57 मुस्लिम देशों का हुजूम कश्मीर पर इमरान से क्यों छिटका, जानिए इनसाइड स्टोरी

कश्मीर के जिस मसले को पाकिस्तान मुसलमानों का मुद्दा बनाना चाहता था उस पर कोई मुस्लिम बहुल देश अपना मुंह खोलने से भी बच रहा है, जानिए वजह

कश्मीर में भारत ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए अनुच्छेद 370 हटाया तो पाकिस्तान के तेवर तीखे हो गए. इसकी वजह है कि पाकिस्तान कश्मीर में हस्तक्षेप को अपना राजनीतिक, धार्मिक और नैतिक कर्तव्य समझता है. कश्मीर का एक हिस्सा आज भी उसके कब्ज़े में हैं और दूसरा उस चीन के पास है जिसका दामन वो भारत के खिलाफ अपनी लड़ाई में जब-तब ज़ोर से पकड़ लेता है. अचरज है कि चीन ने कश्मीर में संवैधानिक बदलाव पर वैसी प्रतिक्रिया नहीं दर्ज कराई जैसी पाकिस्तान चाहता था, लेकिन इससे बड़ी हैरानी है कि पाकिस्तान खुद को जिस मुस्लिम समुदाय का हिस्सा मानता है उसने भी कश्मीर मुद्दे पर या तो चुप्पी साध ली, या हल्की प्रतिक्रिया दी या फिर भारत के पक्ष में ही बातें कीं.

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पाकिस्तान कश्मीर के मामले को मुस्लिम देशों के संगठन ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन यानि ओआईसी में ले गया. उसे उम्मीद थी कि 57 मुस्लिम बहुल देशों का ये ताकतवर हुजूम भारत के खिलाफ पाकिस्तान के स्टैंड का समर्थन करेगा. ओआईसी ने इमरान खान की हसरत आधी अधूरी ही पूरी की. संगठन ने जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन की निंदा की लेकिन अंत में मसला सुलझाने के लिए बातचीत की सलाह दी.

इसके अलावा अपनी संसद और घरेलू मीडिया के सामने भारत से हिंसक टकराव की बातें करनेवाली पाकिस्तानी सरकार के विदेशमंत्री ने बीजिंग की ओर दौड़ लगाई. ये कोई अचरज की बात नहीं थी. दुनिया जानती है कि चीन ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अधिकांशत:  पाकिस्तान का साथ दिया है लेकिन विदेशमंत्री शाह महमूद कुरैशी को चीनी सरकार का वैसा साथ नहीं मिला जैसी उन्हें उम्मीद रही होगी. चीन ने कह दिया कि कश्मीर समस्या का समाधान दोनों देश मिलकर निकालें और भारत को चाहिए कि यथास्थिति बरकरार रखे. हां, चूंकि चीन लद्दाख पर अपना दावा करता रहा है इसलिए उसने लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने पर आपत्ति की है. फिर भी बीजिंग का रवैया पाकिस्तान जितना खराब नहीं रहा. पाकिस्तान ने तो भारत के साथ अपने सारे संबंध तोड़ दिए, जबकि कुछ महीने पहले भारतीय वायुसेना ने उसकी सीमा में घुसकर बालाकोट के आतंकी ठिकानों पर बम तक बरसाए थे और वो गर्मागर्मी की बातें कह कर ठंडा पड़ गया था.

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पाकिस्तान ने मध्यपूर्व से भी काफी अपेक्षाएं रखी थीं. जैसा कि ऊपर लिखा गया है कि पाकिस्तान कश्मीर को धार्मिक नज़रों से भी देखता है इसलिए ये स्वाभाविक था कि वो इस नाजुक मौके पर मुद्दे का इस्लामीकरण कर दे. उसने यही कोशिश की. पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि- हम मुसलमान हैं और हमारी डिक्शनरी में डर नाम का कोई शब्द नहीं है.

मुसलमान शब्द का इस्तेमाल करके पाकिस्तान दुनिया के मुस्लिम देशों का साथ लेने की जो कूटनीति खेल रहा था उसे सबसा तगड़ा झटका संयुक्त अरब अमीरात से लगा. दिल्ली में यूएई के राजदूत ने कहा कि भारत सरकार का जम्मू कश्मीर में बदलाव का फैसला उसका आंतरिक मामला है और इससे प्रदेश की प्रगति में मदद मिलेगी. साथ ही यूएई के विदेश मंत्री ने भी कह दिया कि दोनों पक्षों को संयम और संवाद से काम लेना चाहिए. यही लाइन मध्यपूर्व के बाकी देशों ने भी पकड़ी. ईरान, सऊदी अरब और तुर्की में से किसी ने भी भारत सरकार के खिलाफ तल्खी भरी भाषा का प्रयोग करके पाकिस्तान को खुश होने का मौका नहीं दिया.

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निश्चित ही भारत के संबंध में टिप्पणी करने से पहले इन तमाम देशों ने खुद भारत में मुस्लिम आबादी के बारे में सोचा होगा. भारत भले ही हिंदूबहुल हो लेकिन पाकिस्तान के अस्तित्व में आने से पहले सैकड़ों सालों तक भारत ने हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रदर्शन किया है. इसके अलावा ये भी ज़ाहिर है कि अगर मामला हिंदू बनाम मुस्लिम ही होता तो भारत के मुस्लिम संगठन भी कुछ ना कुछ कहते-सुनते. भारत की विदेश नीति हमेशा इज़रायल के खिलाफ फिलिस्तीन के समर्थन की रही है जो दिखाता है कि भारत को किसी भी तरह मुस्लिम विरोधी देश नहीं ठहराया जा सकता, भले ही अरब देशों और इज़रायल के बदले संबंधों की रौशनी में भारत-इज़रायल भी पिछले दशकों में करीब आए हैं.

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ज़ाहिर है, मध्य पूर्व के मुस्लिम बहुल देशों ने भारत के साथ अपने कारोबारी रिश्तों का भी ख्याल रखा होगा. पाकिस्तान की खस्ता हालात अर्थव्यवस्था की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार नौगुना है. सऊदी अरब से लेकर चीन तक पाकिस्तान को उधार दे रहे हैं. उधर सऊदी अरब ने मोदी सरकार के साथ अपने संबंधों की घनिष्ठता किसी से छिपाई नहीं है. सऊदी अरब जिस ईरान के साथ उलझा रहता है वो तो हमेशा ही कश्मीर को लेकर भारत के पाले में खड़ा रहा है तो उस तरफ से कभी चिंता की ज़रूरत थी ही नहीं. ऊपर से ईरान और पाकिस्तान के बीच भी सीमा विवाद है और अफगानिस्तान में असर बढ़ाने की लड़ाई में भी दोनों देश काफी समय से उलझे हैं.

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कुल मिलाकर अब पाकिस्तान के पास संयुक्त राष्ट्र संघ में जाने का ही विकल्प बचा है जिसके बारे में वो पहले ही बता चुका है मगर सवाल ये है कि जब उसके सहयोगी ही कश्मीर पर चुप हैं तब वो यूएन में जाकर अपनी किरकिरी कराना चाहेगा या नहीं?