G-7 हो जाएगा G-11? पढ़ें- ट्रंप के दिमाग में क्यों चढ़े ये चार देश, कितना बढ़ेगा भारत का दबदबा

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप (Donald Trump) ने कहा है कि वे भारत, रूस, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया को भी G-7 के शिखर सम्मेलन में शामिल होने का न्योता देंगे. उन्होंने कहा, "अगला सम्मेलन सितंबर में या उससे पहले हो सकता है या फिर संयुक्त राष्ट्र की महासभा (UNGA) के बाद.
Will the G-7 be the G-11, G-7 हो जाएगा G-11? पढ़ें- ट्रंप के दिमाग में क्यों चढ़े ये चार देश, कितना बढ़ेगा भारत का दबदबा

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने बीते दिन कहा कि कोरोनावायरस (Coronavirus) महामारी (Pandemic) की वजह वे ग्रुप सेवन (G-7) देशों का शिखर सम्मेलन टालने जा रहे हैं. इसके साथ ही उन्होंने G-7 की बैठक को G-10 या G-11 कह कर भी संबोधित किया. उन्होंने भारत समेत चार देशों को इसमें बुलाने की बात कही. इसके बाद दुनिया के विकसित देशों के इस समूह में सदस्य देशों की संख्या बढ़ने की चर्चा तेज हो गई है.

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राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि वे भारत, रूस, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया को भी इस बैठक में शामिल होने का न्योता देंगे. उन्होंने कहा, “अगला सम्मेलन सितंबर में या उससे पहले हो सकता है या फिर संयुक्त राष्ट्र की महासभा (UNGA) के बाद. मुमकिन है कि मैं चुनाव के बाद ये बैठक बुलाऊं.” पहले यह बैठक जून महीने में ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से होने वाली थी.

भारत के लिए कितना अहम है बुलावा

अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर यह न्योता भारत के लिए काफी अहम साबित हो सकता है. दुनिया के इस बड़े मंच के जरिए भारत की साझेदारी विकसित देशों के साथ मजबूत हो जाएगी. इससे दुनिया में भारत का दबदबा और ज्यादा बढ़ सकता है. ऐसा हुआ तो यह भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जाएगी. हालांकि शिखर सम्मेलन में अन्य देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों को भी भाग लेने के लिए बुलाया जाता रहा है. पहले भी इसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसके लिए न्योता दिया जा चुका है.

G-7 के बारे में जानें

यह G-7 दुनिया के सात सबसे बड़े कथित विकसित और समृद्ध अर्थव्यवस्था वाले देशों का एक समूह है. इसमें कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमरीका शामिल हैं. इसे ग्रुप ऑफ सेवन भी कहते हैं. इसकी पहली बैठक साल 1975 में हुई थी. इस बैठक या शिखर सम्मेलन में वैश्विक आर्थिक संकट के संभावित समाधानों पर विचार किया गया था.

सिद्धांत

G-7 का दावा है कि वह “कम्यूनिटी ऑफ़ वैल्यूज” यानी मूल्यों का आदर करने वाला समूह है. स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की सुरक्षा, लोकतंत्र, कानून का शासन, समृद्धि और सतत विकास इसके प्रमुख सिद्धांत बताए गए हैं.

शुरुआत

शुरुआत में यह छह देशों का समूह (G-6) था. साल 1976 में साल कनाडा इस समूह में शामिल हो गया. इसके बाद यह समूह G-7 कहलाने लगा. साल 1998 में इस समूह में रूस भी शामिल हो गया था. फिर इसे G-7 से G-8 कहा जाने लगा था. साल 2014 में यूक्रेन से क्रीमिया हड़प लेने के बाद रूस को इस समूह से सस्पेंड कर दिया गया. फिर से इसमें सात देश ही बाकी रहे. ट्रंप ने अपने ताजा बयान में रूस को फिर से इस समूह में बतौर सदस्‍य वापस लाने की बात कही है.

अफ्रीका, लैटिन अमरीका और दक्षिणी गोलार्ध का कोई भी देश इस समूह का हिस्सा नहीं है. ट्रंप ने ऑस्ट्रेलिया को भी समूह में शामिल करने की पेशकश की है.

G-7 में एशिया की भागीदारी

दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा करने वाला चीन इस समूह का हिस्सा नहीं है. इसकी वजह यह है कि चीन में दुनिया की सबसे बड़ी आबादी रहती हैं. साथ ही वहां की प्रति व्यक्ति आय और संपत्ति G-7 समूह देशों के हिसाब से बहुत कम है.

ट्रंप के हालिया बयान में G-7 के विस्‍तार में एशिया के दो देशों- भारत और दक्षिण कोरिया का नाम शामिल है. ट्रंप के इस फैसले से चीन और पाकिस्‍तान को किरकिरी होनी लाजिमी है.

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शिखर सम्मेलन को लेकर सदस्य देशों का रवैया

जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने प्रस्तावित शिखर सम्मेलन के लिए अमरीका जाने से मना कर दिया है. ऐसा करने वाली वाली G-7 देशों की वो पहली नेता थीं. उनके प्रवक्ता स्टीफ़न सीबर्ट ने कहा, “अभी की महामारी की स्थिति को देखते हुए वो वाशिंगटन नहीं जा सकतीं. फ्रांस के एक अधिकारी ने कहा कि राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉ सेहत सही रहने पर अमरीका जाना चाहेंगे. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा था कि वे निकट भविष्य में G-7 की बैठक आयोजित करने पर सहमत हैं.

G-7 और G-20 का रिश्ता

भारत और ब्राजील जैसी तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं से G-7 को चुनौती मिल रही है. ये दोनों देश G-20 के सदस्य हैं, लेकिन G-7 का हिस्सा नहीं हैं. दुनिया के कुछ मशहूर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि साल 2050 तक G-20 के कुछ देश G-7 के कुछ सदस्य देशों को पीछे छोड़ देंगे.

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