कौन हैं WEF में पीएम मोदी की आलोचना करने वाले जॉर्ज सोरोस? विवाद और कामयाबी की पूरी कहानी

भारत में नागरिकता संशोधन कानून और कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने को लेकर सोरोस ने पीएम मोदी पर निशाना साधा और खबरों में आ गए. आइए, जानते हैं कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनने की ओर बढ़ता हुआ बताने वाले जॉर्ज सोरोस कौन हैं?

स्विटजरलैंड के दावोस शहर में आयोजित वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम की सालाना बैठक में हंगरी-अमेरिकी मूल के मशहूर अरबपति उद्योगपति जॉर्ज सोरोस ने अपने बयानों से दुनियाभर में सुर्खियां हासिल कर ली. सोरोस ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमेरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को सत्ता में पकड़ बनाए रखने के लिए तानाशाही की ओर बढ़ने वाला नेता कहा.

भारत में नागरिकता संशोधन कानून और कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने को लेकर सोरोस ने पीएम मोदी पर निशाना साधा और खबरों में आ गए. आइए, जानते हैं कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनने की ओर बढ़ता हुआ बताने वाले जॉर्ज सोरोस कौन हैं?

– 12 अगस्त, 1930 को हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में पैदा होनेवाले जॉर्ज सोरोस हंगरी-अमेरिकी करेंसी के सटोरिए, स्टॉक निवेशक, व्यापारी, राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

– साल 1992 में ब्रिटेन मुद्रा संकट ब्लैक वेन्ज्डे के दौरान उनके एक बिलियन डॉलर बनाने के बाद वे “उस आदमी जिसने बैंक ऑफ इंग्लैंड को कड़का बना दिया” के तौर पर पूरी दुनिया में मशहूर हो गए.

– सोरोस सोरोस फंड मैनेजमेंट और ओपन सोसाइटी यूनिवर्सिटी नेटवर्क (OSUN)के अध्यक्ष हैं. इसके अलावा काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन्स के निदेशक बोर्ड के पूर्व सदस्य हैं.

– ओएसयूएन एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जिसमें दुनिया की सभी यूनिवर्सिटी के लोग पढ़ा और शोध कर सकेंगे. सोरोस इसे अपने जीवन का सबसे अहम प्रोजेक्ट बताते हैं. उन्होंने इसके लिए एक अरब डॉलर ( करीब 7100 करोड़ रुपए ) का निवेश करने की बात कही है.

– अपने देश हंगरी (1984-89) में राजनीति को कम्यूनिज्म (साम्यवाद) से कैपिटलिज्म (पूंजीवाद) में बदलाव के दौरान सोरोस ने अहम भूमिका निभाई थी. न्यू स्टेट्समैन में नील क्लार्क के अनुसार, पूर्वी यूरोप में साम्यवाद के पतन में सोरोस की महत्वपूर्ण भूमिका थी.

– पूंजीवादी अरबपति कारोबारी सोरोस ने संयुक्त राज्य अमेरिका में साल 2004 में राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश को दोबारा जीतने से रोकने के लिए चल रहे अभियान को चंदे में एक बड़ी रकम दी थी. इसके बाद वह बुश विरोधी लोगों में मशहूर हो गए थे. उन्होंने सेंटर फॉर अमेरिकन प्रोग्रेस को स्थापित करने में भी मदद की.

– सोरोस तब तेरह साल के थे तब मार्च 1944 में नाजी जर्मनी ने हंगरी पर सैन्य नियंत्रण कर लिया था. सोरोस यहूदी परिषद के लिए काम किया करते थे.

– 1945-1946 में हंगेरिया में बेलगाम मुद्रास्फीति के दौरान सोरोस ने पहले करेंसी (मुद्रा) और गहनों का कारोबार शुरू किया.

– 1947 में सोरोस इंग्लैंड चले गए और 1952 में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से बैचलर डिग्री ली. दार्शनिक कार्ल पोपर का एक छात्र रहते हुए सोरोस ने उस दौरान रेलवे कुली और बैरा का काम भी किया.

– 1956 में सोरोस न्यूयॉर्क शहर चले गए, जहां उन्होंने 1956 से 1959 तक एफ.एम. मेयर में एक कारोबारी के रूप में और 1959 से 1963 तक वेर्थीम एंड कंपनी में एक एनालिस्ट के तौर पर काम किया.

– 1963 से 1973 तक सोरोस ने अर्होल्ड और एस. ब्लेक्रोएडर में उपाध्यक्ष के पद पर काम किया. 1973 में उन्होंने अपना पद छोड़ दिया और निजी निवेश कंपनी की स्थापना कर ली, जो बाद में क्वांटम फंड हो गया. सोरोस को 2007 में क्वांटम फंड से लगभग 32 फीसदी रिटर्न यानी कुल 2.9 बिलियन डॉलर मिला था. .

– 1997 में एशियाई वित्तीय संकट के दौरान, मलेशिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री महातिर बिन मोहम्मद ने आरोप लगाया कि एसियान (ASEAN) में सदस्य के रूप में म्यांमार का स्वागत करने के कारण सजा के तौर पर सोरोस अपनी दौलत का इस्तेमाल कर रहा है.

– 1988 में फ्रांसीसी बैंक सोसाइटे जेनरले पर नियंत्रण कर लेने के प्रयास में सोरोस ने पहले नीलामी में भाग लेने से मना कर दिया, लेकिन बाद में कंपनी के काफी शेयर खरीद लिए. 1989 में फ्रांसीसी अधिकारियों ने जांच शुरू की और 2002 में फ्रांसीसी अदालत ने फैसला सुनाया कि यह अनधिकृत व्यापार था. इसके लिए सोरोस 2.3 मिलियन डॉलर का जुर्माना लगाया गया. 14 जून 2006 को फ्रांस की सुप्रीम कोर्ट ने अनधिकृत व्यापार की सजा को बरकरार रखा.

– सोरोस पर अमेरिका में बेसबॉल खेल में पैसा लगाने और उसके टूर्नामेंटस में नियमों में ढील को लेकर रिपब्लिकन सांसदों ने कई आरोप लगे. अमेरिका के वॉशिंगटन नेशनल्स के बाद इटली की फुटबॉल टीम एएस रोमा से भी सोरोस का नाम जुड़ा और विवादित हुआ.

– दुनिया के विभिन्न देशों में कारोबार और समाजसेवा के नाम पर गए जॉर्ज सोरोस की वहां की राजनीति को प्रभावित करने के लिए अपनी दौलत का इस्तेमाल करने के आरोप में अरब के कुछ देशों ने उनकी संस्थाओं पर पाबंदी लगाई हुई है. मध्य पूर्व और पूर्वी यूरोप के कई देशों ने सोरोसकी संस्थाओं पर भारी जुर्माना भी लगाया हुआ है.

– अक्टूबर 2009 में दिए एक इंटरव्यू में सोरोस ने कहा था कि मारिजुआना (गांजा) कम व्यसनकारी है, लेकिन बच्चों और छात्रों के इस्तेमाल के लिए उपयुक्त नहीं है. पहले वह खुद इस लत के शिकार थे. उन्होंने दावा किया कि कुछ वर्षों से मारिजुआना का इस्तेमाल नहीं किया है.

– साल 1994 में सोरोस ने एक भाषण में बताया कि उन्होंने अपनी मां को आत्महत्या करने में मदद देने की पेशकश की थी, उनकी मां हेमलॉक सोसाइटी की सदस्य थीं.

– नास्तिक होने का दावा करने वाले जॉर्ज सोरोस खुद को दार्शनिक कहलाना पसंद करते हैं. उन्होंने एक दर्जन से ज्यादा किताबें लिखी हैं. इसके अलावा अपनी दो आत्मकथाओं के लिए लेखन में सहयोगी रहे हैं. सोरोस इजरायल और अमेरिका के साथ ही विभिन्न विषयों पर दुनियाभर के कुछ बड़े अखबारों जैसे द टाइम, टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट, न्यूयॉर्कर वगैरह में लिखते रहते हैं.

– दुनिया भर में आर्थिक गतिविधियों को लेकर वह भविष्यवाणियां भी करते हैं. इसके गलत हो जाने पर माफी भी मांग लेते हैं. सोरोस की अशुद्धिवाद (किसी चीज जिस पर उनकी आस्था है, वह गलत भी हो सकती है और इसलिए उस पर सवाल करने और सुधार करने की जरूरत है.) के सिद्धांत पर उनकी मौजूदा दार्शनिक प्रतिबद्धता की जड़ पॉपर के दर्शन में है.

– कुल अनुमानित मूल्य के साथ US$13.0 फोर्ब्स की सूची में सोरोस दुनिया के 29वें सबसे अमीर व्यक्ति हैं। 1979 से लेकर अब तक सोरोस ने विभिन्न कल्याण कार्यों में 7 बिलियन डॉलर दिया है.

WEF में सोरोस ने क्या कहा था

हालिया विवाद में जॉर्ज सोरोस ने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में देशों में बढ़ रही अलोकतांत्रिक प्रवृत्तियों के बारे में बोलते हुए कहा था कि भारत में लोकतांत्रिक रूप से चुने गए नरेंद्र मोदी हिन्दू राष्ट्रवादी राज्य बना रहे हैं. ट्रंप को लेकर उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ठग हैं. वे आत्ममुग्ध व्यक्ति हैं, जो चाहते हैं कि पूरी दुनिया उनके इर्द-गिर्द घूमती रहे. जब राष्ट्रपति बनने की उनकी कल्पना साकार हो गई, वे इतने ज़्यादा आत्ममुग्ध हो गए कि बीमार से हो गए.

जॉर्ज सोरोस ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भी आलोचना की. उन्होंने कहा कि जिनपिंग भी कम्युनिस्ट पार्टी की परंपरा तोड़ रहे हैं. उन्होंने खुद के आसपास सत्ता केंद्रित कर रखी है. वह आर्टफ़िशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल कर अपने लोगों को काबू में रखते हैं. वहीं पुतिन को लेकर उन्होंने कहा कि वह तानाशाह शासक हैं.

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