हॉन्ग कॉन्ग और चीन के रिश्ते की पूरी कहानी जिसमें एक बिल की वजह से आई दरार

चीन ने हॉन्ग कॉन्ग में विवादित प्रत्यर्पण बिल लागू करने का प्लान फिलहाल टाल दिया है. ऐसे में दोनों के रिश्ते में जान लेना चाहिए.

हॉन्ग कॉन्ग में चीन को प्रत्यर्पण की अनुमति देने वाला विभाजक कानून लागू नहीं होगा. चीन समर्थक मुख्य कार्यकारी अधिकारी कैरी लैम ने शनिवार को ये बात बताई. चीन की सरकार इसे लागू करने को लेकर सख्त थी. इस कानून के लागू होने पर चीन को अधिकार मिल जाता कि वो हॉन्ग कॉन्ग से किसी को भी उठाकर अपने यहां ले जा सकता था. उन पर केस चला सकता था, सज़ा दे सकता था. हॉन्ग कॉन्ग में चीन के विरोध का हर स्वर दबाने की आजादी इस बिल से मिल जाती, इसीलिए वहां के नागरिकों ने इसका विरोध किया. रविवार, 9 जून को प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि 10 लाख से ज्यादा लोगों ने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया.

हॉन्ग कॉन्ग और चीन का विवादित रिश्ता

अंग्रेजों ने बहुत से देशों को अपना उपनिवेश बना रखा था. उन्हीं में से एक हॉन्ग कॉन्ग भी था. 1997 में ब्रिटेन के पास से हॉन्ग कॉन्ग की लीज़ समाप्त हो गई. सिनो-ब्रिटिश डिक्लेरेशन के तहत हुए समझौते में हॉन्ग कॉन्ग चीन के पास आ गया. ब्रिटिश शर्तों के मुताबिक चीन के अधिकार में आने के बावजूद हॉन्ग कॉन्ग को स्पेशल स्टेटस मिला हुआ था. चीन से अलग हॉन्ग कॉन्ग को एक कानून मिला जिसे ‘बेसिक लॉ’ कहते हैं. ये कानून चीन और हॉन्ग कॉन्ग के बीच पुल का काम करता है.

इस नियम के तहत हॉन्ग कॉन्ग के पास स्पेशल ऑटोनामी है. यहां की जनता के पास ज्यादा अधिकार हैं. मीडिया स्वतंत्र है. कुल मिलाकर चीन से ज्यादा पारदर्शिता हॉन्ग कॉन्ग में है इसीलिए वो चीन का आर्थिक केंद्र बन पाया. समस्या ये है कि 1997 में लागू हुआ बेसिक लॉ सिर्फ 50 साल के लिए है. 2047 में ये खत्म हो जाएगा. चिंता ये भी है कि 2047 से पहले ही चीन की सरकार इसे खत्म करने में लगी हुई है. 2012 में शी जिनपिंग के राष्ट्रपति बनने के बाद ये कोशिशें और तेज हो गईं.

2014 का अंब्रैला मूवमेंट

बेसिक लॉ के मुताबिक हॉन्ग कॉन्ग को अपना लीडर चुनने का अधिकार है. लेकिन वो अधिकार जमीन पर आने में चीन पेंच उलझाए पड़ा है. चीफ एग्जिक्यूटिव का चुनाव लेजिस्लेटिव काउंसिल करती है जिसमें 70 सीटें होती हैं. इनमें 35 सीटें जनता द्वारा चुनी जाती हैं और बाकी आधी सीटों का नियंत्रण चीन सपोर्टर्स के हाथ में रहता है इनका चुनाव स्पष्ट नहीं होता. 2014 में अपना लीडर चुनने के अधिकार की मांग के साथ हॉन्ग कॉन्ग के लोगों ने जो प्रदर्शन किए उन्हें अंब्रैला मूवमेंट के नाम से जाना गया.

जब लोगों ने निष्पक्ष चुनाव की मांग करते हुए आंदोलन किया तो पुलिस ने उन्हें भगाने के हर संभव प्रयास किए. उन पर पेपर स्प्रे और आंसू गैस छोड़ी गई. इससे बचने के लिए लोगों ने छाते का इस्तेमाल किया. इस तरह अंब्रैला यानी छाता इस आंदोलन की पहचान बन गया. ढाई महीने के इस आंदोलन के बाद भी चीन ने लोगों की मांगें नहीं मानीं. 2017 में हजार से ज्यादा सदस्यों की चुनाव समिति ने कैरी लैम को चीफ एग्जिक्यूटिव चुन लिया लेकिन इन सदस्यों में चीन समर्थक ज्यादा थे. खुद कैरी लैम चीन समर्थक हैं.

प्रत्यर्पण कानून जो निलंबित हो गया

जो प्रत्यर्पण बिल निलंबित हुआ है उसके बारे में चीन का कहना था कि ये हॉन्ग कॉन्ग में क्राइम कंट्रोल करने का काम करेगा. इस बिल के तहत किसी अपराध के केस में अपराधी को उठाकर चीन ले जाया जा सकेगा, उस पर केस चलाया जा सकेगा और सज़ा दी जा सकेगी. 37 तरह के अपराधों की लिस्ट में राजनैतिक आरोप भी शामिल हैं. आरोपी के प्रत्यर्पण की मंजूरी चीफ एग्जिक्यूटिव के हाथ में रहेगी.

उधर हॉन्ग कॉन्ग के लोगों का मानना था कि इस बिल के लागू होने के बाद चीन किसी के लिए भी प्रत्यर्पण की मांग कर सकता है. हॉन्ग कॉन्ग इंकार नहीं कर पाएगा. ऐसा पूरी तरह से संभव है कि फिर चीन अपने विरोध में बोलने वालों, आलोचकों, एक्टिविस्ट्स को पकड़कर ले जाए और उन पर फर्जी केस बनाए. चीन का कानून कितना निष्पक्ष है वो दुनिया जानती है, इसीलिए हॉन्ग कॉन्ग के लोग किसी कीमत पर अपने अधिकारों से समझौता नहीं करना चाहते.

(Visited 112 times, 1 visits today)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *