए बिजनेस में हस्तक्षेप किया, पैसे बनाए और महंगी जमीन पर कब्जा किया. जनरल परवेज मुशर्रफ ने तो दुबई और लंदन में प्रॉपर्टी खरीदने के लिए सऊदी अरब के सुल्तान से करोड़ों डॉलर लिए थे.

पाकिस्तान सेना
पाकिस्तान सेना

अभी ताजा वाकया रिटायर्ड जनरल असीम सलीम बाजवा से जुड़ा हुआ है. जनरल बाजवा अभी चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर के अध्यक्ष हैं और उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं. आलम तो ये है कि मजाक में पाकिस्तानी सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को कोर कमांडर नहीं बल्कि करोड़ कमांडर कह के संबोधित किया जाता है.

सिकुड़ रहा है पाकिस्तान के प्रभाव का दायरा

अब विपक्षी नेता मांग कर रहे हैं कि देश की इकोनॉमी और विदेश नीति चलाने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ जनतांत्रिक तरीके से चुने गए नेताओं की होनी चाहिए, सेना के जनरलों की नहीं. सच भी है पाकिस्तान के जनरलों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लीडरशिप में पाकिस्तान का बेडा गर्क ही हुआ है. चाहे अर्थव्यवस्था हो या विदेश नीति या आम आदमी और पत्रकारों की सुरक्षा सभी जगह चीजे बेहतर नहीं, खराब ही हुई हैं.

अभी प्रधानमंत्री चाहे इमरान खान हों, लेकिन सिक्का सेना के जनरल कमर जावेद बाजवा का ही चलता है. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था खस्ता हाल है, जरूरी वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं, पाकिस्तानी रुपया लगातार गिरता रहा है और देश अब कर्ज के लिए भी पूरी तरह अपने आका चीन पर आश्रित हो गया है.

कानून और व्यवस्था का यह हाल है कि मजहब से प्रेरित मर्डर आए दिन होते रहते हैं और आजाद सोच रखने वाले पत्रकार यूं ही गायब हो जाते हैं या उन पर जानलेवा हमला हो जाता है. आम आदमी की सेवा, सुरक्षा की तो बात ही छोड़ दीजिए. वर्तमान सरकार के दौरान पकिस्तान की विदेश नीति भी पटरी से उतर गई लगती है, क्योंकि उसके पुराने मित्र देशों से उसका दोस्ताना पहले जैसा नहीं रहा है.

सऊदी अरब पाकिस्तान से खफा है और UAE भी विमुख हो चला है. इस्लामी देशों के बीच अकेली ऐटमी ताकत होने के चलते पाकिस्तान का, उनका नेता बनने का ख्वाब भी टूटता सा लगता है. गौरतलब है कि पाकिस्तान के नए दोस्त तुर्की और ईरान जैसे देश बन रहे हैं, जिन्हे बाकी दुनिया कट्टरपंथी इस्लाम का पक्षधर मानती है, यानि विदेशों में भी पकिस्तान के प्रभाव का दायरा सिकुड़ रहा है.

पाकिस्तान का इकलौता माई बाप बन गया है चीन

आतंकवादियों को पनाह और सुविधाएं देने के लिए अब अंतराष्ट्रीय संगठन भी पाकिस्तान की लगाम कसने की तरफ बढ़ रहे हैं. FATF यानि फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स अभी आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान की भूमिका पर विचार कर रहा है. ऐसी स्थिति में चीन अकेला देश है जो पाकिस्तान का माई बाप बन गया है. लेकिन चीन ने भी पाकिस्तान से दोस्ती इसलिए की है कि वह दक्षिण एशिया में चीन की नीतियों को हासिल करने का औजार है, चाहे वह भारत की मुखालफत हो या CPEC के रास्ते चीन की सामरिक और आर्थिक नीतियों को पाने का जरिया.

ऐसे में वर्तमान स्थिति में पाकिस्तान क्या अपने शासकों द्वारा बनाए गए दलदल से निकल पाएगा? लगता नहीं है ऐसा होगा. पाकिस्तान के विपक्षी राजनीतिक नेता भाषण तो धुआंधार देते हैं लेकिन, अपना स्वार्थ साधने के लिए सेना से दोस्ती करने में भी नहीं चूकते. खुद नवाज शरीफ या इमरान खान या भुट्टो परिवार इसका बड़ा उदहारण हैं. तो पाकिस्तान में हालात खराब हैं और सत्ता पर सेना की पकड़ हलकी होती नहीं दिखती.

इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि अपनी सभी कारगुज़ारियों के बावजूद सेना अभी भी पाकिस्तान का अकेला ऐसा संस्थान यानि इंस्टीट्यूश है जिसकी धमक देश के सभी कोनों और सभी लोगों में है. भले ही देश की अर्थव्यवस्था और साख लगातार गिर रही हों. ऐसे में विपक्ष का विरोध कितना मजबूत बन पाएगा और सत्ता में सेना की मर्जी के बगैर कोई बदलाव ला पाएगा, इसमें शक है.

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