सऊदी से बिगड़ते रिश्तों को सुधारने चले जनरल, कश्मीर नीति पर इंडोनेशिया जैसे इस्लामी देशों से भी दूर हो रहा PAK

पाकिस्तान ने सऊदी अरब से ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी OIC के मंच पर कश्मीर (Kashmir) के मसले पर एक मीटिंग बुलाने को कहा था, लेकिन इसको लेकर सऊदी अरब का रवैया ठंडा ही रहा.

Qamar Javed Bajwa visit Saudi arabia, सऊदी से बिगड़ते रिश्तों को सुधारने चले जनरल, कश्मीर नीति पर इंडोनेशिया जैसे इस्लामी देशों से भी दूर हो रहा PAK

पाकिस्तान आर्मी (Pakistan Army) के चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा (Qamar Javed Bajwa) इसी हफ्ते आगे सऊदी अरब (Saudi Arabia) की यात्रा करेंगे. उनका मिशन दोनों देशों के संबंधों में आ रही तल्खी को कम करने की कोशिश है.

सऊदी अरब से क्यों खफा हुआ पाकिस्तान? 

दरअसल पाकिस्तान ने सऊदी अरब से ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी OIC के मंच पर कश्मीर (Kashmir) के मसले पर एक मीटिंग बुलाने को कहा था, लेकिन इसको लेकर सऊदी अरब का रवैया ठंडा ही रहा. बात इतनी बढ़ गई कि पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने धमकी के लहजे में कह दिया कि अगर सऊदी अरब इस मीटिंग के लिए राजी नहीं है, तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ऐसे इस्लामी देशों की बैठक अलग से बुलाएंगे, जो कश्मीर पर पाकिस्तान के साथ खड़े हैं.

अपने विदेश मंत्री का बयान पड़ा पाकिस्तान को भारी 

इस अल्टीमेटम पर पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि यह हल्के में दिया गया बयान नहीं था और ऐसा बोलकर कुरैशी ने कूटनीतिक यानी डिप्लोमेटिक शिष्टाचार की अवहेलना नहीं की थी. सऊदी अरब में कुरैशी के बयान को गंभीरता से लिया गया, लेकिन वैसे नहीं जैसा पाकिस्तान चाहता था. उल्टा रियाध ने कहा कि पाकिस्तान सऊदी अरब द्वार दिए गए 6.2 अरब डॉलर के कर्ज में से एक अरब डॉलर फौरन वापस करे. पैसे के मामले में खस्ताहाल पाकिस्तान को यह पैसा अपने दोस्त या आका चीन (China) से कर्ज लेकर चुकाना पड़ा.

यहां यह बताना जरूरी है कि इस 6.2 अरब डॉलर के कर्ज में 3 अरब डॉलर लोन के शक्ल में थे और 3.2 अरब डॉलर क्रेडिट यानी बाद में पैसे देने की शर्त पर तेल सप्लाई के लिए थे. खबर तो यह भी है कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान से कर्ज के एक अरब डॉलर और लौटाने के लिए कह दिया है.

कश्मीर पर सऊदी अरब का साथ चाहता है पाकिस्तान

पाकिस्तान की खीझ की एक वजह यह भी है कि पिछले साल उसने मलेशिया में आयोजित की गई मुसलमान देशों की मीटिंग से सऊदी अरब के दबाव में पैर पीछे खींच लिए थे और उसे उम्मीद थी कि सऊदी अरब इस समर्थन के बदले कश्मीर पर उसकी मदद करेगा.

 तुर्की क्यों मिला रहा पाकिस्तान के सुर में सुर?

समझने वाली बात यह है कि ओआईसी में सऊदी अरब के नेतृत्व को तुर्की से चुनौती मिल रही है. तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोगन ओआईसी में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं और कश्मीर मसले पर पाकिस्तान के स्टैंड का मुखर समर्थन कर रहे हैं. कश्मीर पर सऊदी अरब का स्टैंड भारत का समर्थन करता है. भारत ने हमेशा कहा है कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है, जिसमें किसी और देश की दखलअंदाजी उसे स्वीकार नहीं है.

कश्मीर नीति के चलते इस्लामी देशों से दूर हो रहा पाकिस्तान 

सऊदी अरब के अलावा UAE, ओमान, मालदीव, पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीका के कई इस्लामी देश और इंडोनेशिया और मध्य एशिया के देश कश्मीर पर भारत के रुख का समर्थन करते हैं. गौरतलब है कि अपनी कश्मीर नीति के चलते पाकिस्तान लगातार कई प्रभावशाली इस्लामी देशों से दूर होता जा रहा है. यहां तक कि UN में भी कश्मीर मामले पर पाकिस्तान को कई इस्लामी देशों से निराशा ही हाथ लगी है.

कश्मीर मुद्दे पर काम आई भारत की विदेश नीति

कश्मीर पर पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अलग-थलग करने का श्रेय भारतीय विदेश नीति और मुस्लिम राष्ट्र अध्यक्षों से प्रधानमंत्री मोदी के घनिष्ठ संबंधों को जाता है. प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय डिप्लोमेट्स ने दोस्त इस्लामी देशों से कश्मीर को लेकर लगातार विचारों का आदान-प्रदान बनाए रखा है और जरूरी वक्त पर उनकी सलाह पर भी काम किया है, जाहिर है इससे दोनों के बीच विश्वास में इजाफा हुआ है.

पाकिस्तान में सेना ही संभालेगी डिप्लोमेसी?

फिर भारत की अर्थव्यवस्था, बाजार, हमारा जनतंत्र और हमारी स्थिरता उन सभी देशों को आकर्षित करते हैं, जो जनतांत्रिक मूल्यों, शांति और विकास और अंतरराष्ट्रीय नियमों पर आधारित परस्पर संबंधों के पक्षधर हैं. अब पाकिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय संबंध और समर्थन चुनौती बनते जा रहे हैं. उसकी आर्थिक हालत डगमगाई हुई है और आतंकवाद फैलाने को लेकर वह बदनाम है. नाम के लिए तो पाकिस्तान इस्लामी रिपब्लिक है, लेकिन राजकाज वहां सेना ही चलाती है. यही वजह है कि जनरल बाजवा को रियाध जाना पड़ रहा है.

साउथ एशिया में पाकिस्तान को सिर्फ चीन का साथ

वर्तमान समय में सिर्फ चीन ही एक ऐसा देश है, जो पाकिस्तान की मदद कर रहा है, क्योंकि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में उसके और पाकिस्तान के हित मेल खाते हैं. विशेषकर भारत को लेकर. पश्चिम दिशा और कश्मीर में भारत से लगने वाली सीमाओं पर पाकिस्तान और चीन की मिलीभगत साफ दिखती है.

CPEC के पीछे चीन की असल रणनीति

चीन-पाकिस्तान इकोनामिक कॉरिडोर (CPEC) की मार्फत चीन न सिर्फ पाकिस्तान को कर्ज देकर विकास का सपना दिखा रहा है बल्कि सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पाकिस्तानी इलाकों में अपना प्रभुत्व स्थापित कर रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संबंध हर देश के अपने राष्ट्रीय हितों पर आधारित होते हैं और तभी तक मजबूत रहते हैं, जब तक दो देश एक दूसरे के काम आ सकें.

पाकिस्तान को गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि हर मर्ज की दवा चीन नहीं हो सकता, लेकिन अन्य देशों से अच्छी दोस्ती के लिए पाकिस्तान को अपनी सोच में बदलाव करना पड़ेगा. क्या वहां के शासक इसके लिए तैयार हैं?

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