हेनरी किसिंजर ने 1971 में भारत को कहा था ‘रूसी कठपुतली’, ताउम्र PAK के तरफदार अब कैसे बदल गए?

1971 युद्ध के समय अमेरिका के NSA रहे हेनरी किसिंजर ने भारत को 'रूस की कठपुतली' बताया था. पाकिस्‍तान से अगाध प्रेम दिखाने वाले किसिंजर की सोच शायद अब बदल रही है.

अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री डॉ हेनरी किसिंजर 96 वर्ष की उम्र में भारत आए हैं. उन्‍होंने नई दिल्‍ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की. 1971 युद्ध के समय किसिंजर ने भारत को ‘रूस की कठपुतली’ बताया था. पाकिस्‍तान से अगाध प्रेम दिखाने वाले किसिंजर की सोच शायद 48 साल बाद ही सही, बदल रही है.

नोबेल शांति पुरस्‍कार पा चुके हेनरी किसिंजर ने अपनी किताब World Order में भारत को “इक्‍कीसवीं सदी के वर्ल्‍ड आधार का आधार” कहा है. किसिंजर लिखते हैं कि “अपनी जियोग्राफी, रिसोर्सेज और बेहतरीन लीडरशिप की परंपरा के आधार पर भारत ऐसा एलिमेंट है जिसे नजरअंदाज नहीं कर सकते.

1971 में जब ईस्‍ट पाकिस्‍तान ने बांग्‍लादेश की लड़ाई शुरू की तो भारत ने उसका समर्थन किया. उस वक्‍त किसिंजर ने भारत को “सोवियत के हाथों की कठपुतली” बताया था. उन्‍होंने तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति रिचर्ड निक्‍सन से फोन पर कहा था, “हम ऐसे हालात में हैं जहां एक सोवियत कठपुतली सोवियत हथियारों के साथ एक ऐसे देश पर कब्‍जा कर रही है जो अमेरिका का साथी है.” 1971 की जंग के वक्‍त किसिंजर अमेरिका के राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे.

किसिंजर और निक्‍सन, दोनों ही पाकिस्‍तान को खूब पसंद करते थे. एक बार निक्‍सन ने नेशनल सिक्‍योरिटी काउंसिल से कहा था, “पाकिस्‍तान वो देश है जिसके लिए मैं सबकुछ करना चाहूंगा.”

किसिंजर की अगुवाई में अमेरिका ने बांग्‍लादेशी नागरिकों पर पाकिस्‍तानी सेना के अत्‍याचार को नजरअंदाज किया. यहां तक कि संसद को ताक पर रखकर पाक को हथियार सप्‍लाई किए गए. बांग्‍लादेश संकट के दौरान किसिंजर कई बार भारत और पाकिस्‍तान आए. हालांकि उनका झुकाव पाकिस्‍तान की तरफ साफ था. हालांकि अमेरिका के सपोर्ट के बावजूद, पाकिस्‍तान को युद्ध में करारी शिकस्‍त मिली. उसके 90 हजार सैनिकों को सरेंडर करना पड़ा.

अब हेनरी किसिंजर को समझ आ रही पाकिस्‍तान की हकीकत

भारत ने कोल्‍ड वॉर के दौरान अमेरिका के साथ खड़े होने से मना कर दिया था. पाकिस्‍तान शुरू से ही अमेरिका के कदमों में था, शुरुआती तौर में उसकी कोशिश हथियार हासिल करने की थी. पाकिस्‍तान को अमेरिका ने जिस तरह हथियार सप्‍लाई किए, उससे भारत का सोवियत यूनियन की तरफ झुकाव लाजमी था.

अमेरिका और किसिंजर को शायद यह बात अब समझ में आ रही कि पाकिस्‍तान कैसे उसी से पैसे लेकर उसी को चूना लगा रहा है. अमेरिका को तब ही समझ लेना था तब उसने कोरिया और वियतनाम में लड़ने को पाकिस्‍तान से सैनिक मांगे थे. पाकिस्‍तान ने यह कहकर मना कर दिया था कि भारत के साथ उसकी लड़ाई खत्‍म हो जाए, तभी वो अमेरिका की मदद कर पाएगा.

अब भारत आए हेनरी किसिंजर कहते हैं कि “कोल्‍ड वॉर के दौर में भारत और अमेरिका की धारणाएं अलग-अलग थीं. सोव‍ियत संघ (अब रूस) ने बर्लिन संकट के दौरान, 1961 में अमेरिका की सहयोगी सेनाओं को बर्लिन से बाहर ले जाने का अल्‍टीमेटम दिया था. तब जवाहरलाल नेहरू (तत्‍कालीन भारतीय प्रधानमंत्री) ने अमेरिका का साथ नहीं दिया. इससे अमेरिकी सरकार में कई लोग निराश हुए.”

किसिंजर ने कहा कि “अमेरिका और भारत ने बांग्‍लादेश संकट के डिफरेंसेज को खत्‍म कर यह भरोसा कायम किया कि बेसिक डेवलपमेंट करेंगे. अब हम ऐसे हालात में हैं जहां यूएस और भारत का कई इश्‍यूज पर एक जैसा स्‍टैंड है.”

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