श्रीलंका में सीरियल ब्लास्ट के बाद खौफ में जीने को क्यों मजबूर अहमदिया मुसलमान?

श्रीलंका के सीरियल बम धमाकों के बाद अब मुसलमानों की मुसीबत शुरू हो गई है. हमलावर की पहचान मुस्लिम निकलने के बाद से ही स्थानीय लोगों के निशाने पर मुस्लिम समुदाय आ गया है. इसमें भी पहले से परेशान अहमदिया मुसलमानों की समस्या में इज़ाफा हो गया है. जानिए कौन हैं अहमदिया मुसलमान.

ईस्टर के दिन सीरियल ब्लास्ट से दहला श्रीलंका अब संकट के नए मुहाने पर खड़ा है. अचानक ही श्रीलंका में रहनेवाले मुसलमान खुद को ज़्यादा असुरक्षित महसूस करने लगे हैं. मुस्लिमों की खासी तादाद राजधानी कोलंबो से दो सौ किलोमीटर दूर पश्चिमी तटीय शहर नेगोंबा की मस्जिदों में पलायन कर गई. इसकी वजह सीरियल ब्लास्ट को अंजाम देनेवाले हमलावरों की धार्मिक पहचान है, जो मुसलमान बताई गई. 2014 में इस इलाके ने मुस्लिम विरोधी दंगा देखा था और अब पुलिस बस इसी कोशिश में है कि उन दुखद दिनों की पुनरावृत्ति ना हो. इनमें भी सबसे ज़्यादा परेशान वो अहमदिया हैं जो खौफ के साये में पाकिस्तान से निकले लेकिन अब श्रीलंका भी उन्हें महफूज़ नहीं लग रहा.

अहमदिया शब्द सुनते ही हमारे ज़हन में कई ऐसी ख़बरें तैरती हैं जो पिछले सालों में हमने सुनी या पढ़ी. अहमदिया मुसलमानों से जुड़ी ये अधिकांश खबरें बुरी ही थीं. आइए आज बात अहमदियों की ही करते हैं. आखिर दबे, छिपे, कुचले वर्ग के तौर पर पहचाने जाने वाला ये समुदाय कहां से आया, इसकी त्रासदी क्या है, आज ये जिस हालात में हैं वहां कैसे पहुंच गए.

दुनिया का ध्यान फिर अहमदियों ने खींचा
पाकिस्तान के 71 साल के राजनीतिक इतिहास में महज़ दूसरी बार हुआ जब एक चुनी हुई सरकार ने चुनाव जीतकर आए किसी दल (इमरान की PTI) को देश की बागडोर सौंपी. इस ऐतिहासिक माहौल के बीच एक बड़ा तबका ऐसा भी था जिसने तीन दशकों से चले आ रहे अपने चुनाव बहिष्कार को बरकरार रखा. 40 लाख की आबादी के इस समुदाय को लोग ‘अहमदिया’ नाम से जानते हैं.

इमरान खान ने भी कट्टरपंथियों के सामने सरेंडर करते हुए आर्थिक सलाहकार परिषद से आतिफ आर मियां को हटा दिया

सरकार कोई हो, अहमदियों के लिए सब एक से
नई नवेली इमरान सरकार ने पाकिस्तान के सभी तबकों को समानता का सपना दिखाया. इस सपने में पहली दरार तब दिखी जब कट्टरपंथी संगठन तहरीके लब्बैक के दबाव में इमरान की अध्यक्षता वाली आर्थिक सलाहकार परिषद से आतिफ आर मियां को हटा दिया गया. मियां प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री हैं. अहमदी होने की वजह से उनका विरोध होने पर इमरान सरकार ने शुरू में तो सख्त तेवर दिखाए लेकिन तीन दिन के भीतर ही उसने घुटने टेक दिए.

अहमदियों के हिस्से में सिर्फ ज़िल्लत
साल 2017 में नवाज़ शरीफ की पार्टी पाकिस्तान पर शासन कर रही थी. तब अचानक हंगामा खड़ा हो गया जब शरीफ के दामाद मोहम्मद सफदर ने अहमदियों की सेना में भर्ती को बैन करने की हिमायत की. सफदर ना सिर्फ सेना के कैप्टन रह चुके थे बल्कि ये मांग करने के वक्त संसद सदस्य भी थे. उन्होंने सभी अहम विभागों के उच्च पदों पर बैठे अहमदियों को पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए खतरा बताया और अहमदिया विरोधी प्रस्ताव पेश कर दिया.

शरीफ अहमदियों मे आत्मविश्वास जगा रहे थे लेकिन खुद उनके दामाद सफदर अहमदियों के कट्टर विरोधी हैं

नोबेल लेने के बावजूद अपमान पर अपमान
साल 1996 में पाकिस्तान के पहले और मुस्लिमों में पहले नोबेल इनाम विजेता वैज्ञानिक अब्दुस सलाम का निधन ऑक्सफोर्ड में हो गया. शव पाकिस्तान लाकर दफनाया गया. उनकी कब्र पर लगाए गए पत्थर पर लिखा था- नोबेल पुरस्कार जीतनेवाला पहला मुसलमान. अब्दुस सलाम अहमदिया थे, लिहाज़ा उन्हें मुसलमान लिखने पर कट्टरपंथियों ने विरोध शुरू कर दिया, नतीजतन स्थानीय प्रशासन झुक गया और कब्र पर लिखे पत्थर में वो मुसलमान नहीं रहे. उनका अपमान यहीं नहीं रुका .

अब्दुस सलाम का दुनिया सम्मान करती है लेकिन पाकिस्तान में उनकी कब्र पर पहले मुस्लिम शब्द लिखा गया फिर हटा लिया गया,

नवाज़ शरीफ सरकार ने कायदे आज़म यूनिवर्सिटी के फिज़िक्स विभाग का नाम अब्दुस सलाम के नाम पर रखा था. आम पाकिस्तानियों ने फैसले को सराहा लेकिन सत्ता जाने के महीने भर पहले खुद नवाज़ शरीफ के दामाद के लाए गए एक प्रस्ताव के पास होते ही विभाग से उनका नाम तुरंत प्रभाव से हटा दिया गया. विड़ंबना है कि 1974 में अब्दुस सलाम ने पाकिस्तान को इसीलिए छोड़ा था क्योंकि तत्कालीन सरकार ने उनके समुदाय को मुसलमान मानना ही छोड़ दिया था. साल 2017 में अब्दुस सलाम के भाई मलिक सलीम लतीफ की गोली मारकर इसलिए हत्या कर डाली गई क्ओंकि वो अहमदियों पर जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठा रहे थे.

इन कुछ उदाहरणों से आपको स्पष्ट हुआ होगा कि पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय को लेकर कट्टरपंथियों और सरकारों का रवैया जुदा नहीं है. अब आपको बताते हैं कि अहमदिया समुदाय का उदय कैसे हुआ क्योंकि उनके उदय में ही उनसे भेदभाव का बीज छिपा है.

कैसे शुरू हुआ अहमदिया समुदाय
अहमदिया संप्रदाय की शुरूआत बहुत पुरानी नहीं है. ब्रिटिश जब भारत में कब्ज़ा पूरी तरह कायम कर चुके थे तब पंजाब महाराजा रणजीत सिंह का सिख शासन देख रहा था. 13 फरवरी 1835 के उसी दौर में कादियान की ज़मीन पर मिर्ज़ा गुलाम अहमद का जन्म हुआ. उनके पूर्वज 1530 में अफगानिस्तान के समरकंद से भारत के पंजाब में आकर बस गए. ये जगह आज गुरदासपुर ज़िले में है.

मिर्ज़ा गुलाम अहमद ही अहमदिया समुदाय के प्रवर्तक थे. उन्होंने खुद को मोहम्मद साहब के बाद नबी कहा.

बाबर ने तब इस परिवार को कई सौ गांव की जागीर प्रदान की थी. 23 मार्च 1889 को लुधियाना में हकीम अहमद जान के घर एक पंचायत बुलाई गई और मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने अहमदी जमात की शुरूआत की. उन्होंने घोषणा कर दी- मोहम्मद आखिरी पैगंबर नहीं हैं बल्कि मैं खुद नबी हूं.

बढ़ता गया मिर्ज़ा गुलाम अहमद का कारवां
पहले ही दिन 40 लोगों ने मिर्ज़ा गुलाम अहमद को पैगंबर मंज़ूर कर लिया. इसके बाद ये तादाद बढ़ती चली गई. मिर्ज़ा ने पूरे पंजाब में घूमकर अपने विचारों का प्रचार किया. उन्होंने ईसा मसीह की सूली पर हुई मौत से इनकार कर दिया. वो मानते थे कि ईसा प्राकृतिक मौत मरे थे. इसके अलावा उन्होंने मुस्लिम, ईसाई और हिंदू धर्म के जानकारों से जमकर सार्वजनिक बहसें कीं. आर्य समाजियों से भी उनकी गर्मागर्म चर्चाएं होती थीं. ईसा के क्रूसीफिकेशन और खुद के नबी होने के दावों पर बहस करने के लिए उन्होंने उत्तर भारत के जमकर दौरे किए. वो दिल्ली के जामा मस्जिद तक पहुंचे मगर हंगामा मचने के बाद उन्हें वहां से निकलना पड़ा. मिर्ज़ा ने सैकड़ों किताबें लिखीं. समुदाय का एक योजनाबद्ध ढांचा तैयार किया. अपनी मौत 26 मई 1908 तक उन्होंने पंजाब से सिंध तक करीब 4 लाख लोगों को अपने समुदाय का अनुयायी बना लिया. मिर्ज़ा ने तलवार के जिहाद से इनकार करते हुए कलम और ज़ुबान के जिहाद को तरज़ीह दी. मिर्ज़ा की मौत के बाद हाजी नुरुद्दीन खलीफा बने. उनके बाद मिर्ज़ा के बेटे बशीरुद्दीन महमूद अहमद ने ज़िम्मा संभाला. इस तरह हनफी इस्लामिक कानून माननेवाला समुदाय अहमदिया या कादियानी (मिर्ज़ा का जन्म कादियान में हुआ था) कहलाने लगा.

ऐतिहासिक सफेद मीनार जो खुद मिर्ज़ा ने बनवाई. ये क़ादियान गांव की अक्सा मस्जिद में है.

मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने जिस ढंग से इस्लाम का बचाव किया उसकी तारीफ मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और सर सैयद अहमद खान ने भी की. वहीं एक बड़ा तबका उनके विरोध में उतर आया. मिर्ज़ा के दावे की वजह से वो काफिर भी कहे गए. दरअसल मुसलमानों के अधिकांश तबके मानते थे कि मोहम्मद ही आखिरी पैगंबर हुए हैं इसीलिए कोई भी मिर्ज़ा को मान्यता देने को राज़ी नहीं था.

मिर्ज़ा गुलाम अहमद के खिलाफ आवाज़ें
मिर्ज़ा गुलाम अहमद के दावों पर उनके जीवनकाल में ही जमकर सवाल उठाए गए. मुसलमान मानते थे कि हजरत मोहम्मद ही आखिरी पैगंबर हैं. साल 1893 में मौलाना अहमद रज़ा खां ने उनके दावों को खारिज कर दिया. उन्होंने मक्का मदीना तक जाकर इस्लामिक विद्वानों के विचार मिर्ज़ा के बारे में जाने और उन्हें काफिर ठहराया गया.

समय गुज़रता गया और मुसलमानों के दूसरे फिरकों ने अहमदियों को खुद से दूर कर दिया. 1947 तक आते-आते हालात ये हो गए कि अहमदियों को गैर मुसलमान कहा जाने लगा.

पाकिस्तान में बढ़ता गया अहमदियों पर जुल्म
पहली बार पाकिस्तान में साल 1953 में अहमदियों के खिलाफ हिंसा भड़की. इसके बाद भी हिंसा का सिलसिला जारी रहा और आखिरकार 1974 में पाकिस्तानी संविधान में संशोधन करके अहमदी जमात को गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया गया. पाकिस्तानी सरकार के इस रवैये से हताश अहमदियों ने पाकिस्तान तो छोड़ा ही, साथ ही उनके खिलाफ दंगे भी भड़क उठे. इसके बाद 1982 में इस्लामिक कट्टरपंथियों का साथ पाने के लालच में पाकिस्तानी तानाशाह जिया उल हक ने अहमदियों पर कई और पाबंदियां लगाईं. कब्रिस्तान तक अलग कर दिए गए. खबर तो यहां तक है कि जिन अहमदियों को पहले आम कब्रिस्तान में दफनाया गया था उनके शव कब्र तक से निकाल लिए गए. पैगंबर के अपमान पर मौत की सज़ा तय हो गई. ‘असलाम वलेकुम’  अभिवादन करने तक पर लोग जेल में डाले गए.

इस वक्त पाकिस्तान में करीब 40 लाख और भारत में 10 लाख अहमदिया बसते हैं.  नाइजीरिया में 25 लाख, इंडोनेशिया में करीब 4 लाख, ब्रिटेन में 30 हजार अहमदिया हैं. एक अनुमान के मुताबिक करीब दो सौ देशों में अहमदिया फैले हैं लेकिन कमोबेश हर जगह उनके हालात एक से ही हैं.

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