बाजवा को लेकर चीन क्‍यों गए इमरान खान, भारत के खिलाफ अब कौन सी चाल चलेगा ड्रैगन?

यह बात सही है कि चीन कूटनीति का इस्‍तेमाल कर रहा है और भारत के बारे में बहुत ही सधे शब्‍दों का इस्‍तेमाल करता है, लेकिन सच यह भी है कि वह भारत और पाकिस्‍तान की दुश्‍मनी की आग में घी डालने में कोई कसर भी नहीं छोड़ रहा है.

नई दिल्‍ली: पाकिस्‍तान के पीएम इमरान खान दो दिवसीय यात्रा पर चीन में हैं. यूं तो पाकिस्‍तान के पीएम का चीन जाना नई बात नहीं है, लेकिन इमरान खान का यह चीन दौरा भारत के लिहाज से बेहद अहम है. इसके पीछे दो मुख्‍य कारण हैं. पहला- जम्‍मू-कश्‍मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद इमरान खान का यह पहला चीन दौरा है और दूसरा कारण है कि इमरान खान के इस दौरे के ठीक बाद चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग को भारत आना है.

इमरान खान का यह चीन दौरा इसलिए भी बड़ा अहम है, क्‍योंकि पाकिस्‍तान के सेनाप्रमुख कमर जावेद बाजवा भी बीजिंग इमरान खान के साथ गए हैं. आखिर पाकिस्‍तान के पीएम अपने सेनाप्रमुख के साथ क्‍या करने चीन गए हैं? बाजवा को साथ ले जाने के पीछे इमरान खान का मकसद क्‍या हो सकता है? ये बड़े अहम सवाल हैं.

पूरी दुनिया इस बात को जानती है कि चीन इस समय इकलौता मुल्‍क है, जो पाकिस्‍तान को न केवल आर्थिक बल्कि सामरिक मदद भी देता है. एशिया में सुपर पावर के तौर पर उभर रहे भारत को खुद के लिए सबसे बड़ा खतरा मानने वाला चीन हर हाल में पाकिस्‍तान के साथ खड़ा है. इसके पीछे चीन का अपना लालच है. पाकिस्‍तान की मदद से वह न केवल पीओके में घुसपैठ कर रहा है, बल्कि भारत के लिए लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश और डोकलाम तक चुनौती खड़ी कर रहा है.

दरअसल, चीन न केवल एशिया बल्कि अमेरिका को पीछे छोड़कर पूरी दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनने के मंसूबे पाले हुए है, ऐसे में पाकिस्‍तान की भूमिका बड़ी अहम हो जाती है. 62 की जंग में लद्दाख के हिस्‍से अक्‍साई चिन पर उसने कब्‍जा कर लिया, भारत के अधिकार वाले पीओके में ड्रैगन करोड़ों डॉलर के प्रोजेक्‍ट चला रहा है. मतलब भारत से सीधे टकराने की जगह वह पाकिस्‍तान का इस्‍तेमाल कर भारत को चुनौती पेश कर रहा है. दूसरी तरफ भारत से नफरत की आग में जल रहे पाकिस्‍तान के भी अपने कई हित हैं. उसे चीन आर्थिक, सामरिक मदद के साथ बड़े पैमाने पर हथियार भी दे रहा है.

यह बात सही है कि चीन कूटनीति का इस्‍तेमाल कर रहा है और भारत के बारे में बहुत ही सधे शब्‍दों का इस्‍तेमाल करता है, लेकिन सच यह भी है कि वह भारत और पाकिस्‍तान की दुश्‍मनी की आग में घी डालने में कोई कसर भी नहीं छोड़ रहा है.

अब वापस मुद्दे पर लौटते हैं. इमरान खान और कमर जावेद बाजवा इस समय चीन में हैं, जहां पर ड्रैगन के साथ कई मुद्दों पर चीन-पाकिस्‍तान में बात हो रही है. अब सबसे पहले सवाल उठता है कि बाजवा क्‍यों इमरान खान के साथ चीन गए हैं? इसका जवाब है कि पाकिस्‍तान की आर्मी हमेशा से अपने देश में लोकतांत्रिक सरकार से ज्‍यादा ताकतवर रही है. चीन जानता है कि पाकिस्‍तान सरकार के साथ जो बात हो रही है, वह औपचारिकता है, लेकिन असल में द्विपक्षीय समझौतों को लागू कराने की ताकत तो पाकिस्‍तान की सेना के पास ही है. यही कारण है कि अमेरिका भी लंबे समय से पाकिस्‍तान की चुनी हुई सरकार के साथ पाकिस्‍तान के सेनाप्रमुख को भी बातचीत के लिए बुलाता रहा है.

बाजवा के चीन जाने के पीछे दूसरा अहम कारण है- मौजूदा चुनौतियां. पाकिस्‍तान का इस समय सबसे बड़ा रहनुमा चीन ही है. भारत के सामने पाकिस्‍तान को खड़ा करके महाशक्ति बनने की राह पर बढ़ रहा चीन चाहता है कि भारत से वह सीधा न लड़े, बल्कि पाकिस्‍तान को आगे करे. लंबे समय से वह इस रणनीति को अपनाता रहा है. इस दौरे पर कमर जावेद बाजवा ने चीन की सैन्‍य और पॉलिटिकल लीडरशिप से कई दौर की बैठकें की हैं. इन बैठकों में चीन-पाकिस्‍तान इकनॉमिक कॉरिडोर के ठप पड़े काम को रफ्तार देने से लेकर विभिन्‍न मुद्दों पर बात हुई है.

सबसे अहम खबर यह है कि बाजवा ने चीन की लीडरशिप के साथ सबसे ज्‍यादा लंबी वार्ता कश्‍मीर और भारत के साथ संबंधों पर की है. दरअसल, भारत ने जम्‍मू-कश्‍मीर से 370 हटाकर जिस प्रकार से पकड़ मजबूत की है, डोकलाम पर जिस तरह पीएम नरेंद्र मोदी ने कड़ा रुख दिखाया, उससे पाकिस्‍तान ही नहीं बल्कि चीन भी परेशान है.
ऐसे में चीन और पाकिस्‍तान ने भारत को लेकर लंबी चर्चा की है.

ड्रैगन और पाकिस्‍तान की इस बातचीत से इतर मंगलवार को चीन के विदेश मंत्रालय ने कश्‍मीर पर बड़ा सधा हुआ बयान देते हुए कहा- कश्‍मीर पर दोनों देशों को बात करनी चाहिए. इसका संकेत यह हुआ कि चीन नहीं चाहता कि कश्‍मीर मुद्दे पर और टकराव बढ़े. इसका मतलब यह नहीं है कि चीन अब सुधर गया है, बल्कि इसका मतलब यह है कि चीन अभी पाकिस्‍तान के साथ साझेदारी को लेकर सोचने को मजबूर हो गया है. दशकों से वह पाकिस्‍तान को आंख मूंदकर भारत के खिलाफ समर्थन दे रहा है, लेकिन अमेरिका और भारत की बढ़ती करीबी ने उसे सचेत कर दिया है.

चीन को अब एहसास हो रहा है कि अगर वह पाकिस्‍तान के कंधे पर बंदूक रखकर वह आगे भी गोलियां चलाता रहेगा तो भारत भी चुप नहीं बैठेगा. यही कारण है कि चीन पिछले कई महीनों से अरुणाचल प्रदेश, डोकलाम और अक्‍साई चिन जैसे मामलों पर मौन साधे हुए है. अमेरिका में हुए हाउडी मोदी कार्यक्रम से डोनाल्‍ड ट्रंप ने सिर्फ पाकिस्‍तान को नहीं बल्कि चीन को भी बड़ा संदेश दिया.

चीन समझ रहा है कि भारत अब उसकी आक्रामक विदेश नीति को और झेलने के मूड में नहीं है. ऐसे में एक आकलन निकलकर यह भी आ रहा है कि ड्रैगन अब पाकिस्‍तान के साथ रिश्‍तों को लेकर नए सिरे से विचार कर रहा है? यह आकलन कितना सही है, इसकी तस्‍दीक तब होगी जब बाजवा और इमरान खान पाकिस्‍तान लौटेंगे? अगर चीन से लौटने के बाद इन दोनों की एप्रोच भारत को लेकर एग्रेसिव रहती है तो समझा जाना चाहिए कि रिश्‍ते पहले ही की तरह मजबूत हैं, लेकिन अगर एप्रोच डिफेंसिव हुई तो यह भारत के लिए अच्‍छा संकेत होगा. दरअसल, चीन नहीं चाहता है कि भारत और अमेरिका के संबंध मजबूत हों. ऐसा हुआ तो चीन एशिया मतलब घर में ही घिर जाएगा और वह अमेरिका को पछाड़कर वैश्विक महाशक्ति नहीं बन पाएगा.

यही कारण है कि चीन अब थोड़ा नरमी बरत रहा है, वह जानता है कि भारत के साथ एक और युद्ध की कीमत चुकाने का मतलब होगा 100 साल पीछे चले जाना. देखना रोचक होगा कि चीन से लौटकर बाजवा और इमरान खान की एप्रोच कैसी होती है और जब शी जिनपिंग भारत आते हैं तो रिश्‍तों में गर्माहट के लिए क्‍या लेकर आते हैं?