चीनपरस्त नहीं रहेगा श्रीलंका, अपनाएगा ‘India First’ पॉलिसी, पढ़ें- इस बार कितनी अलग है राजपक्षे सरकार

इस बार भी चीन (China) ने श्रीलंका के चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश की. इस बार पहले से अलग, उसने देश में कई पॉलिटिकल पार्टियों (Political Parties) से बात, मुलाकात कर बाज़ी अपनी तरफ पलटने का प्रयास किया. लेकिन भारत भी तैयार था.
Sri Lanka Foreign Secretary, चीनपरस्त नहीं रहेगा श्रीलंका, अपनाएगा ‘India First’ पॉलिसी, पढ़ें- इस बार कितनी अलग है राजपक्षे सरकार

श्रीलंका (Sri Lanka) में नई सरकार ने काम संभाल लिया है और देश के विदेश सचिव, जयनाथ कोलोमबाज (Jayanath Colombage) ने एक बातचीत में कहा है कि उनका देश क्षेत्रीय संबंधों को लेकर “इंडिया फर्स्ट” की नीति पर काम करेगा. यानी श्रीलंका भारत (India) की सुरक्षा के खिलाफ कोई काम नहीं करेगा.

भारत के साथ फिर संबंध अच्छे करेगा श्रीलंका

आज की तरह, साल 2009  से 2014  तक श्रीलंका में महिंदा राजपक्षे की ही सरकार थी. फ़र्क इतना है कि तब महिंदा राजपक्षे  (Mahindra Rajpaksha) देश के राष्ट्रपति थे. शुरुआत में तो भारत के साथ उनके संबंध मधुर थे, लेकिन सरकार का टर्म ख़त्म होते होते ही संबंध तल्ख़ हो गए थे. इस बार तो राजपक्षे परिवार के कई सदस्य सरकार का हिस्सा हैं और राष्ट्रपति गोटाबाया और प्रधानमंत्री महिंदा ने फैसला किया है कि पिछली बार वाली गलती इस बार नहीं दोहरायी जायेगी.

चीन का कर्जदार हो गया था देश

पिछली राजपक्षे सरकार में श्रीलंका पूरी तरह चीनपरस्त हो गया था. इसकी वजह उसे चीन द्वारा दिए गए बड़े-बड़े क़र्ज़ थे, जो ऊंची ब्याज़ दरों पर दिए गए थे. नतीजा यह हुआ कि श्रीलंका जल्द ही क़र्ज़ चुकाने में फेल हो गया और 2015 में आई मैत्रीपाला सरकार को मजबूरी में हम्बनटोटा पोर्ट, और उसके आस पास का इलाका 99 साल की लीज पर चीन को देना पड़ा.

भारत से रिश्ते अच्छी नहीं रखे, तो श्रीलंका के लिए होगा नुकसानदेह

भारत को श्रीलंका का यह कदम नागवार गुज़रा था. श्रीलंका के विदेश सचिव ने कहा है इस बार ऐसा नहीं होगा, और भारत की सामरिक संवेदनाओं का ख़्याल रखा जाएगा, क्योंकि ऐसा न करना स्वयं श्रीलंका के लिए भी नुकसानदेह होगा.

जयनाथ कोलोमबाज के अनुसार, हिन्द महासागर में होने वाले पावर गेम में श्रीलंका तटस्थ रहना चाहता है.  वह सभी देशों से इन्वेस्टमेंट का स्वागत करेगा, लेकिन अब ऐसा क़र्ज़ किसी से नहीं लेगा, जिसे लौटना मुश्किल हो. श्रीलंका अब सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अपने पोर्ट या एयरपोर्ट भी किसी दूसरे देश को नहीं देगा.

भारत के सहयोग से श्रीलंका लिट्टे से पार पा सका

इतिहास में झांक कर देखें, तो भारत के सहयोग से ही श्रीलंका अपने यहां गृह युद्ध में लिट्टे से पार पा सका. 2009 में देश के उत्तरी क्षेत्र में दोनों देशों ने मिल कर शांति बहाल की और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की शुरुआत की. भारत ने उत्तरी श्रीलंका  में रेल लाइन बिछाई. पचास हज़ार से ज़्यादा घर बनवाए. उत्तरी छोर पर स्थित प्वाइंट पेड्रो को विकसित किया. लेकिन जल्दी ही वक़्त ने करवट ली और श्रीलंका निवेश के लिए चीन पर आश्रित हो गया, क्योंकि पश्चिमी देश मानवाधिकारों के प्रश्न पर उससे खिन्न थे और भारत पैसा देने में चीन का मुकाबला नहीं कर सकता था.

अब हम साल 2020 में हैं और इस बार भी चीन ने श्रीलंका के चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश की. इस बार पहले से अलग, उसने देश में कई पॉलिटिकल पार्टियों से बात, मुलाकात कर बाज़ी अपनी तरफ पलटने का प्रयास किया. लेकिन भारत भी तैयार था. जैसे ही नतीजों के रुझान सामने आये, प्रधानमंत्री मोदी ने फ़ोन कर महिंदा राजपक्षे को बधाई दी और गौतम बुद्ध से जुड़ी भारत और श्रीलंका की साझा विरासत से प्रेरणा लेकर शांति और विकास के लिए साथ काम करने का न्योता दिया.

हिन्द महासागर में श्रीलंका महत्वपूर्ण  

अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से हिन्द महासागर में श्रीलंका महत्वपूर्ण है, और न चाहते हुए भी वह एक तरफ भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमरीका और दूसरी तरफ चीन के बीच चल रहे पावर गेम का गवाह रहेगा. चीन की कोशिश है कि वह अपनी “स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स” नीति से भारत की चौतरफा घेराबंदी कर ले. इसीलिए वह दक्षिण एशिया में पड़ोसियों को अपने प्रभाव में ला कर भारत पर दबाव बढ़ाना चाहता है. वह अपनी नौसेना की ताकत भी तेज़ी से बढ़ा रहा है.

भारत भी अपनी “नेकलेस ऑफ़ डायमंड्स” पॉलिसी से उसका जवाब देने को तैयार है. ओमान में दुक्म बंदरगाह, मेडागास्कर, मॉरिशस, सेशेल्स, चांगी-सिंगापुर और  सेपांग-इंडोनेशिया तक भारत ने अपनी नौसेना के लिए सामरिक सहयोग का इंतज़ाम कर लिया है. हालांकि, अपनी नौसेना के विकास में अभी भारत चीन से पीछे है.

ऑस्ट्रेलिया, जापान, वियतनाम और अमरीका भी हिन्द महासागर में सुरक्षित व्यापार और परिवहन चाहते हैं ताकि अंतरराष्ट्रीय नियमों और यूनाइटेड नेशंस के “लॉ ऑफ़ द सी” कानून के हिसाब से जनतांत्रिक देश सागर की धरोहर का इस्तेमाल करें. चीन को अमरीका को पीछे छोड़ कर दुनिया का अकेला सुपरपॉवर बनने की जल्दी है, जबकि भारत चाहता है कि दुनिया के देश आपसी सहयोग से तरक्की करें, फले-फूलें. यह तकरार विचारधारा और मानवता के सिद्धांतों के बीच है और लम्बी चलेगी.

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